क्यूबा : मजबूरी में भी कारगर, महात्मा गांधी
सर्वशक्तिमान अमरीका की एन नाक के नीचे बैठकर उसकी खामियों पर उंगली रखने वाले तीसरी दुनिया के देश क्यूबा को आर्थिक और राजनीतिक प्रतिबंधों के रूप में उसका खामियाजा भुगतना पडा है, लेकिन क्यूबा ने इस आपदा को अवसर में…
विचार : लोकतंत्र में अलोकतांत्रिक व्यवहार
दुनियाभर में वापरी जा रही लोकतांत्रिक प्रणाली व्यवहार में कितनी कारगर है, यह उसके मैदानी अमल से उजागर होता रहता है। व्यक्ति और समाज के स्तर पर लोकतंत्र के कसीदे काढने वाले अपने निजी, राजनैतिक और सामाजिक जीवन में कितने…
सामयिक : हीरों के लिए हार मानने से इंकार
मध्यप्रदेश में पानी की कमी से बिलबिलाते बुंदेलखंड में इन दिनों हीरा उत्खनन और उसके विरोध की आपाधापी का दौर जारी है। ठीक इन्हीं परिस्थितियों में करीब तीन दशक पहले अफ्रीका में भी ऐसा ही कुछ हुआ था। बोत्सवाना में…
स्वतंत्र पत्रकारिता का साथ देने की जरूरत : पी. साईंनाथ
पत्रकारिता और मीडिया को गड्डमड्ड करना और एक ही समझना ठीक नहीं है| आधी सदी पहले वे दोनों एक सरीखे ही रहे हों, पर आज नहीं हैं। देश के मीडिया के बड़े हिस्से पर कारपोरेट सेक्टर का कब्जा है। आज…
बाघ : ‘उनका अस्तित्व हमारे हाथ में है’
जंगलों के विनाश से बाघों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है और यह प्रजाति विलुप्त होने की कगार पर है। इसलिए बाघों के संरक्षण के प्रति जागरूकता हेतु ‘विश्व बाघ दिवस’ मनाया जाता है। वर्ष 2010 में रूस के…
निजी स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं के नियमन के लिए दायर याचिका सर्वोच्च न्यायालय ने की स्वीकार
जन स्वास्थ्य अभियान द्वारा दायर याचिका की दलीलों पर केंद्र को जारी किया नोटिस सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को एक जनहित याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी कर देश भर में क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट एक्ट, 2010 और क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट रूल्स, 2012…
वरिष्ठ पत्रकार व साहित्यकार प्रमोद भार्गव अलंकृत होंगे डॉ. सरोजिनी कुलश्रेष्ठ सम्मान से
वरिष्ठ पत्रकार व साहित्यकार प्रमोद भार्गव को उपन्यास एवं कहानी लेखन के क्षेत्र में डॉ. सरोजिनी कुलश्रेष्ठ सम्मान से अंलकृत किया जाएगा। मध्यप्रदेश लेखक संघ द्वारा प्रतिवर्ष यह सम्मान ऐसे लेखक को दिया जाता है, जिसने उपन्यास और कहानी लेखन…
खेती में सुधार : मिश्रित खेती के नए तरीकों की ओर लौटने का दौर
कैंसर सरीखी बीमारियों के व्यापक फैलाव के चलते, हमारे रोजमर्रा के भोजन में मौजूद जहर अब कोई अनजानी बात नहीं रह गई है। सवाल है, इससे कैसे निपटा जाए? एक तरीका बरसों आजमाई गई पुरानी, पारंपरिक फसलों को पुनर्जीवित करने…
उत्तराखण्ड : घटती कृषि भूमि
विकास की जिस अवधारण को लेकर हम अपनी कथित प्रगति करने में लगे हैं, उसमें सभी तरह के प्राकृतिक संसाधनों की बर्बादी साफ दिखाई देती है। उत्तराखंड इससे अछूता नहीं है जहां थोडे समय में करीब सवा लाख हैक्टेयर कृषि…
मौसम : बरसात का बादल
विकास की तरह-तरह की किस्सा-गोइयों के बावजूद हमारे देश में सिंचित कृषि का कुल रकबा अब भी 40 फीसदी के आसपास ही है। जाहिर है, खेती की बाकी जरूरत का पानी मानसून की बरसात की उम्मीदों पर टिका होता है।…






















