समसामयिक

नीले धुएँ की धरती : ‘ग्रेट स्मोकी माउंटेन्स’

समाज और सरकार चाहे तो पर्यावरण को पुनर्जीवित किया जा सकता है। इसका एक बेहतरीन उदाहरण अमरीका के टेनेसी और नार्थ कैरोलीना राज्यों की सीमाओं से लगा ‘ग्रेट स्मोकी माउंटेन्स’ है। करीब सौ साल पहले कानून बनाकर प्रकृति को उसके…

World Environment Day : पर्यावरण संरक्षण पर टिका है भविष्य

पर्यावरण संरक्षण और संतुलन का प्रश्न आज पूरी मानवता के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। बढ़ते प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन ने पृथ्वी के पारिस्थितिक संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित…

कैसे रोकें, राजस्थान के फैलते मरूस्थल को?

आधुनिक विकास के धतकरमों ने जिस तरह के संकट खड़े किए हैं, उनका निदान अब वापस पुरानी पारंपरिक पद्धतियों में ही दिखाई दे रहा है। मसलन, राजस्थान में फैलते मरुस्थलों को स्थानीय तौर-तरीकों, वनस्पतियों, झाड़-झंखाडों आदि से ही रोका जा…

कैसी है ‘सुपर एल नीनो’ का सामना करने की हमारी तैयारी?

‘सुपर एल नीनो’ की आहट, कमजोर मानसून का खतरा और इनसे निपटने की देश की आधी-अधूरी तैयारी ने हमारे सामने कुछ बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। ‘कोविड 19’ या हाल के खाड़ी संकट से उपजे हाहाकार को देखें तो…

लोकतंत्र को अपने वैभव का इंतज़ार

क्रिकेट की थकी और उबाऊ होती दुनिया में जैसे वैभव सूर्यवंशी अचानक आकर खेल की ऊर्जा, सौंदर्य और उम्मीद लौटा देता है, वैसे ही भारतीय समाज और लोकतंत्र भी आज किसी ऐसे ही साहसी, ताज़ा और जीवंत हस्तक्षेप की प्रतीक्षा…

जमशेदपुर में पर्वत संरक्षण पर राष्ट्रीय संवैधानिक विमर्श

पर्वत संरक्षण को संवैधानिक सुरक्षा देने की जरूरत पर राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर विमर्श शुरू हो रहा है। 22 और 23 मई को जमशेदपुर में आयोजित सम्मेलन में पर्वतों को भारत की पहली राष्ट्रीय आधारभूत संरचना मानते हुए उनके संरक्षण,…

संवेदना से सुधरेंगे, केदारनाथ यात्रा के संकट

इन दिनों जारी ‘चार धाम यात्रा’ में तीर्थयात्रियों की संख्या में भारी कमी महसूस की जा रही है। क्या इसकी वजह यात्रा के बढ़ते वे खतरे तो नहीं हैं जो सीमा से ज्यादा यात्रियों ने हाल के वर्षों में खड़े…

प्रकृति का मौन विलाप : विलुप्त होती प्रजातियों की पुकार

धरती पर जीवन का ताना-बाना करोड़ों प्रजातियों से बुना गया है, लेकिन मानव सभ्यता की तेज़ रफ्तार ने इस संतुलन को अभूतपूर्व संकट में डाल दिया है। आज विलुप्ति की रफ्तार प्राकृतिक दर से हजार गुना अधिक मानी जा रही…

सत्ता की बेड़ियाँ और सिसकती आस्था : पंचेन लामा की गुमशुदगी के तीन दशक

इतिहास में कुछ गुमशुदगियाँ केवल व्यक्तियों की नहीं, बल्कि पूरी सभ्यताओं की पीड़ा बन जाती हैं। गेडुन चोएकी न्यिमा की कहानी भी ऐसी ही एक जीवित त्रासदी है, जहाँ छह वर्ष का एक मासूम बालक अपनी आध्यात्मिक पहचान की कीमत…

संविधान का सम्मान और जनसहभागिता से ही नदियों-पहाड़ों की रक्षा

नदी और पहाड़ केवल प्रकृति के प्रतीक नहीं, बल्कि सभ्यता, संस्कृति और जीवन के आधार हैं। जब नदियाँ बीमार होती हैं और पहाड़ घायल होते हैं, तब समाज का संतुलन भी डगमगाने लगता है। आज जलवायु संकट, अंधाधुंध खनन और…