Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

समसामयिक

सोनम वांगचुक :  अनशन नहीं, सत्ता का चरित्र बदला है

सोनम वांगचुक का आमरण अनशन अब केवल शिक्षा सुधार या एक मंत्री की जवाबदेही का प्रश्न नहीं रह गया है, बल्कि लोकतांत्रिक प्रतिरोध की प्रभावशीलता की भी परीक्षा बन चुका है। इसी बीच न्यायालय ने उनके जीवन की रक्षा को…

बिहार  : डिग्री कॉलेज तो खुल गए, गांधी कहां रह गए?

बिहार सरकार द्वारा 211 प्रखंडों में नए राजकीय डिग्री कॉलेज खोलने का निर्णय उच्च शिक्षा के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन इन महाविद्यालयों में गांधी विचार को स्थान न मिलना गंभीर सवाल खड़े करता है। शिक्षा यदि…

‘एथेनॉल क्रांति’ : संभावनाओं में छिपे संकट

पश्चिम एशिया के देशों पर अमरीका द्वारा जबरन थोपी गई लडाई के नतीजे में तेल, ईंधन की भारी कमी और देश के सडक परिवहन मंत्री नितिन गडकरी के उत्साह ने आजकल खाद्य उत्पादनों से ‘एथेनाल’ बनाने और उससे अर्थव्यवस्था चलाने…

हमारे फुटपाथ कौन हजम कर रहा?

आज़ादी के लगभग 80 वर्ष बाद भी यदि नागरिकों को सुरक्षित फुटपाथ के अधिकार के लिए सर्वोच्च न्यायालय की शरण लेनी पड़े, तो यह हमारे शहरी विकास मॉडल की बड़ी विफलता है। न्यायालय का हालिया फैसला पैदल यात्रियों के अधिकारों…

मध्यप्रदेश में नई मत्स्य नीति की असली कसौटी

मध्यप्रदेश ने नई एकीकृत मत्स्य नीति-2026 और हजारों करोड़ रुपये के निवेश के साथ “ब्लू इकॉनमी” की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाया है। लेकिन उत्पादन और निवेश केंद्रित इस मॉडल के बीच पारंपरिक मछुआरों के अधिकार, आजीविका, सहकारी व्यवस्था और…

‘एल नीनो’ की चपेट में दुनिया

दुनियाभर के वैज्ञानिक, पर्यावरणविद्, सामाजिक कार्यकर्ता और समझदार लोग मौसम की जिस मार से प्रलय की आशंकाएं जताते रहे हैं, वह अब हमारे दरवाजों पर दस्तक दे रहा है। कहा जा रहा है कि अगले कुछ साल इंसानी वजूद के…

विचार-विमर्श के ‘बीज-मंत्र’

बदहाली के मौजूदा समय से पार पाने या कम-से-कम उसका एक रास्ता पहचानने के लिए हम आखिर किसके पास जाएं? क्या हमें इस मशक्कत में अपने समय के लेखकों, संपादकों की कुछ मदद मिल सकेगी? हम लोगों के वरिष्ठ साथी…

30 जून  :  अन्याय के संगठित लड़ाई का‌ मार्ग दिखाता है हूल आंदोलन

30 जून 1855 को संथालों ने केवल अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध हथियार नहीं उठाए, बल्कि जल, जंगल और जमीन पर अपने अधिकार की ऐतिहासिक घोषणा भी की। 171 वर्ष बाद भी ‘हूल’ केवल इतिहास का अध्याय नहीं, बल्कि विस्थापन, संसाधनों…

‘नागरिकों’ को ‘शरणार्थियों’ में बदलने का षड्यंत्र तो नहीं ?

क्या किसी नागरिक की पहचान उसके जीवन, समाज और इतिहास से तय होगी या केवल सरकारी अभिलेखों से? वरिष्ठ पत्रकार आर. राजगोपाल का मामला इस प्रश्न को नई गंभीरता से सामने लाता है। जब पासपोर्ट, आधार और मतदाता पहचान पत्र…

आंकड़ों से भविष्य गढ़ने का विज्ञान है सांख्यिकी

आंकड़े केवल संख्याएं नहीं होते, वे समाज की वास्तविक तस्वीर और भविष्य की दिशा भी बताते हैं। सरकारों की योजनाओं से लेकर मौसम की चेतावनी, जनगणना, रोजगार और आर्थिक विकास तक हर महत्वपूर्ण निर्णय सांख्यिकी पर आधारित होता है। राष्ट्रीय…