हमें अपनी सरकारों, सेठों और समाज में बहुतायत से व्याप्त पाखंड को देखना हो तो पतित पावनी मानी गईं गंगा के प्रति पिछले कुछ दशकों से किए जा रहे अपने व्यवहार को देखा जा सकता है। स्वर्ग-नसेनी के दर्जे की…
डेढ़ दशक पहले खारिज की गई उत्तराखंड की ‘लोहारीनाग पाला जलविद्युत परियोजना’ अब अपने अंत की शुरुआत में है, लेकिन क्या समझ का यह कमाल हिमालय के सभी पहाड़ी राज्यों में एक-सा लागू होगा? क्या इस परियोजना के ‘अंत’ से…
हिमालय सरीखे नए पहाडों में बढ़ रहे हिमस्खलन बड़े संकटों की वजह बनते जा रहे हैं। कमाल यह है कि इन हिमस्खलनों को भुगतकर नवनिर्माणों पर कडाई से रोक लगाने की बजाए इन्हें विकास कहा जा रहा है और भारी-भरकम…
राहुल गांधी के इस आरोप कि मोदी राष्ट्रपति ट्रम्प से ख़ौफ़ खाते हैं, पर अप्रत्याशित प्रतिक्रिया अमेरिकी गायिका मेरी मिलबेन ने दी है। मोदी समर्थक मानी जाने वाली मिलबेन ने कहा कि पीएम की ट्रम्प के प्रति रणनीति डर नहीं,…
हिमालय में जारी विनाश की वजह क्या सिर्फ भगवानजी की बरसाई जा रही आपदा या ‘जलवायु – परिवर्तन’ भर है? क्या इसमें हम इंसानों की भी कोई भागीदारी है? जैसे ऊर्जा, बाढ़-नियंत्रण और सिंचाई के कथित लाभों के लिए इफरात…
मौजूदा विकास की बेहूदगी से किसी तरह अब तक बचे उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के वाशिंदे चीख-चीखकर गुहार लगा रहे हैं कि अगले दस-पंद्रह सालों में उनके राज्यों का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। आप यदि ध्यान से इन दिनों आने…
विपिन जोशी की रिपोर्ट कौसानी की चाय अपनी अनूठी सुगंध और गुणवत्ता के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है, जो उच्च कीमतों पर बिकती है। लेकिन इस चाय को आपके प्याले तक पहुंचाने वाले गरीब किसानों और श्रमिकों को उनके…
आज़ादी के बाद (या शायद पहले भी) कभी ऐसा नहीं हुआ होगा कि मस्जिदों को तिरपालों से ढाका गया हो या नमाज़ों का वक्त बदला गया हो । मुस्लिमों से कहा गया कि वे घरों के भीतर रहते हुए चल…
पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र के मुताबिक बिहार के लिए प्रकृति का प्रसाद मानी जाने वाली बाढ़ आजकल एक त्रासदी बन गई है। वजह है, उससे निपटने की कथित आधुनिक, तटबंध जैसी तरकीबें। साल-दर-साल आने वाली बाढ़ ने बिहार को किस तरह…
चारों तरफ़ भय और आतंक का माहौल है। नई-नई सत्ताएँ आए दिन प्रकट हो रही हैं जो नागरिकों को डरा रही हैं। सत्ता प्रतिष्ठान या तो नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करने में निकम्मा साबित हो रहा है या फिर अपराधी…