Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

ईरान युद्ध के बहाने वर्साई की याद !

लेखक की फोटो

ईरान युद्ध और उसके बाद हुए युद्धविराम ने एक बार फिर इतिहास के पन्ने खोल दिए हैं। प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति का साक्षी रहा फ्रांस का वर्साई आज भी युद्ध और शांति के बीच खड़ी मानव सभ्यता की याद दिलाता है। लेखक अपनी तीन दशक पुरानी वर्साई यात्रा की स्मृतियों के सहारे वर्तमान वैश्विक राजनीति, कूटनीति और सत्ता की विडंबनाओं को एक साथ जोड़ते हैं।


ट्रम्प और नेतन्याहु मिलकर अगर ईरान पर हमला नहीं करते तो वर्साई की याद ही नहीं आती। कोई 7500 लोगों की 110 दिनों के युद्ध में मौत और दुनिया भर में आर्थिक संकट पैदा कर लेने के बाद ट्रम्प अगर फ़्रांस की खूबसूरत राजधानी पेरिस के दक्षिण-पश्चिम में बसे शानदार उपनगर वर्साई में युद्ध समाप्ति के समझौता-मसौदे (MOU)पर हस्ताक्षर करने नहीं पहुँचते तो फिर मैं भी उस ऐतिहासिक स्थान पर चौंतीस साल पहले इन्हीं दिनों बिताई गई दस रातों की स्मृतियों में तफ़रीह करने नहीं जा पाता।

अंतरराष्ट्रीय मीडिया विकास संस्थान ‘थॉमसन फाउंडेशन’ की स्कालरशिप पर उसके लंदन स्थित मुख्यालय पर ग्यारह हफ़्तों का पाठ्यक्रम पूरा करने के बाद एक फ़्रांसीसी मित्र के आमंत्रण पर पेरिस की यात्रा का अवसर मिला था। पहले ट्रेन से इंगलिश चैनल तक का सफ़र। फिर जहाज़ पर बैठकर चैनल को पार करना। फिर ट्रेन से पहले पेरिस (पारी) स्टेशन और वहाँ से वर्साई। रास्ते भर एफ़िल टावर की ऊँचाई और सौंदर्य को निहारते रहने को जो रोमांच था उसे इतने लंबे अरसे के बाद शब्दों में व्यक्त नहीं जा सकता।

पेरिस से कोई सोलह किलोमीटर की दूरी पर बसे समृद्ध फ़्रांसीसियों के उपनगर वर्साई की उस समय आबादी कोई 91 हज़ार रही होगी जो वर्तमान में घटकर 84 हज़ार रह गई है। इस उपनगर की असली पहचान आठ सौ हेक्टेयर क्षेत्र में फैला ‘पैलेस ऑफ़ वर्साई’ और उसके हृदय में समाया हुआ ‘हॉल ऑफ़ मिरर्स’ है जहां 28 जून 1919 के दिन जर्मनी और मित्र राष्ट्रों (अमेरिका,यूके, फ़्रांस और इटली) के बीच प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति की घोषणा करने वाली ऐतिहासिक संधि पर हस्ताक्षर हुए थे। इसी संधि को ‘ट्रीटी ऑफ़ वर्साई’ के नाम से जाना जाता है।

See also  इज़रायल और फिलिस्तीन : मध्य-पूर्व में मौत का तांडव

वर्साई उपनगर के जिस स्थान पर रुका हुआ था वहाँ से इस पैलेस की दूरी ज़्यादा नहीं थी। केवल एक बार की यात्रा में सत्रहवीं सदी के उस भव्य पैलेस के वास्तुशिल्प और सौंदर्य को आँखों में समाया भी नहीं जा सकता था इसलिए दो-तीन बार वहाँ गया। ‘हॉल ऑफ़ मिरर्स’ में अत्यंत सम्मान से सुशोभित डेस्क की कुर्सियों पर बैठकर ही तब विश्वयुद्ध की समाप्ति की संधि पर चारों मित्र राष्ट्रों के शासनाध्यक्षों और आक्रांता देश जर्मनी की और से विदेश तथा ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर्स ने हस्ताक्षर किए गए थे।

ईरान के साथ युद्धविराम और लड़ाई की समाप्ति के अंतरिम समझौते (MOU) पर ट्रम्प ने भी (संभवतः) हस्ताक्षर ‘हॉल ऑफ़ मिरर्स’ स्थित उसी ऐतिहासिक डेस्क पर बैठकर किए होंगे। ईरान की तरफ़ से राष्ट्रपति मसूद पजेशकियाँ ने तेहरान से इलेक्ट्रोनिकली हस्ताक्षर किए। ऐसे ही हस्ताक्षर मध्यस्थकार की हैसियत से शाहबाज़ शरीफ ने पाकिस्तान से किए।

वर्साई से पेरिस तक सुबह यात्रा और शाम में वापसी। पेरिस की गलियाँ, भव्य म्यूज़ियम्स, आर्ट गैलरीज़, स्ट्रीट कॉफ़ी हाउस, सीन नदी के तट पर बना 81-मंज़िला विश्व प्रसिद्ध एफ़िल टावर, नोत्रे-दाम कैथेड्रल (जो अप्रैल 2019 में लगी एक भीषण आग के क्षतिग्रस्त हो गया था ) सबसे मुलाक़ातों का सुख स्मृतियों के अलग-अलग खानों में सुरक्षित है ।

इससे पहले कि दुनिया के किसी ओर कोने में नया युद्ध छिड़े और कोई ट्रम्प किसी संधि पर हस्ताक्षर करने वर्साई पहुँचे, एक बार फिर से वहाँ की यात्रा करने का मन हो रहा है। मैं यह भी सोच रहा था कि साल 2014 में सत्ता में आने के बाद से मोदीजी सात बार फ़्रांस की यात्रा पर गए पर क्या कारण रहा होगा कि वर्साई के उस ऐतिहासिक पैलेस को देखने का अवसर उन्हें नहीं मिला जहां युद्धों को समाप्त करने वाली संधियों पर हस्ताक्षर किए जाते हैं ?

WhatsApp हमारे WhatsApp Channel को Join करें
See also  मारिया कोरिना माचाडो : आलू के बोरे से बदतर हुआ, शांति का नोबेल

Table of Contents

पानी लौटे तो लौटता है गाँव का भविष्य

हमने विकास को अक्सर इस सवाल से मापा है कि कितना पानी निकाला जा सकता है, कितनी परियोजनाएँ बनीं और कितना धन खर्च हुआ। अब सवाल बदलने का समय है—एक भू-दृश्य टिकाऊ रूप से कितना पानी सँभाल सकता है? इस

Read More »

भोटकोशी बाढ़ से सबक लेकर हिमालयी देशों को संयुक्त मंच बनाना चाहिए : पर्यावरणविद् चंडी प्रसाद भट्ट

राष्ट्रीय हिमालय आयोग के गठन की पैरवी, प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में आयोग बनाने की मांग चमोली (उत्‍तराखंड), 28 अगस्‍त। प्रख्यात पर्यावरणविद्, चिपको आंदोलन के नेता और गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित चंडी प्रसाद भट्ट ने शुक्रवार को नेपाल के रसुवा

Read More »

नेपाल प्राकृतिक आपदा : हिमालय अब जलवायु परिवर्तन का बोझ नहीं उठा सकता

हिमालय में बार-बार सामने आ रही प्राकृतिक आपदाएं अब महज स्थानीय घटनाएं नहीं रह गई हैं। नेपाल की हालिया त्रासदी ने एक बार फिर चेताया है कि जलवायु परिवर्तन, बढ़ता तापमान और बदलता मानसून हिमालय की नाजुक पारिस्थितिकी पर भारी

Read More »