30 जून 1855 को संथालों ने केवल अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध हथियार नहीं उठाए, बल्कि जल, जंगल और जमीन पर अपने अधिकार की ऐतिहासिक घोषणा भी की। 171 वर्ष बाद भी ‘हूल’ केवल इतिहास का अध्याय नहीं, बल्कि विस्थापन, संसाधनों…
क्या किसी नागरिक की पहचान उसके जीवन, समाज और इतिहास से तय होगी या केवल सरकारी अभिलेखों से? वरिष्ठ पत्रकार आर. राजगोपाल का मामला इस प्रश्न को नई गंभीरता से सामने लाता है। जब पासपोर्ट, आधार और मतदाता पहचान पत्र…
जंगल सिमट रहे हैं और वन्यजीव गांवों की ओर बढ़ रहे हैं। खेतों में हाथी, बस्तियों में तेंदुए और गांवों की चौखट तक पहुंचते बाघ केवल वन्यजीव संघर्ष की कहानी नहीं, बल्कि असंतुलित विकास की चेतावनी हैं। सवाल यह नहीं…
आंकड़े केवल संख्याएं नहीं होते, वे समाज की वास्तविक तस्वीर और भविष्य की दिशा भी बताते हैं। सरकारों की योजनाओं से लेकर मौसम की चेतावनी, जनगणना, रोजगार और आर्थिक विकास तक हर महत्वपूर्ण निर्णय सांख्यिकी पर आधारित होता है। राष्ट्रीय…
भोपाल, 28 जून। भारत की भाषाई विविधता, विलुप्त होती बोलियों और मातृभाषाओं के भविष्य पर देश के सबसे प्रतिष्ठित भाषा-चिंतकों में से एक प्रो. जीएन डेवी 30 जून को भोपाल में व्याख्यान देंगे। ‘हम सब’ और गांधी भवन के संयुक्त…
कुछ लोग अपने जाने के बाद भी स्मृतियों से नहीं, अपने विचारों और कर्मों से जीवित रहते हैं। वरिष्ठ पत्रकार अमरनाथ झा ऐसे ही विरल व्यक्तित्व थे, जिन्होंने पत्रकारिता को केवल पेशा नहीं, बल्कि समाज, नदी, जल, जंगल और मनुष्य…
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स्वामी सहजानंद सरस्वती के 77वें महाप्रयाण दिवस पर उन्हें श्रद्धांजलि एवं पुष्पांजलि अर्पित करते हुए संयुक्त किसान संघर्ष मोर्चा, सीतामढ़ी में ‘खेती के खतरे’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता मोर्चा के जिलाध्यक्ष जलंधर यदुवंशी ने…
देश की कृषि और आर्थिक संप्रभुता को लेकर मंडराते खतरों के बीच, 25 जून को चंडीगढ़ का किसान भवन एक ऐतिहासिक बैठक का गवाह बना। भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित ट्रेड डील के विरोध में देश भर के किसान,…
संपूर्ण क्रांति की असली कहानी सत्ता परिवर्तन से आगे शुरू होती है। यह उन लोगों की कहानी है जिन्होंने आंदोलन की चेतना को जीवन का संकल्प बनाया और जल, जंगल, जमीन, ग्राम स्वराज तथा सामाजिक पुनर्निर्माण के माध्यम से बदलाव…