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सामयिक : अपने-अपने ‘एपस्टीन’

सामयिक : अपने-अपने ‘एपस्टीन’

इस साल की शुरुआत में उछली ‘ज्येफ्री एपस्टीन फाइल्स’ ने साबित कर दिया है कि असीमत पूंजी इंसान की अंतर्निहित गंदगी को कई-कई गुना बढ़ाती, उजागर करती है। कहा जा रहा है कि खाड़ी देशों में जारी उठा-पटक और दुनिया...

इस साल की शुरुआत में उछली ‘ज्येफ्री एपस्टीन फाइल्स’ ने साबित कर दिया है कि असीमत पूंजी इंसान की अंतर्निहित गंदगी को कई-कई गुना बढ़ाती, उजागर करती है। कहा जा रहा है कि खाड़ी देशों में जारी उठा-पटक और दुनिया के राजनीतिक नेतृत्व की ऊल-जलूल हरकतों की वजह भी इसी नामुराद ‘एपस्टीन फाइल’ में दबी-उभरी जानकारियां हैं। क्या हैं, इन फाइलों की अहमियत?


आपने ध्यान दिया क्या कि इस साल का आरंभ दुनिया भर में तीखी बहस, खींच-तान व आरोपों के गंदले माहौल में हुआ है? दुनिया कभी इतनी डरावनी नहीं थी जितनी आज है। इस दुनिया का नायक है, ज्येफ्री एपस्टीन। यह वह आदमी है जो अनैतिक जीवन व कारोबार का सरगना था। यह दुनिया के हैसियतदार लोगों को अपने जाल में फंसाता था। वर्ष 2019 में अमेरिका की एक जेल में उसकी संदिग्ध मृत्यु के वर्षों बाद उसकी कारगुजारियों के दस्तावेज दुनिया भर में भूचाल लाए हुए हैं।  

वर्ष 2016 में हुए अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव के दौरान एपस्टीन और ट्रम्प के संबंध राजनीतिक मुद्दा बने थे। दिसंबर 2025 से उसकी अनैतिक कारगुजारियों की फाइलें सार्वजनिक होने लगीं। उन पन्नों में दर्ज दुनिया भर के मशहूर राजनेताओं, उद्योगपतियों और अन्य प्रभावशाली व्यक्तियों के नाम भी सामने आए। ये लोग एपस्टीन की अनैतिक दुनिया के खास ग्राहक हुआ करते थे। इन सबके कई आपत्तिजनक फोटो और ई-मेल इस फ़ाइल में हैं। इस फ़ाइल में भारत के केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी और उद्योगपति अनिल अम्बानी के अलावा किसी संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी नाम है।

फाइल में नाम आने मात्र से कोई अपराधी नहीं हो जाता, लेकिन फिर भी महिलाओं-बच्चों के यौन शोषण का व्यापार करने वाले एपस्टीन से संपर्क, संवाद या निकटता गहरे शक का कारण तो बनती है। एपस्टीन इन ‘बड़े’ लोगों की वासनाएं तुष्ट करता था, उनके फोटो और रिकॉर्डिंग बनाता था और उनकी आड़ में वह दुनिया भर में सत्ता और सम्पत्ति की दलाली करता था। एपस्टीन चाहे भले आज न हो, उसके ख़तरनाक दस्तावेज कइयों के गुनाहों की परतें खोल रहे है।  

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इस पूरे प्रकरण में घिलेन मैक्स्वेल की भूमिका खासी महत्वपूर्ण रही है। वह एपस्टीन के सामाजिक नेटवर्क की प्रमुख कड़ी थी और उस पर नाबालिग लड़कियों को जुटाने व उन्हें एपस्टीन के जाल में फंसाने का अपराध सिद्ध हुआ है। वर्ष 2022 में उसे 20 वर्ष की क़ैद की सज़ा सुनाई गई थी।   

इस संदर्भ में वर्ष 2004 में आई एक किताब काबिल-ए-गौर है – ‘कंफ़ेशंस ऑफ एन इकोनोमिक हिटमैन।’ जॉन पर्किन्स अपनी इस किताब में बताते हैं कि कैसे वे, कार्पोरेट के प्रतिनिधि की हैसियत से, खुद विकासशील देशों के अनैतिक राजनेताओं को तोहफे और रिश्वत देते थे। उनके देशों को असम्भव कर्ज देकर, ऐसे इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स करने के लिए राजी करते थे जिनसे अमेरिकी कंपनियों को लाभ मिलता था। ऐसे अनैतिक नेता देश को कर्ज के जाल में फंसा देते थे। फिर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के अनुकूल कानून और नीतियों का निर्माण, सैन्य ताक़त का डर और देश के संसाधनों पर क़ब्ज़ा करने का सिलसिला शुरू होता था। पनामा के नेता ओमार तोर्रीहोस का उदाहरण देते हुए पर्किन्स दावा करते हैं कि उन्होंने जब ऐसे दबावों का विरोध किया तो 1981 में एक संदिग्ध विमान दुर्घटना में उनकी मौत हो गई।

यह किताब कर्ज, वैश्विक वित्तीय बाज़ार, ग़रीब देशों की राजनीति और उनके बाज़ारों पर क़ब्ज़े के षड्यंत्र को उजागर करती है। इस किताब को इसलिए भी दुनिया भर में मान्यता मिली क्योंकि ‘अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष’ (आइएमएफ) और ‘विश्व बेंक’ जैसी संस्थाओं द्वारा गरीब, पिछड़े मुल्कों को कर्ज देना और फिर क़र्ज़े में दबी सरकारों पर बेजा दवाब डालकर उस देश की अर्थ व्यवस्था में अपने अनुकूल निश्चित परिवर्तन करवा लेना, एक जाना- पहचाना मॉडल था।

भारत ने भी 1991 में वैश्वीकरण का फ़ैसला गंभीर आर्थिक संकट और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के दबाव में लिया था। संसद में किसी बहस, मतदान या मीडिया में किसी भी प्रकार की आम सहमति बनाए बगैर, तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव और उनके वित्तमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने यह फैसला किया था।

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तब से दुनिया जितनी बदली है, उतनी ही अनैतिक धंधेबाजों की दुनिया भी बदली व बड़ी हुई है। 21वीं सदी को ‘एपस्टीन युग’ मानें तो हम पाते हैं कि वह पैसे और प्रतिष्ठा का एक कवच बनाता था जिसकी आड़ में बड़े-बड़े राजनेताओं – धनपतियों – वैज्ञानिकों – विचारकों – शिक्षाविदों – तथाकथित समाजसेवियों का नेट्वर्क बनाकर उन्हें सेक्स कांड में फंसाकर अपनी मनमानी करवाता था।  

क्या यह खेल अमेरिका तक सीमित था? नहीं, सच तो यह है कि जहां भी असीमित सत्ता और पूंजी का गठजोड़ होगा, वहीं ‘एपस्टीन’ पैदा होंगे। भारत में इसका एक मॉडल तथाकथित बाबाओं – साधकों – तांत्रिकों के रूप में काम करता है। इन आध्यात्मिक गुरुओं के दरबार में राजनेता, उद्योगपति, कलाकार सभी हाजिरी लगाते हैं। इसके पीछे यौन शोषण के कांड तो होते ही रहे हैं, पर न तो कभी ‘एप्सटीन-फाइल’ की तरह उसकी जांच हुई है और न ही सारा सच बाहर आया है।  

इस पूरी कहानी का एक पक्ष और भी है – न्याय-व्यवस्था का पक्ष। अमेरिका में एपस्टीन का गुनाह पहली बार 2008 में प्रमाणित हुआ। कई सबूत मिले। जो कुछ हुआ व हो रहा था उस सबकी जानकारी पुलिस, अदालत, सरकार सभी को थी, फिर भी व्यवस्था ने एपस्टीन से समझौता कर लिया। यह कहानी बहुत कुछ वैसी ही है जैसी हम अपने यहां पाते हैं। हम देखते हैं कि गुरमीत राम रहीम को उसके गुनाहों के लिए 2017 में बीस साल की आजीवन क़ैद हुई, लेकिन व्यवस्था ने उससे ऐसा समझौता कर रखा है कि वह ‘फरलो’ और ‘पैरोल’ पर पिछले 9 सालों में लगभग 250 दिन, विशेषकर चुनावों के दौरान जेल से बाहर आ जाता है।

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हम याद करें तो गुजरात में बिल्कीस बानू का सामूहिक बलात्कार करने वाले, उसकी तीन साल की बच्ची और दूसरे रिश्तेदारों की हत्या करने वाले ग्यारह अपराधियों को आजादी की 75 वीं वर्षगांठ के अवसर पर ‘चरित्रवान ब्राह्मण’ का ख़िताब देकर गुजरात सरकार ने रिहा कर दिया था। अब तो हमारे यहां राजनेताओं द्वारा यौन हिंसा सामान्य मान ली गयी है।  एपस्टीन की अपनी दुनिया थी। असामान्य रूप से अमीर और रसूखदार लोगों की अपनी दुनिया होती ही है।

जरूरत से ज्यादा धन और सत्ता व्यभिचार के रास्तों पर ले जाती है। हम आम लोग इन सबसे अनभिज्ञ, संसाधनों के अभाव में कैसी भी ग़रीबी स्वीकार कर जी लेते हैं, पर असामान्य अमीरी और ऐय्याशी का जैसा खुला प्रचार व प्रदर्शन अब हो रहा है, वह पूरे समाज को लालची बनाता जाता है। साधारण लोग उस चक्रव्यूह में फंसकर अभिमन्यु की तरह मारे जाते हैं। यही हमारा ‘एपस्टीन-युग’ है, जहां पैसे व सत्ता का बोलबाला है। (सप्रेस)

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