तरह-तरह के वन्यप्राणी प्रबंधन, भारी-भरकम बजट और पीढियों से बसे आदिवासियों को खदेडने – उजाडने के बावजूद जंगल का राजा शेर यानि बाघ लगातार मरता जा रहा है। जिस रफ्तार और तामझाम से बाघों को बचाने की मुहीम चलाई जाती है, लगभग उसी रफ्तार से बाघों की आबादी भी घटती जा रही है।
‘ग्लोबल असेसमेंट रिपोर्ट’ की वह चेतावनी आज हमारे सामने हकीकत बनकर खड़ी है, जिसमें कहा गया था कि मानव द्वारा प्राकृतिक संपदा का दोहन कर वन व वन्य-जीवों को विनाश की ओर धकेला जा रहा है। इसी का नतीजा है कि दुनिया भर में दस लाख प्रजातियां विलुप्ति की कगार पर हैं। एक समय था जब कंबोडिया जैसे देशों से बाघ पूरी तरह विलुप्त हो चुके थे, लेकिन भारत ने अपने ठोस संरक्षण प्रयासों से वैश्विक बाघ आबादी का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा अपनी धरती पर सुरक्षित रखा है।
नवीनतम ‘ऑल इंडिया टाइगर एस्टीमेशन’ की रिपोर्ट के अनुसार, देश में बाघों की कुल संख्या बढ़कर 3,682 (औसत) हो चुकी है। इस राष्ट्रीय उपलब्धि में सर्वाधिक 785 बाघों के साथ मध्य प्रदेश देश भर में शीर्ष पर है और ‘टाइगर स्टेट’ का गौरव संभाले हुए है। लेकिन आज यही गौरव एक नए और भीषण संकट से जूझ रहा है—बाघों की बढ़ती आबादी के लिए घटते वन और मानव-वन्यप्राणी संघर्ष।
जब आवास ही न बचा, तो प्राकृतिक सीमाएं कैसे बचेंगी? हाल ही में बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के खेरवाटोला गांव में एक बाघ का आबादी में घुसकर लोगों पर हमला करना और फिर ट्रैंक्युलाइज करने की प्रक्रिया के दौरान उस बाघ का दम तोड़ देना, कोई अकेली घटना नहीं है। यह इस बात का सीधा संकेत है कि हम बाघों को उनके कोर प्राकृतिक आवास के भीतर सुरक्षित रखने में विफल हो रहे हैं।
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, मध्यप्रदेश के जंगलों, विशेषकर बांधवगढ़ में, बाघों की सघनता उनकी ‘वहन क्षमता’ से अधिक होने लगी है। वर्तमान में अकेले ‘बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व’ में लगभग 135 बाघ मौजूद हैं। दरअसल, राष्ट्रीय बाघ गणना के समय एक वर्ष से कम उम्र के शावकों को मुख्य संख्या में शामिल नहीं किया जाता, लेकिन अगले दो-तीन वर्षों में जब ये शावक वयस्क होते हैं, तो उन्हें अपनी स्वतंत्र भौगोलिक सीमा (टेरिटरी) की आवश्यकता होती है। चूंकि वन क्षेत्र का कुल दायरा स्थिर है और बाघों की संख्या लगातार बढ़ रही है, इसलिए यह क्षेत्रीय संकट अब और गहरा गया है।
अप्राकृतिक मौतें और प्रबंधन की विफलता ‘वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन सोसाइटी ऑफ इंडिया’ और आधिकारिक आंकड़ों से उजागर होती है। इनके मुताबिक मध्यप्रदेश में बाघों की मौतें हमेशा से गंभीर चिंता का विषय रही हैं। पिछले एक दशक में राज्य ने सैकड़ों बाघ गंवाए हैं और यह सिलसिला थमा नहीं है। वन विभाग अक्सर इन मौतों की प्राथमिक वजह ‘आपसी संघर्ष’ (अंतःप्रजातीय संघर्ष) बताता है।
नीतिगत स्तर पर सवाल यह है कि यह आपसी संघर्ष इस सीमा तक बढ़ क्यों रहा है? जब जंगल का दायरा सिकुड़ेगा और कॉरिडोर (वन्यजीव गलियारे) नष्ट होंगे, तो एक ही इलाके के लिए दो बाघों के बीच वर्चस्व की लड़ाई होना अपरिहार्य है। इसके अतिरिक्त, शिकारियों द्वारा बिछाए गए फंदे, करंट के जाल और अब रेस्क्यू ऑपरेशन्स के दौरान होने वाली मौतें (जैसा कि हालिया घटना में हुआ, जहां एक ग्रामीण महिला और बाघ दोनों को अपनी जान गंवानी पड़ी) वन्यजीव प्रबंधन की रणनीतियों और आपातकालीन तैयारी पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।
बाघ पारिस्थितिकी तंत्र के मुख्य आधार हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बाघ केवल एक वन्यजीव नहीं है, वह ‘थलीय-पारिस्थितिकी तंत्र’ की ‘खाद्य श्रृंखला’ का शीर्ष उपभोक्ता (टॉप प्रीडेटर) है। विज्ञान की भाषा में इन्हें ‘कीस्टोन प्रजाति’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है कि पूरे जंगल का स्वास्थ्य इसी एक जीव पर निर्भर करता है। बाघ को बचाने का सीधा मतलब है – जल, जंगल, जमीन और उसकी समग्र जैव-विविधता की रक्षा करना। यदि जंगलों में बाघ नहीं होंगे, तो शाकाहारी जीवों (जैसे चीतल, सांभर) की संख्या अनियंत्रित रूप से बढ़ जाएगी। परिणाम यह होगा कि शाकाहारी जीवों के लिए वनस्पति कम पड़ जाएगी, वे वनों से निकलकर कृषि क्षेत्रों और मानव बस्तियों को नष्ट करेंगे, जिससे अंततः पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन ही बिगड़ जाएगा।
बाघ का जैविक और व्यवहारिक स्वभाव बेहद विशिष्ट होता है। एक वयस्क बाघ दूसरे वयस्क बाघ के हस्तक्षेप को बर्दाश्त नहीं करता। एक बाघिन भी अपने शावकों को अधिकतम दो वर्ष तक अपने साथ रखती है, जिसके बाद युवा बाघ को अपनी नई टेरिटरी स्थापित करने के लिए आगे बढ़ना ही पड़ता है। ऐसे में यदि हम उनके जंगलों को मानवीय गतिविधियों, अनियंत्रित बुनियादी ढांचों और पर्यटन के दबाव से मुक्त नहीं रखेंगे, तो वन्यजीवों का इंसानी बस्तियों की ओर रुख करना स्वाभाविक है।
ऐसे में आगे का रास्ता क्या है? बांधवगढ़ की ताजा घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल ‘बाघों की संख्या बढ़ाना’ ही वास्तविक संरक्षण नहीं है, बल्कि बढ़ी हुई आबादी के लिए ‘सुरक्षित वन्यजीव गलियारे’ (वाइल्डलाइफ कॉरीडोर) और पर्याप्त वन क्षेत्र का वैज्ञानिक प्रबंधन करना सबसे बड़ी चुनौती है। इसके लिए निम्नलिखित सुधारात्मक कदम उठाने अनिवार्य हैं।
पहले तो ‘वन्यजीव गलियारों’ का पुनरुद्धार किया जाना जरूरी है। विभिन्न टाइगर रिजर्वों को आपस में जोड़ने वाले जंगलों को अतिक्रमण मुक्त किया जाए, ताकि वयस्क हो रहे बाघ सुरक्षित रूप से नए वनों की ओर प्रवास कर सकें। दूसरे, प्रबंधन का आधुनिकीकरण किया जाना चाहिए। संकटकालीन रेस्क्यू ऑपरेशन्स के दौरान वन विभाग को अत्यधिक कुशल, आधुनिक ट्रैंक्युलाइजिंग उपकरणों से लैस और संवेदनशील होना होगा, ताकि इंसानी जान के साथ-साथ वन्यजीवों की सुरक्षा भी शत-प्रतिशत सुनिश्चित हो सके। तीसरे, मानवीय हस्तक्षेप पर वैज्ञानिक रोक लगानी होगी। जंगलों के ‘बफर’ और ‘कोर’ जोन में बढ़ते अनियंत्रित रिसॉर्ट्स, मानवीय गतिविधियों और पर्यटन के दबाव को कड़ाई से नियंत्रित व प्रतिबंधित करना होगाl सिकुड़ते जंगल, शिकारियों का बढ़ता जाल और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवासों में इंसानी लालच का बढ़ना हमारे पर्यावरण के लिए आत्मघाती साबित हो रहा है। यदि हम अब भी वैज्ञानिक प्रबंधन को लेकर गंभीर नहीं हुए, तो ‘टाइगर स्टेट’ का यह गौरवशाली अध्याय केवल इतिहास के पन्नों में सिमटकर रह जाएगा। बाघों के अस्तित्व को बचाना है, तो जंगलों को इंसानी हस्तक्षेप से दूर, सुरक्षित और प्राकृतिक ही रखना होगा। (सप्रेस)


