देश के कई शहरों में अनियोजित शहरीकरण, घटती हरियाली और आद्रभूमियों, जल निकासी तंत्र में अवरोध तथा बढ़ते कंक्रीट के कारण शहरी बाढ़ का संकट गहराता जा रहा है। मानसून में होने वाली तेज बारिश अब सामान्य जलभराव से आगे बढ़कर जनजीवन, यातायात और अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाली आपदा बन रही है। जलवायु परिवर्तन के दौर में इसके खतरे और बढ़ने की आशंका है।
देश के कई शहर एवं महानगर अभी तक विभिन्न प्रकार के प्रदूषण (वायु, जल, शोर ) कूड़े कचरे के बढ़ते ढ़ेर, तापमान का बढ़ना हरियाली एवं जैव विविधता का घटना तथा आद्भूमियों (वेट लेंट्स) में कमी आदि की समस्याएं से घिर हुए है। इस सारी समस्याओं के साथ पिछले 20-22 वर्षों में एक और नई समस्या मानसून के समय से उभरी है जिसे शहरी बाढ़ (अर्वल फ्लड) कहा गया है। वर्ष 2005 में मानसून के समय जब मुम्बई में जल जमाव की स्थिति लम्बे समय तक बनी रही तो उसे शहरी-बाढ़ पहली बार कहा गया।
मानसून के समय तेज वर्षा से नदी, नालों, तालाब एवं झीलों आदि में पानी की मात्रा बढ़ने से वह आसपास के गांव, शहरों एवं महानगरों के कुछ क्षेत्रों में फैल जाता है यह पानी उचित निकासी के अभाव में लम्बे समय तक जमा रहता है एवं शहरी बाढ़ कहा जाता है। वर्ष 2020 में हैदराबाद, अहमदाबाद एवं मुम्बई शहरी बाढ़ की त्रासदी झेल चुके है। दिल्ली एवं बैगलुरू भी क्रमशः वर्ष 2023 एवं 24 में इस आपदा से रूपस हो चुके है ये कुछ प्रमुख उदाहरण है परंतु वैसे देखा जाय तो वर्षा काल में कई शहर अलग-अलग समय पर इस समस्या को झेलते ही है।
शहरी बाढ़ का एक प्रमुख कारण अनियोजित शहरीकरण बताया गया है। ज्यादातर शहरों के मास्टर प्लान समय पर नहीं आते है एवं इस अवधि में बेहारतीब फैलाव हो जाता है एवं यह भी शहरी बाढ़ का एक कारण बनता है। वैसे भी मास्टर प्लान में भूमि के उपयोग (रहवासी, औद्योगिक, व्यावसायिक क्षेत्र, ग्रीन बेल्ट, सड़कें) पर ही ज्यादा ध्यान दिया जाता है जबकि भूमि की स्थिति (प्रकृति) ढ़लान भूकमापनियता, भूजल स्तर उपेक्षित रहती है।
पानी के निकास की विभिन्न प्रणालियां (छोटे बड़े नाले नदी) में अवरोध या समतली, निचले इलाकों में बसावट, आद्रभूमियों से कमी एवं बढ़ता सीमेंट कांक्रीट का क्षेत्र आदि इस समस्या को गंभीर बना देते हैं।
शहरी बाढ़ से उस क्षेत्र के लोगों का जन-जीवन अस्तव्यस्त हो जाता है एवं घर का सामान (फर्निचर आदि) एवं वाहन (स्कूटर कार) भी खराब हो जाते है। नौकरी पेशा लोग, डाक्टर्स, यात्री एवं विद्यार्थी समय पर गंतव्य स्थान पर नहीं पहुंच पाते है। यातायात संचार एव परिवहन व्यवस्था भी गड़बड़ा जाती है। सड़क हादसे एवं दुर्घटनाएं तथा जल जनित रोगी के फेलाव की संभावना भी बढ़ जाती है। शहरी जन जीवन पर प्रभाव के साथ शहरी बाढ़ के बाढ़ पैदा हालातों को सुधारने में भी काफी धनराशि की जरूरत होती है।
मुम्बई में पिछले 10-12 वर्षों में आयी बाढ़ से बचाव, पानी निकासी एवं सड़कों की मरम्मत आदि पर 07 हजार करोड़ रूपये खर्च किये गये। चेन्नई एवं बैंगलुरू में भी 20 हजार करोड़ खर्च होने का अनुमान है। युनाइटेड ट्रेड एंड डेवलपमेंट एजेंसी एक अन्य संस्था (के.पी.एम.जी.) के साथ हर दस वर्ष में से हुए नुकसान के आंकड़े जारी करती है।
हमारे देश में शहरी बाढ़ के संबंध में जामिया मिलीया इस्लामिया वि.वि. (नई दिल्ली) के डॉ.शमशाद रहमद (सिविल इंजीनियरींग विभाग) तथा प्रो. शिराजुद्दीन एहमद (पर्यावरण विभाग) ने काफी अध्ययन किया है। वर्तमान में जलवायु परिवर्तन से पैदा चरम मौसम की घटनाओं से इस समस्या के ज्यादा गंभीर होने की पूरी संभावना है। देश के पृथ्वी विश्राम मंत्रालय ने चेतावनी स्वरूप एकदम सही कहा है कि भारतीय शहरों में पर्यावरण के प्रति लापरवाही से बचा नहीं गया तो वहां के हालाता नियंत्रण से बाहर होंगे, बरसात में बाढ़ की विभाषी का एवं गर्मी से असहनीय तापमान एवं लू (हीट वेब) के हालात बनेंगे।
शहरी बाढ़ की समस्या को कम करने हेतु सबसे जरूरी यह है कि शहरी नियोजन या उसके विस्तार के समय उसकी भौगोलिक स्थिति अनुसार सारी जल निकास प्राणालियों की उनके प्रवाह मार्ग में सुरक्षित रखा जाए। परम्परागत जल स्त्रोतों के संरक्षण के साथ नए बड़े तालाब भी उचित स्थानों पर बनाए जाएं। हाल ही में आयी स्ंपज-सिटी की अवधारणा के तहत खुले मैदान एवं हरित क्षेत्र भी बचाये जाएं। शहरी बाढ़ की आपदा को लेकर हमारा नजारिया राहत एवं पुर्नवास के साथ रोकथाम के उपायों पर ज्यादा ध्यान देने का होना चाहिये।


