अरावली पर बढ़ते खनन संकट के विरुद्ध संकल्प : अरावली पर्वतमाला को बचाने की पुकार

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विश्व पर्वत दिवस पर अरावली का संकट राष्ट्रीय चिंता का विषय बन गया है। निर्णयों ने पर्वतमाला के बड़े हिस्से को खनन के लिए सौंपने का रास्ता खोल दिया है, जिससे गाँवों की जल–कृषि व्यवस्था, वन्यजीवों का जीवन और पर्यावरणीय संतुलन खतरे में है। जन अभियान अरावली की शेष बची आधी कड़ी को बचाने के लिए संघर्षरत है।


विश्व पर्वत दिवस, 11 दिसंबर

भारत में आज स्थिति ऐसी बन गई है कि एक उद्योगपति के लिए देश के पहाड़, समुद्र, ज़मीन, जंगल और जंगली जानवर—सब कुछ उपलब्ध कराया जा सकता है। अब तो दिल्ली से गुजरात तक फैली 692 किलोमीटर लंबी आड़ी अरावली पर्वतमाला को भी उसके लिए खोलने का रास्ता बना दिया गया है। 20 नवंबर को उच्चतम न्यायालय के निर्णय ने अरावली के भविष्य पर गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। अदालत ने केवल 7–8 प्रतिशत हिस्से को 100 मीटर ऊँचा बचाने की बात कही है, जबकि बाकी पूरे पहाड़ को खनन के लिए परोस दिया गया है। इसे सजाने और उद्योगपति के सामने प्लेट में रखने की जिम्मेदारी जलवायु परिवर्तन और वन मंत्रालय पर है। आश्चर्य की बात यह है कि जिनके कंधों पर प्रकृति बचाने का दायित्व है, वही इस निर्णय पर प्रसन्न दिखाई देते हैं। उनके हलफ़नामे यह साफ करते हैं कि वे विनाशकारी खनन को बढ़ावा देने के लिए तैयार खड़े हैं।

अरावली भारत के बड़े हिस्से में वर्षा कराने वाला महत्वपूर्ण पर्वत है। यह बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से आने वाले बादलों को मिलाकर वर्षा कराता है और पश्चिम से आने वाली रेतीली हवाओं को रोककर रेगिस्तान के विस्तार पर अंकुश रखता है। यही पर्वत दिल्ली-एनसीआर को रेतीले तूफानों से बचाता आया है। लेकिन अनियंत्रित खनन ने अरावली की संरचना को क्षत-विक्षत कर दिया है। धाबड़िया रिपोर्ट में अरावली में 22 गैप सक्रिय बताए गए थे, जिनमें से छह अत्यंत खतरनाक स्थिति में पहुँच गए थे। इन्हें रोकने के लिए भारत सरकार ने जापान से लोन लेकर हरित अरावली परियोजना चलाई थी। जब पूरे अरावली क्षेत्र में खनन बंद किया गया, तब ये गैप धीरे-धीरे बंद होने लगे, वर्षा चक्र सुधरा और रेगिस्तान के फैलाव पर भी नियंत्रण आया। रेगिस्तान और वर्षा का संबंध अग्नि और जल जैसा है रेगिस्तान की तपिश बादलों को ऊपर उछाल देती है और बिना बरसे बादल आगे निकल जाते हैं, जिससे अकाल-बाढ़ जैसी आपदाएँ बढ़ती हैं।

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अब यदि अरावली में बड़े पैमाने पर खनन शुरू होता है, तो यह भारत में अकाल, सुखाड़ और बाढ़ तीनों की तीव्रता को बढ़ाएगा। अरावली का भूजल भंडार जिसे इसका “जल बैंक” कहा जाता है, वर्षा जल को रोककर वर्षभर झरनों को जीवित रखता था। खनन ने इन झरनों को सुखा दिया है, नदियाँ सूख गई हैं और भूजल खाली हो रहा है। इससे कृषि पर गहरा असर पड़ेगा, खाद्य सुरक्षा संकट में आएगी और पानी की कमी से गाँवों के युवाओं में बेरोज़गारी तथा बीमारी बढ़ेगी। खनन का लाभ कुछ लोगों तक सीमित रहेगा, पर बीमारी, प्रदूषण, जलसंकट और आजीविका का नुकसान पूरे समाज को भुगतना पड़ेगा। जीडीपी चाहे बढ़ी हुई दिखाई दे, पर वह बीमारियों से बढ़ी दवा-उद्योग की कमाई होगी। अरावली के लोग निरोगी नहीं रह पाएँगे और दवाइयों के सहारे जीना पड़ेगा।

खनन अरावली के बान, वन-औषधियों और वन्यजीवों को भी समाप्त कर देगा। सरिस्का इसका बड़ा उदाहरण है खनन के कारण सरिस्का ‘बेवाघ’ बन गया था। जब खनन बंद हुआ तो बाघों की संख्या तेजी से बढ़ी। खनन पहले जंगलों को काटता है, फिर जानवरों और अंततः इंसानों को भी। अरावली में खनन शुरू होने से पहले वन साफ किए जाएँगे, फिर वन्यजीव मारे जाएँगे। वनवासी समुदाय, जैव विविधता और वन-औषधियाँ सभी पर संकट गहराएगा। जैव विविधता प्रकृति को स्वस्थ बनाती है, और प्रकृति से ही हमारी संस्कृति फलती-फूलती है। अरावली की सांस्कृतिक-प्राकृतिक विरासत को नष्ट करना हमारी सभ्यता को कमजोर करने जैसा है।

इतिहास में 200 वर्ष पूर्व अरावली भारत की समृद्धि का आधार थी, जब हमारी अर्थव्यवस्था विश्व की 32% जीडीपी के साथ अग्रणी थी। धर्मपाल जी की शोध कहती है कि भारत सचमुच “सोने की चिड़िया” था। लेकिन आज वही सोने की चिड़िया लगातार काटी जा रही है। प्राकृतिक संसाधनों को एक उद्योगपति के लिए खोल देने की प्रवृत्ति ने देश को लाचार, बेकार और बीमार बना दिया है। हमारी जीडीपी कभी 6% तो कभी 3% रह जाती है। जब देश का खजाना और प्राकृतिक संपदा एक ही जगह केंद्रित हो जाए, तब समाज का स्वास्थ्य गिरता ही है।

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आज वह तकनीक, जो सोने की चिड़िया को काटकर उसके सारे अंग निकाल सकती है, एक ही व्यक्ति के हाथ में है। अरावली में मौजूद महत्वपूर्ण खनिजों और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े तत्वों को भी अब उसी को सौंपने जैसी स्थिति बना दी गई है। शायद यही कारण है कि उसकी दृष्टि अचानक इस आधे पहाड़ पर टिक गई है। अरावली के मूल आदिवासी भी हटाए जा सकते हैं ताकि खनन का रास्ता साफ हो सके। वन्यजीवों, औषधीय वनस्पतियों और जलवायु संतुलन की बात करने वाला कोई नहीं बचा। जलवायु परिवर्तन, रेगिस्तान का विस्तार, प्रदूषण, वर्षा चक्र का टूटना इन सबको यह व्यवस्था अरावली से जुड़ा मानने को तैयार नहीं है।

इतना ही नहीं, देश के तीनों स्तंभ—न्यायपालिका, विधानपालिका और कार्यपालिका—भी उसकी इच्छा के अनुरूप झुकते दिखते हैं। जैसे रावण ने सब कुछ अपने नियंत्रण में कर लिया था, वैसे ही आज लोकतंत्र भी एक ही धुरी पर घूमता प्रतीत होता है। अरावली पर आया यह निर्णय उसी प्रवृत्ति का ताज़ा प्रमाण है।

प्रधानमंत्री COP-15 और COP-30 में जलवायु को लेकर बड़े-बड़े वादे करके आते हैं, पर क्या उन वादों का पालन जरूरी है? शायद नहीं—क्योंकि निर्णय अंततः उसी उद्योगपति की सुरक्षा और संपत्ति बढ़ाने के लिए लिए जाते हैं। अमेरिका के साथ भारत के संबंधों में आई खटास का कारण भी वही बताया जाता है।

11 दिसंबर 2025, विश्व पर्वत दिवस पर अरावली विरासत जन अभियान अरावली को बचाने के लिए खड़ा हुआ है ताकि रेगिस्तान की गर्म हवाएँ पूर्व की ओर न बढ़ें। आधी अरावली, उसकी संस्कृति, प्रकृति, वनवासी, जीव-जन्तु, पेड़-पौधे सब आज जयपुर में एकजुट होकर संकल्प ले रहे हैं। आधा पहाड़ खुद भी अपने विरोधियों का सामना करने की शक्ति इकट्ठा कर रहा है।

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