विश्व पर्यावरण दिवस केवल पौधे लगाने का संदेश नहीं देता, बल्कि प्रकृति के प्रति जिम्मेदार जीवनशैली अपनाने का आह्वान करता है। जल संरक्षण, प्लास्टिक का कम उपयोग, प्रदूषण नियंत्रण, जैविक खेती और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपभोग जैसे छोटे-छोटे प्रयास पर्यावरण संरक्षण की मजबूत नींव बन सकते हैं। बढ़ते जलवायु संकट और ग्लोबल वार्मिंग के दौर में हर व्यक्ति की भागीदारी पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गई है।
निर्भय सिंह
विश्व पर्यावरण दिवस हर साल 5 जून को मनाया जाता है। इसकी शुरुआत संयुक्त राष्ट्र द्वारा 1972 में की गई थी,और पहला विश्व पर्यावरण दिवस आधिकारिक तौर पर 5 जून 1973 को मनाया गया था। पर्यावरण संरक्षण,जलवायु परिवर्तन,और प्रकृति के सामने आने वाली चुनौतियों के बारे में दुनिया भर में जागरूकता बढ़ाना।
जैसा ही हमारे मन, मस्तिष्क एवं मुंह में पर्यावरण शब्द आता है तो अधिकतर लोग यह मान लेते है कि पेड़ लगाये बात तो सही भी है पेड़ होंगे तो जलवायु और ठीक रहेगी ,ठंडा महसूस होगा।
हम ऐसा माने की जितना भी हम धरती से लेकर ज्यादा से ज्यादा उपभोग करेंगे उतना ही पर्यावरण खराब कर रहे है | आज यह सिर्फ भारत की समस्या नहीं है यह एक ग्लोबल समस्या बन रही है | क्या यह संभव है कि आपके घर में आने वाले मेहमान को गिलास में भरकर पानी न दें उसके बदले खाली गिलास और जग या बॉटल में भरा हुआ पानी दें ताकि बचा हुआ पानी फेंका न जा सके जितनी प्यास उतना पानी जग या बॉटल से ले लेंगे।
आप जरूर पौधारोपण हरियाली लाने के लिए करें और करना भी चाहिए मन से,दिल से, धन से,लगन से,ताकत से लेकिन जितने पौधे जुलाई अगस्त में लगाए गए थे, उतने में से मई जून की गर्मी से कितने पौधे जीवित बचे ये ज्यादा महत्वपूर्ण है।
पर्यावरण और प्रकृति : पर्यावरण के जैविक घटकों में सूक्ष्म जीवाणु से लेकर कीड़े-मकोड़े, सभी जीव-जंतु और पेड़-पौधों के अलावा उनसे जुड़ी सारी जैव क्रियाएं और प्रक्रियाएं भी शामिल हैं। जबकि पर्यावरण के अजैविक घटकों में निर्जीव तत्व और उनसे जुड़ी प्रक्रियाएं आती हैं, जैसे पर्वत, चट्टानें, नदी, हवा और जलवायु के तत्व इत्यादि। सामान्य अर्थों में यह हमारे जीवन को प्रभावित करने वाले सभी जैविक और अजैविक तत्वों, तथ्यों, प्रक्रियाओं और घटनाओं से मिलकर बनी इकाई है। यह हमारे चारों ओर व्याप्त है और हमारे जीवन की प्रत्येक घटना इसी पर निर्भर करती और संपादित होती हैं। मनुष्यों द्वारा की जाने वाली समस्त क्रियाएं पर्यावरण को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं। इस प्रकार किसी जीव और पर्यावरण के बीच का संबंध भी होता है,जो कि एक-दूसरे पर आश्रित है।
मानव हस्तक्षेप के आधार पर पर्यावरण को दो भागों में बांटा जा सकता है, जिसमें पहला है प्राकृतिक या नैसर्गिक पर्यावरण और मानव निर्मित पर्यावरण। यह विभाजन प्राकृतिक प्रक्रियाओं और दशाओं में मानव हस्तक्षेप की मात्रा की अधिकता और न्यूनता के अनुसार है।
आज के समय में पर्यावरण प्रदूषण बहुत तेजी से बढ़ रहा है। बढ़ती जनसंख्या और बड़ी-बड़ी इमारतों के कारण पर्यावरण की प्रकृति नष्ट हो रही है। हर जगह घने वृक्ष काट कर बड़ी बिल्डिंगों का निर्माण करना पर्यावरण और प्रकृति के साथ छेड़छाड़ हैं। इतना ही नहीं जहां वाहनों का धुआं,मशीनों की आवाज, खराब रासायनिक जल आदि की वजह से, वायु प्रदूषण,जल प्रदूषण,ध्वनि प्रदूषण हो रहा है। जिसके कारण हमें अनेक बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है।
आज हमें सबसे ज्यादा जरूरत है पर्यावरण संकट के मुद्दे पर आम जनता और पाठकों को जागरूक करने की है । पर्यावरणीय समस्याएं जैसे प्रदूषण,जलवायु परिवर्तन इत्यादि मनुष्य को अपनी जीवनशैली के बारे में पुनर्विचार के लिए प्रेरित कर रही हैं और अब पर्यावरण संरक्षण और पर्यावरण प्रबंधन की आवश्यकता पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
ग्लोबल वार्मिंग से बढ़ता तापमान :
वैज्ञानिकों का कहना है कि हमारी धरती अपनी धुरी से 1 डिग्री तक खिसक गई है और ग्लोबल वार्मिंग शुरू हो चुकी है। इसके चलते लगातार मौसम बदलता जा रहा है। तापमान बढ़ रहा है। जलवायु परिवर्तन हो रहा है।
यह क्यों हो रहा है? : वैज्ञानिक कहते हैं कि वायु प्रदूषण (ग्रीन हाउस गैसों) के कारण हो रहा है। प्रदूषण कई तरह का होता है। हमारे वाहनों से निकलने वाला धुंआ,कोयले के प्लांट से निकलने वाला धुआं, कारखनों से निकलने वाला धुआं और अन्य कई कारणों से धरती के वातावरण में कार्बन डाई-आक्साइड की मात्रा बढ़ती जा रही है जिसके चलते धरती का तापमान लगभग एक डिग्री से ज्यादा बढ़ गया है और ऑक्सीजन की मात्रा कम होती जा रही है। अब तो गर्मी में देश के अधिक शहरों का अधिकतम तापमान 50 डिग्री रहने लगा है। पहले 100 या 200 साल के बीच में अगर तापमान में एक सेल्सियस की बढ़ोतरी हो जाती थी तो उसे ग्लोबल वॉर्मिंग की श्रेणी में रखा जाता था। लेकिन पिछले 100 साल में अब तक 0.4 सेल्सियस की बढ़ोतरी हो चुकी है जो बहुत खतरनाक है।
आने वाले समय में क्या होगा : प्राकृतिक तौर पर पृथ्वी की जलवायु को एक डिग्री ठंडा या गर्म होने के लिए हजारों साल लग सकते हैं। पृथ्वी की जलावायु में जो बदलाव होते हैं वो ज्वालामुखी गतिविधि के कारण होती है जैसे वन जीवन में बदलाव, सूर्य के रेडियेशन में बदलाव तथा और प्राकृतिक परिवर्तन, ये सब कुदरत का जलवायु चक्र है, लेकिन पिछले सालों में मानव की गतिविधियां अधिक बढ़ने के कारण यह परिवर्तन देखने को मिला है जो कि मानव अस्तित्व के लिए खतरनाक है। इस ग्लोबल वार्मिंग के कारण एक ओर जहां पीने के पानी का संकट गहराएगा वहीं मौसम में तेजी से बदलावा होगा और तापमान बढ़ने से ठंड के दिनों में भी गर्मी लगेगी। ऐसे में यह सोचा जा सकता है कि यह कितना खतरनाक होगा। धरती पर रहने लायक जगह सीमित होती जाएगी तब लोग वहां रहने के बारे में सोचेंगे जहां तापमान कम हो। ऐसे में हर देश चाहेगा उस जगह पर कब्जा करना जहां पानी हो और जहां पर रहने लायक तापमान हो। इस सोच के चलते युद्ध अभी से ही जारी हो चुका है।
हम क्या करें ?
• एक-एक बूंद पानी को बचाए और उसे धरती में जाने दे |
• घर के छतों में पानी को वाटर हार्वेस्टिंग लगाकर पानी को धरती के अंदर ले जाये न की रोड या नालियों में बहाएं।
• पांच पौधे जरूर लगाएं और उन्हें जीवित रखें।
• अपने घरों का कचरा प्लास्टिक से अलग रखे |
• प्लास्टिक जितना कम उपयोग कर सकते है जरुर करें |
• गाडियों का कम से कम उपयोग करे यदि जरुरी है तो भी शेयरिंग पद्धति अपनाए |
• प्राकृतिक,जैविक खाद्य पदार्थों को ज्यादा उपयोग में लाने की आदत डाले |
• पशुपालन,गाय पालन को बढावा दे ताकि जैविक खेती को बढावा मिल सके |
• देशी पुराने बीजों,अनाजों को ज्यादा से ज्यादा प्रोत्साहित करें |
• पुरानी गांवों की पद्तियों को पुर्नजीवित करने में मदद करें |
• कार्बन उत्सर्जित वस्तुओं का कम से कम उपयोग करें |
2026 का मेजबान देश: अज़रबैजान
प्रत्येक वर्ष,विश्व पर्यावरण दिवस की मेजबानी एक अलग देश करता है जहाँ आधिकारिक समारोह आयोजित होते हैं। 2026 के लिए मेजबान देश अज़रबैजान है । जो समृद्ध जैव विविधता का निर्माण करती हैं। देश नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश कर रहा है,जंगलों का विस्तार कर रहा है और शून्य-अपशिष्ट पहलों को बढ़ावा दे रहा है,जो इसे इस वैश्विक अभियान के लिए एक स्वाभाविक भागीदार बनाता है। 2024 में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन के मेजबान के रूप में,अज़रबैजान ने वैश्विक जलवायु एजेंडा को आगे बढ़ाया, जलवायु वित्त और कार्बन बाजारों पर ऐतिहासिक निर्णय हासिल किए,साथ ही जलवायु कार्रवाई को जैव विविधता,ऊर्जा परिवर्तन,जल,कृषि और सामाजिक प्रभाव से जोड़ने वाली पहल शुरू की।
निर्भय सिंह मानव जीवन विकास समिति बिजौरी कटनी में सचिव पद पर है, जो प्राकृतिक खेती जैविक खेती पानी संरक्षण के काम में सघन रूप से लगे है।

