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मध्यप्रदेश में भारी बारिश के बढ़ते खतरे पर चेतावनी, जलवायु अनुकूलन नीति की मांग

जबलपुर 9 जुलाई । मध्यप्रदेश में लगातार हो रही भारी बारिश और असामान्य मौसमीय घटनाओं को लेकर बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ ने गहरी चिंता जताई है। संघ के राज कुमार सिन्हा ने जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा है कि राज्य के विभिन्न हिस्सों में वर्षा की तीव्रता और आवृत्ति में लगातार वृद्धि हो रही है, जो जलवायु परिवर्तन के प्रत्यक्ष प्रभावों की ओर संकेत करती है। उन्होंने सरकार से मांग की है कि बदलते मौसम के मिज़ाज को देखते हुए एक प्रभावी जलवायु अनुकूलन रणनीति तत्काल तैयार की जाए।

सिन्हा ने कहा कि वर्षा का मौजूदा स्वरूप केवल सामान्य मौसमी बदलाव नहीं है, बल्कि यह संकेत करता है कि किस प्रकार वातावरण में बढ़ती नमी और वायुमंडलीय अस्थिरता ने चरम वर्षा की घटनाओं को बढ़ावा दिया है। उनके अनुसार, अब ज़रूरत इस बात की है कि प्रत्येक वर्ष के बारिश के आँकड़ों का वैज्ञानिक विश्लेषण किया जाए — यह देखा जाए कि कुल वर्षा का कितना प्रतिशत केवल एक या दो दिनों में अत्यधिक रूप से गिरता है। इस दिशा में नियमित निगरानी और शोध की आवश्यकता है।

हाल के दिनों में मध्यप्रदेश में अब तक औसतन 10.8 इंच बारिश रिकॉर्ड की गई है, जो कुल सीजन का लगभग 30% हिस्सा है।सबसे ज्यादा बारिश मंडला जिले में हुई है, यहां 58.8 इंच पानी गिर चुका है, जबकि सिवनी में 55.1 इंच।आम तौर पर बारिश को “भारी बारिश” के रूप में वर्गीकृत किया जाता है जब प्रति घंटे 7.6 मिमी से अधिक या उसके बराबर पानी गिरता है। चुंकि भारी बारिश प्राकृतिक आपदाओं का कारण बन सकती है, इसलिए भारी बारिश की घटनाओं का पूर्वानुमान लगाने की दिशा में ठोस प्रयास आवश्यक है।जीवाश्म ईंधनों के जलने और वनों की कटाई से पृथ्वी गर्म हो रहा है, जिससे विश्व भर में लगातार और तीव्र बारिश हो रही है।

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विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे वैश्विक तापमान बढ़ रहा है, वैसे-वैसे हवा अधिक नमी खींच रही है, जिससे तीव्र और दीर्घकालिक बारिश की संभावना भी बढ़ती जा रही है। कम वायुमंडलीय दबाव वाले क्षेत्रों में यह नमी तेजी से संघनित होकर भारी बारिश में परिवर्तित हो जाती है। यही कारण है कि भारी वर्षा की घटनाएं अब अधिक व्यापक और तीव्र हो रही हैं।
सिन्हा का कहना है कि अब केवल कुल वर्षा नहीं, बल्कि वर्षा के वितरण पर भी ध्यान देने की ज़रूरत है। एक तरफ अत्यधिक बारिश से बाढ़ और भूस्खलन का खतरा बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ लंबे सूखे और मानसून की अनिश्चितता ने भी किसानों की आजीविका को असुरक्षित बना दिया है। चरम मौसम की घटनाएं—चाहे वह सूखा हो या अतिवृष्टि—लगातार बढ़ रही हैं और इससे खाद्य सुरक्षा, जन-स्वास्थ्य और पारिस्थितिक संतुलन तीनों पर खतरा मंडरा रहा है।

बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ ने सरकार से यह मांग की है कि देश के विभिन्न हिस्सों में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का अध्ययन करते हुए एक व्यापक जलवायु अनुकूलन नीति तैयार की जाए। यह नीति ऐसी हो जो न केवल जान-माल की सुरक्षा सुनिश्चित करे, बल्कि किसानों को फसल क्षति से बचाने और खाद्य सुरक्षा को स्थिर बनाए रखने में भी मददगार हो।

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