विचार

लोकतंत्र को अपने वैभव का इंतज़ार

क्रिकेट की थकी और उबाऊ होती दुनिया में जैसे वैभव सूर्यवंशी अचानक आकर खेल की ऊर्जा, सौंदर्य और उम्मीद लौटा देता है, वैसे ही भारतीय समाज और लोकतंत्र भी आज किसी ऐसे ही साहसी, ताज़ा और जीवंत हस्तक्षेप की प्रतीक्षा…

नेहरू के पुण्य स्मरण के बहाने ‘भारतीयता’ की खोज !

क्या आज का भारत उस ‘भारतीयता’ से दूर होता जा रहा है जिसकी कल्पना पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में की थी? बदलते राजनीतिक-सामाजिक माहौल, धार्मिक पहचान के बढ़ते आग्रह और नागरिक स्वतंत्रताओं पर उठते सवालों के बीच…

यदि महिलाओं के हाथ में अर्थव्यवस्था दी तो देश की जीडीपी उछाल मारेगी – मेजर जनरल डॉ. माधुरी कानिटकर

अभ्यास मंडल की 66 वीं ग्रीष्मकालीन व्याख्यान माला समापन व्याख्यान इंदौर, 21 मई। मेजर जनरल डॉ. माधुरी कानिटकर ने कहा है कि देश में महिला आरक्षण लागू होने से पहले महिलाओं को इस व्यवस्था के लिए तैयार करना समाज की…

इजरायल की उत्पत्ति : एक जटिल संघर्ष की शुरुआत

पश्चिम एशिया में जारी भीषण मारकाट का खलनायक और अमेरिका समेत तमाम खाड़ी के देशों को हांकने वाला इजरायल आखिर दूर-दराज के उस इलाके में पैदा कैसे हुआ? क्या जहां वह है, वह उसकी पारंपरिक ‘पितृ-भूमि’ है? क्या है, इजरायल…

बिन पानी सब सून . . .

जीवन की अमूल्य जरूरत पानी के प्रति हमारी बेपरवाही ने अब ना तो उसे पर्याप्त मात्रा में छोड़ा है और न ही उसकी शुद्धता बरकरार रखी है। आखिर क्यों हो रही है, पानी के प्रति यह बदसलूकी? कैसे हमारी प्यास…

पंचायती राज : लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करने की ऐतिहासिक पहल

भारत में पंचायती राज व्यवस्था लोकतंत्र को जमीनी स्तर तक पहुंचाने की एक महत्वपूर्ण पहल है, जिसे 73वें संविधान संशोधन के जरिए संवैधानिक दर्जा मिला। वैदिक काल से चली आ रही स्थानीय स्वशासन की परंपरा को आधुनिक स्वरूप देते हुए…

पंचायत राज : विकेंद्रीकरण का सपना या जमीनी हकीकत से भटका तंत्र?

भारत में 73वें संविधान संशोधन के जरिए मजबूत की गई पंचायत राज व्यवस्था का उद्देश्य ग्राम स्तर पर लोकतंत्र, विकास और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देना था। लेकिन 33 वर्षों बाद भी यह व्यवस्था अपनी मूल भावना से भटकती दिख…

कृत्रिम बुद्धिमत्ता बनाम प्रकृति : अरावली और हमारे संवैधानिक दायित्व

कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार प्रतीत होने वाला अरावली संबंधी सरकारी एफिडेविट भविष्य के लिए गंभीर चिंता पैदा करता है। इसमें न प्रकृति की समझ झलकती है, न सांस्कृतिक दृष्टि। संवैधानिक दायित्वों और अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण प्रतिबद्धताओं की अनदेखी से पहाड़ों का…

‘जादूगर’ शब्द से क्यों डरती है सत्ता?

संसद में ‘जादूगर’ जैसे हल्के-फुल्के शब्द पर मचा विवाद यह संकेत देता है कि भारतीय राजनीति से हास्य और सहजता तेजी से गायब हो रही है। संवाद की जगह कटुता और आक्रामकता ने ले ली है, जहां व्यंग्य भी असहजता…

तीसरे विश्वयुद्ध की आहट और महात्‍मा गांधी

रूस-यूक्रेन, इजरायल-गाजा के बाद अब युद्ध पश्चिम एशिया में केन्द्रित होता दिख रहा है। क्या समूचे, भरे-पूरे, जीवन्त देशों को एक-एक करके समाप्त करने का यह कारनामा कच्चे माल, उसे ‘पकाने’ में लगने वाली जरूरी ऊर्जा और बेचने के लिए…