विचार-विमर्श के ‘बीज-मंत्र’
बदहाली के मौजूदा समय से पार पाने या कम-से-कम उसका एक रास्ता पहचानने के लिए हम आखिर किसके पास जाएं? क्या हमें इस मशक्कत में अपने समय के लेखकों, संपादकों की कुछ मदद मिल सकेगी? हम लोगों के वरिष्ठ साथी…
‘नागरिकों’ को ‘शरणार्थियों’ में बदलने का षड्यंत्र तो नहीं ?
क्या किसी नागरिक की पहचान उसके जीवन, समाज और इतिहास से तय होगी या केवल सरकारी अभिलेखों से? वरिष्ठ पत्रकार आर. राजगोपाल का मामला इस प्रश्न को नई गंभीरता से सामने लाता है। जब पासपोर्ट, आधार और मतदाता पहचान पत्र…
जल स्वराज : संपूर्ण क्रांति की नई पहचान
संपूर्ण क्रांति की असली कहानी सत्ता परिवर्तन से आगे शुरू होती है। यह उन लोगों की कहानी है जिन्होंने आंदोलन की चेतना को जीवन का संकल्प बनाया और जल, जंगल, जमीन, ग्राम स्वराज तथा सामाजिक पुनर्निर्माण के माध्यम से बदलाव…
कड़े कानूनों के बावजूद क्यों नहीं थम रहा बच्चों का शोषण ?
देश में बाल अधिकारों की सुरक्षा के लिए सख्त कानून और संवैधानिक प्रावधान मौजूद हैं, फिर भी बाल मजदूरी, तस्करी, यौन शोषण और बच्चों के लापता होने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग और मानवाधिकार…
लोकतंत्र को अपने वैभव का इंतज़ार
क्रिकेट की थकी और उबाऊ होती दुनिया में जैसे वैभव सूर्यवंशी अचानक आकर खेल की ऊर्जा, सौंदर्य और उम्मीद लौटा देता है, वैसे ही भारतीय समाज और लोकतंत्र भी आज किसी ऐसे ही साहसी, ताज़ा और जीवंत हस्तक्षेप की प्रतीक्षा…
नेहरू के पुण्य स्मरण के बहाने ‘भारतीयता’ की खोज !
क्या आज का भारत उस ‘भारतीयता’ से दूर होता जा रहा है जिसकी कल्पना पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में की थी? बदलते राजनीतिक-सामाजिक माहौल, धार्मिक पहचान के बढ़ते आग्रह और नागरिक स्वतंत्रताओं पर उठते सवालों के बीच…
यदि महिलाओं के हाथ में अर्थव्यवस्था दी तो देश की जीडीपी उछाल मारेगी – मेजर जनरल डॉ. माधुरी कानिटकर
अभ्यास मंडल की 66 वीं ग्रीष्मकालीन व्याख्यान माला समापन व्याख्यान इंदौर, 21 मई। मेजर जनरल डॉ. माधुरी कानिटकर ने कहा है कि देश में महिला आरक्षण लागू होने से पहले महिलाओं को इस व्यवस्था के लिए तैयार करना समाज की…
इजरायल की उत्पत्ति : एक जटिल संघर्ष की शुरुआत
पश्चिम एशिया में जारी भीषण मारकाट का खलनायक और अमेरिका समेत तमाम खाड़ी के देशों को हांकने वाला इजरायल आखिर दूर-दराज के उस इलाके में पैदा कैसे हुआ? क्या जहां वह है, वह उसकी पारंपरिक ‘पितृ-भूमि’ है? क्या है, इजरायल…
बिन पानी सब सून . . .
जीवन की अमूल्य जरूरत पानी के प्रति हमारी बेपरवाही ने अब ना तो उसे पर्याप्त मात्रा में छोड़ा है और न ही उसकी शुद्धता बरकरार रखी है। आखिर क्यों हो रही है, पानी के प्रति यह बदसलूकी? कैसे हमारी प्यास…
पंचायती राज : लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करने की ऐतिहासिक पहल
भारत में पंचायती राज व्यवस्था लोकतंत्र को जमीनी स्तर तक पहुंचाने की एक महत्वपूर्ण पहल है, जिसे 73वें संविधान संशोधन के जरिए संवैधानिक दर्जा मिला। वैदिक काल से चली आ रही स्थानीय स्वशासन की परंपरा को आधुनिक स्वरूप देते हुए…









