करीब साढ़े चार दशक पहले ‘सप्रेस’ के सम्पादक को दिए एक वीडियो साक्षात्कार में ‘तिल्दा-आश्रम’ के आंगन में राजगोपाल पीवी ने कहा था कि उनके पास ‘गांधी विचार से प्रेरित सौ-सवा सौ मजबूत, प्रशिक्षित कार्यकर्ता, करीब एक लाख रुपए और…
हम 10 दिसंबर को मानवाधिकारों का उत्सव मनाते है। उस दिन की स्मृति में जब संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1948 में मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा को अपनाया था। यह घोषणा हमारे समाजों के मानवाधिकार ढांचे की रीढ़ है, जहां हममें…
आज के दौर में औपचारिक आर्थिक ताने-बाने को बनाए रखने के लिए बैंक बेहद अहम भूमिका निभाते हैं। खासियत यह है कि बैंकों की यह सेवा छोटे-छोटे, स्थानीय ग्रामीणों से लगाकर राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचती है। क्या और कैसा है,…
भारतीय मध्यवर्ग आज मिथ्या गौरव और भय के मिश्रण से गढ़े आंकड़ों के सहारे एक वैकल्पिक यथार्थ रच रहा है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और अर्थशास्त्रियों को अविश्वसनीय ठहराकर वह ऐसी चमकीली तस्वीर चाहता है जिसमें तेज़ विकास, बढ़ता ख़तरा और एक…
उन्नीसवीं शताब्दी के सामाजिक अंधकार में जाति, लिंग और शिक्षा के प्रश्नों पर सबसे तेज स्वर उठाने वालों में महात्मा ज्योतिराव फुले का नाम अग्रणी है। रूढ़ियों और अन्याय के विरुद्ध उनके जमीनी संघर्ष ने भारतीय समाज में परिवर्तन की…
शारीरिक और यौन हिंसा से अक्सर निपटने वाली महिलाओं के सामने ‘डिजिटल हिंसा’ के रूप में अब एक नया ‘जानवर’ खड़ा हो गया है। विडंबना यह है कि आमतौर पर अदृश्य इस जानवर से निपटने के लिए कोई प्रभावी हथियार…
भारतीय जीवन-दर्शन का मूल प्रकृति और संस्कृति के उस सनातन योग में निहित है, जिसने पंचमहाभूतों से सृष्टि की रचना की और मानव जीवन को आचार-विचार, आरोग्य, संतुलन व समृद्धि का मार्ग दिया। जैसे-जैसे यह योग टूटता गया, आर्थिकी, पारिस्थितिकी…
बच्चों के प्रति अपने स्नेह और विश्वास के कारण पंडित जवाहरलाल नेहरू भारतीय बाल-चेतना के सबसे बड़े संरक्षक माने जाते हैं। उनके जन्मदिवस 14 नवम्बर का ‘बाल दिवस’ के रूप में मनाया जाना इसी भावना का प्रतीक है। नेहरू का…
देश की राजनीतिक हलचल और चुनावी बयानबाजी के बीच मुद्रा बाजार में गंभीर उतार-चढ़ाव नजर आ रहा है। डॉलर के मुकाबले रुपये की तेज गिरावट और सोने के भंडार को लेकर उठे सवालों पर न तो स्पष्ट संवाद हो रहा…
बिहार, जिसे भारतीय लोकतंत्र की प्रयोगशाला कहा गया है, आज फिर एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। ऐतिहासिक राजनीतिक चेतना और आंदोलनों की भूमि होने के बावजूद, यहां चुनावी परिदृश्य अब भी जाति, वर्चस्व, बूथ प्रबंधन और पैसों के प्रभाव…