Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

रघुराज सिंह

Shyam Benegal : फिल्म के व्याकरण को बदलने वाले

इसी हफ्ते की शुरुआत में श्याम बेनेगल का सदा के लिए विदा होना हमारे दौर के एक ऐसे युग की समाप्ति का संकेत है जिसने आजादी के बाद बनते देश की जद्दो-जेहद को अपनी फिल्मों के जरिए उजागर किया था।…

नर्मदा के नातेदार !

‘‘आप नर्मदा को चाहने वाले हैं, और मैं भी नर्मदा को चाहने वाला हूँ। इसलिए हम भाई-भाई हैं।’’ यह कहने वाले लंबी सफे़द दाढ़ी, शैव तपस्वियों का केसरिया बाना पहने एक संन्यासी थे। यह वर्ष 1943 का साल था। नर्मदा नदी के उद्गम और…

‘गांधी की महिला फौज’ : एक रोचक किताब

2 अक्‍टूबर : गांधी जयंती पर विशेष महिला-आरक्षण की मौजूदा बहसा-बहसी के बीचम-बीच अरविन्द मोहन की ‘गांधी की महिला फौज’ किताब हमें एक ऐसे नायाब अनुभव से रू-ब-रू करवाती है जिसमें बिना किसी तामझाम के गांधी ने अपनी पलटन में…

2014 के बाद का भारत : संकट में गणतंत्र

76 वें स्‍वतंत्रता दिवस पर विशेष आजादी के लगभग साढे़ सात दशकों बाद यह सीधा, सरल और सहज सवाल तो उठता ही है कि आखिर इतने सालों में हमने क्या हासिल किया? हम कहां पहुंचे? इस सवाल का कई लोगों…

स्मृति कुमार गंधर्व : सौ साल के स्वर

ऐसे समय में जब देश व प्रदेश के अधिकांश मीडिया संस्थान सदी के अप्रतिम गायक कुमार गंधर्व को उनके सौवें जन्म दिन पर लगभग विस्मृत कर चुके हो, उन्हें बेहद निजी रूप से याद करना एक कमाल ही है। प्रस्तुत…

महात्‍मा गांधी – कुछ बेतरतीब नोट्स

रोजमर्रा के आमफहम जीवन को फिलहाल छोड भी दें तो महात्मा गांधी की ‘जयन्ती’ और ‘पुण्यतिथि’ की सालाना कवायद पर हम आम लोग कैसा महसूस करते हैं? ‘सप्रेस’ ने यही सवाल अपने एक वरिष्ठ साथी से किया। प्रस्तुत है, अपने…

महात्मा गांधी 153वां जन्मदिवस : हमारे दौर का ‘हिन्द स्वराज’

गाँधी की बात की जाए और ‘हिन्द स्वराज’ की बात न हो, यह मुमकिन नहीं। एक तरह से गांधी विचार का सारतत्व उम्र के चालीसवें साल में लिखी उनकी इसी छोटी सी पुस्तिका में है, लेकिन क्या ‘हिन्द स्वराज’ आज…

टिप्पणी : किस्सों की ‘रेत-समाधि’

डेढ़ महीने पहले हिन्दी की लेखिका गीतांजलि श्री के उपन्यास ‘रेत समाधि’ के अंग्रेजी अनुवाद ‘टूम ऑफ सैंड’ को ‘अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार’ से नवाजा गया है। इस प्रतिष्ठित पुरस्कार से सम्मानित होने वाला किसी भारतीय भाषा का यह पहला उपन्यास…

गांधी शहादत दिवस : गांधी को प्रासंगिक बनाते ‘अन्नदाता’

30 जनवरी : गांधी शहादत दिवस गांधी की शहादत के लंबे 74 सालों बाद भी हम यदा-कदा उनकी प्रासंगिकता को लेकर सवाल सुनते-उठाते रहते हैं, लेकिन गांधी हैं कि तरह-तरह से हमें अपनी मौजूदगी जता देते हैं। हाल का, दिल्ली…

हिंसक समाज में गांधी

गांधी के अहिंसक तौर-तरीकों से आजाद हुए हमारे देश में अब हिंसा व्यापक और गहरे रूपों में हर कहीं मौजूद है। अहिंसा को स्थापित करने में लगे कुछ लोगों को समाज ने हाशिए पर बैठा दिया है। ऐसे में विकास…