क्रिकेट की थकी और उबाऊ होती दुनिया में जैसे वैभव सूर्यवंशी अचानक आकर खेल की ऊर्जा, सौंदर्य और उम्मीद लौटा देता है, वैसे ही भारतीय समाज और लोकतंत्र भी आज किसी ऐसे ही साहसी, ताज़ा और जीवंत हस्तक्षेप की प्रतीक्षा…
पश्चिम बंगाल चुनाव ने सिर्फ सत्ता परिवर्तन की संभावनाओं को नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की मौजूदा हालत को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है। भारी सुरक्षा, प्रशासनिक हस्तक्षेप, भय और अविश्वास के माहौल ने यह सवाल तेज कर दिया…
करीब डेढ़ दशक बाद होने जा रही ‘जनगणना 2027’ में जातियों की बहुप्रचारित मर्दुमशुमारी के अलावा उन असंख्य प्रवासी-मजदूरों का भी महत्व होना चाहिए जो हमारे ‘जीडीपी’ को अनजाने में आसमान तक पहुंचाने में लगे हैं। आखिर किसी भी योजना…
भारत में पंचायती राज व्यवस्था लोकतंत्र को जमीनी स्तर तक पहुंचाने की एक महत्वपूर्ण पहल है, जिसे 73वें संविधान संशोधन के जरिए संवैधानिक दर्जा मिला। वैदिक काल से चली आ रही स्थानीय स्वशासन की परंपरा को आधुनिक स्वरूप देते हुए…
भारत में 73वें संविधान संशोधन के जरिए मजबूत की गई पंचायत राज व्यवस्था का उद्देश्य ग्राम स्तर पर लोकतंत्र, विकास और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देना था। लेकिन 33 वर्षों बाद भी यह व्यवस्था अपनी मूल भावना से भटकती दिख…
संसद में ‘जादूगर’ जैसे हल्के-फुल्के शब्द पर मचा विवाद यह संकेत देता है कि भारतीय राजनीति से हास्य और सहजता तेजी से गायब हो रही है। संवाद की जगह कटुता और आक्रामकता ने ले ली है, जहां व्यंग्य भी असहजता…
महिला आरक्षण विधेयक को लेकर केंद्र सरकार का विशेष सत्र बुलाना जहां एक ओर नारी सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम बताया जा रहा है, वहीं इसके पीछे राजनीतिक रणनीति के सवाल भी उठ रहे हैं। परिसीमन, जनगणना और चुनावी…
77वें गणतंत्र दिवस पर भारत अपनी उपलब्धियों पर गर्व करते हुए और चुनौतियों से आँख मिलाते हुए आत्ममंथन करता दिखाई देता है। युवा शक्ति, महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और तकनीकी प्रगति देश को नई ऊँचाइयों तक ले जा रही है,…
संविधान का सर्वाधिक महत्वपूर्ण काम उसे अमल में लाना है, खासकर उन लोगों के लिए जो अपनी आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों के चलते आजादी के अस्सी साल बाद भी हाशिये पर ही हैं। राजस्थान हाईकोर्ट ने हाल में एक…