Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

लोकतंत्र

भारत में गणतंत्र : चुनौतियाँ, विफलताएँ और समाधान

हम अपने गणतंत्र की 77वीं सालगिरह मना रहे हों, लेकिन क्या सचमुच हमारा लोकतंत्र उस तरफ बढ़ रहा है जिसकी उम्मीद हमने करीब आठ दशक पहले की थी? मसलन–क्या हमारी दो सदनों–लोकसभा, राज्यसभा–वाली संसद और राज्यों की विधानसभाएं अपेक्षित अवधि…

‘अमीरों की सत्ता का प्रतिरोध’ : ‘डब्ल्यूईएफ’ में जारी ‘ऑक्सफैम’ की रिपोर्ट

दुनियाभर के दिमागों को दुरुस्त करने वाली ‘ऑक्सफैम’ की रिपोर्ट फिर हाजिर है। 19 से 23 जनवरी के बीच हो रहे ‘वर्ल्ड इकॉनॉमिक फोरम’ के पहले दिन चेतावनी-स्वरूप जारी की गई इस रिपोर्ट ने दुनियाभर के आर्थिक विकास की पोलपट्टी…

लोकतांत्रिक आत्मा का जीवंत घोषणापत्र है संविधान

26 नवम्बर भारत की लोकतांत्रिक यात्रा का वह ऐतिहासिक क्षण है, जब देश ने समानता, न्याय, स्वतंत्रता और बंधुत्व पर आधारित अपने भविष्य की दिशा तय की। संविधान दिवस केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि उस आधुनिक चेतना का सम्मान है,…

बिहार चुनाव : सवाल तो जीतने वालों पर भी हैं

अब जब दुनिया-जहान को मथने वाले बिहार विधानसभा के चुनाव जीतकर ‘एनडीए’ की सरकार बन गई है, पूरी चुनावी प्रक्रिया के निहितार्थों पर बात की जानी चाहिए। मसलन,क्या चुनाव जीतने का पवित्र कार्य हो जाने के बाद नीतीश कुमार और…

बिहार चुनाव : जाति का वर्चस्व बनाम विकास और ‘पावरलेस’ की राजनीति’

बिहार, जिसे भारतीय लोकतंत्र की प्रयोगशाला कहा गया है, आज फिर एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। ऐतिहासिक राजनीतिक चेतना और आंदोलनों की भूमि होने के बावजूद, यहां चुनावी परिदृश्य अब भी जाति, वर्चस्व, बूथ प्रबंधन और पैसों के प्रभाव…

लोकतंत्र की तलाश : बिहार से लौटेगा या अमेरिका से?

लोकतंत्र की दुर्दशा से बेचैन भारतीय समाज एक ओर बिहार के चुनाव में बदलाव की उम्मीद देख रहा है, तो दूसरी ओर अमेरिका में उठे ‘नो किंग्स’ आंदोलन से प्रेरणा ले रहा है। जब सत्ता पूंजी के कब्जे में और…

कितने कारगर हैं लोकतंत्र, मार्क्सवाद और धर्म ?

उम्र के नौ दशक से अधिक वर्ष पार कर चुके पत्रकार, कॉमरेड एलएस हरदेनिया ने अपने इस लेख में विचार, खासकर अनूठे विचारों की जरूरत और मौजूदा समय की कमजोरियों पर उंगली रखी है। वे पूछते हैं कि बीसवीं, इक्कीसवीं…

मीडिया : ‘फेक न्यूज़,’ फर्जी पत्रकार और लोकतंत्र का संकट

आज के दौर का मीडिया, खासकर ‘सोशल मीडिया’ अपने द्वारा परोसी गई सूचनाओं से नागरिकों को जागरूक बनाए रखने की बुनियादी जिम्मेदारी से कहीं आगे बढ़ चुका है। उसकी इस ‘प्रगति’ ने जहां एक ओर नागरिकों को अपने आसपास की…

असहिष्णुता है, ‘टैरिफ युद्ध’ की वजह

खेल की तरह व्यापार भी स्वस्थ्यय प्रतिस्पर्धा की बुनियाद पर चलता है, लेकिन यदि यह प्रतिस्पर्धा दुश्मनी में बदल जाए तो क्या हो? छह महीने पहले सर्वशक्तिमान अमरीका के राष्ट्रपति बने डोनॉल्ड ट्रंप ने जिस तरह से दुनियाभर में ‘टैरिफ…

चिंतन : विचार शून्यता और लोकतंत्र

मौजूदा समय में विचार-शून्यता एक बड़े संकट की तरह स्थापित होती जा रही है। यहां तक कि हमारा लोकतंत्र देशी है या विदेशी जैसे आसन्न सवालों को भी अपेक्षित गंभीरता से हल नहीं किया जा रहा। क्या यह अपने समय…