नीले धुएँ की धरती : ‘ग्रेट स्मोकी माउंटेन्स’
समाज और सरकार चाहे तो पर्यावरण को पुनर्जीवित किया जा सकता है। इसका एक बेहतरीन उदाहरण अमरीका के टेनेसी और नार्थ कैरोलीना राज्यों की सीमाओं से लगा ‘ग्रेट स्मोकी माउंटेन्स’ है। करीब सौ साल पहले कानून बनाकर प्रकृति को उसके…
मज़दूर आंदोलन : वेतन से आगे, सामाजिक न्याय की लड़ाई
मजदूर संगठनों पर एक आरोप यह भी लगता रहा है कि वे अपने वेतन-भत्तों, सुविधाओं और अधिक-से-अधिक काम तथा रहन-सहन की परिस्थितियों यानि कि एक तरह के ‘अर्थवाद’ से बाहर नहीं निकल पाते, लेकिन क्या यह सही है? भारत समेत…
जनगणना 2027 : डिजिटल युग में भारत की सामाजिक-राजनीतिक पुनर्रचना
अंतरराष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस : क्या भारत की अपेक्षा अमेरिकी जनता अधिक खुश है ?
भूटान की “सकल राष्ट्रीय प्रसन्नता” की अवधारणा से प्रेरित अंतरराष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस (20 मार्च) आज विकास की नई परिभाषा प्रस्तुत करता है। आय से आगे बढ़कर जीवन की गुणवत्ता, सामाजिक संबंध और मानसिक संतोष को महत्व देने वाली यह सोच,…
सुप्रीम कोर्ट में आठवीं की किताब : संस्थागत गरिमा बनाम शैक्षिक स्वायत्तता
‘एनसीईआरटी’ की आठवीं की किताब ने हाल में सुप्रीमकोर्ट में भारी बहस खड़ी कर दी है। किताब में न्यायपालिका की अनेक कमजोरियों पर ऊंगली रखी गई है, लेकिन हमारा न्यायतंत्र इसे बदनाम करने का प्रयास मानता है। तो क्या हमारे…
भारत में गणतंत्र : चुनौतियाँ, विफलताएँ और समाधान
हम अपने गणतंत्र की 77वीं सालगिरह मना रहे हों, लेकिन क्या सचमुच हमारा लोकतंत्र उस तरफ बढ़ रहा है जिसकी उम्मीद हमने करीब आठ दशक पहले की थी? मसलन–क्या हमारी दो सदनों–लोकसभा, राज्यसभा–वाली संसद और राज्यों की विधानसभाएं अपेक्षित अवधि…
बैंकिंग से बदलता भारत का परिदृश्य
आज के दौर में औपचारिक आर्थिक ताने-बाने को बनाए रखने के लिए बैंक बेहद अहम भूमिका निभाते हैं। खासियत यह है कि बैंकों की यह सेवा छोटे-छोटे, स्थानीय ग्रामीणों से लगाकर राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचती है। क्या और कैसा है,…
भविष्य निधि : कर्मचारी हित बनाम प्रशासनिक सुविधा
सम्पत्ति बढ़ाने की जुगत में सरकारें बीमा और बैंकों में लगी आम लोगों की पूंजी को बाजार के हवाले कर रही हैं। अब यह कारनामा कर्मचारियों की भविष्य निधि तक पहुंच गया है। ऐसा करने के लिए पारदर्शिता, आसान प्रक्रिया…
सौ साल का ‘आरएसएस’
ठीक एक शताब्दी पहले, 1925 के दशहरे के इन्हीं दिनों में ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ की स्थापना हुई थी। उसके कर्ता-धर्ताओं की नजर में गैर-राजनीतिक, सांस्कृतिक संगठन माना जाने वाला यह अ-पंजीकृत जमावडा अपने जन्म से ही विवादास्पद रहा है। क्या…
गांधीजी की आधुनिकता और उनके मापदंड
आम लोगों में महात्मा गांधी को उनके रहन-सहन, खान-पान और भाषा-भूषा के चलते गैर-आधुनिक, पिछडा और पारंपरिक मानने का चलन है, लेकिन क्या वे सचमुच वैसे थे? या आधुनिकता के उनके मापदंड आम लोगों से भिन्न थे, जिनका वे कडाई…









