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जनगणना 2027 : डिजिटल युग में भारत की सामाजिक-राजनीतिक पुनर्रचना

जनगणना 2027 : डिजिटल युग में भारत की सामाजिक-राजनीतिक पुनर्रचना

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किसी भी नीति, निर्माण और संसाधनों के वितरण-विभाजन के लिए उपभोक्ताओं, हितग्राहियों की ठीक-ठीक जानकारी होना बुनियादी जरूरत होती है, लेकिन हम करीब डेढ़ दशक से, कोविड जैसे बहानों से जनगणना को टालते रहे हैं। नतीजे में हमारी योजनाएं अधूरी या बेहूदी साबित हो रही हैं। अब ‘जनगणना 2027’ की मार्फत न सिर्फ आबादी की गणना हो रही है, बल्कि पहली बार विस्तार से जातियों का लेखा-जोखा भी किया जा रहा है।


भारत में वर्ष 2011 के बाद हो रही ‘जनगणना 2027’ न केवल आकार में दुनिया में सबसे बड़ी है, बल्कि तकनीकी ढाँचे और सामाजिक–राजनीतिक प्रभावों के कारण भी अभूतपूर्व है। स्वतंत्रता के बाद पहली बार जाति‑आधारित गणना को सम्मिलित किया जाना, डिजिटल माध्यमों का व्यापक उपयोग, स्वयं‑गणना का विकल्प, परिसीमन व आरक्षण जैसी नीतिगत प्रक्रियाओं पर इसके दूरगामी प्रभाव इस जनगणना को अत्यंत महत्वपूर्ण बनाते हैं। भारत में आधुनिक जनगणना 1881 में पहली बार पूरे देश में समन्वित रूप से संपन्न हुई थी। स्वतंत्रता के बाद 1951 में पहली जनगणना आयोजित की गई। अब यह आठवीं और कुल सोलहवीं जनगणना है।

केंद्र सरकार ने ‘जनगणना 2027’ के लिए ₹11,718.24 करोड़ स्वीकृत किए हैं, जिनमें गणनाकर्मियों के मानदेय, प्रशिक्षण, ‘आईटी’ अवसंरचना और अन्य आवश्यक व्यवस्थाएँ शामिल हैं। ‘जनगणना 2027’ का आयोजन 01.01.2026 की स्थिति के अनुसार देश के 36 राज्यों/केंद्र-शासित प्रदेशों, 7,092 उप-जिलों, 5,128 नगरों (शहरी एवं प्रशासनिक ढाँचा-युक्त), 4,580 जनगणना नगरों (स्थानीय प्रशासनिक इकाई विहीन) तथा लगभग 6,39,902 ग्रामों में किया जाएगा।

इस बार जनगणना पूरी तरह डिजिटल होगी, जिसमें लगभग 30 लाख गणनाकर्मी स्मार्टफ़ोन आधारित मोबाइल ऐप से सीधे डेटा अपलोड करेंगे। यह ऐप हिन्दी–अंग्रेज़ी सहित 16 भाषाओं में उपलब्ध है और बिना इंटरनेट के भी दूरदराज़ क्षेत्रों में कार्य करता है। यद्यपि गणनाकर्मी पूर्ववत् घर-घर जाकर विवरण संकलित करेंगे, इस बार उत्तरदाताओं को स्व-गणना का विकल्प भी दिया गया है। नागरिक se.census.gov.in पोर्टल पर लॉगिन कर स्थान चिन्हित, गृह विवरण भरने और सूचना प्रेषित करने पर एक विशिष्ट स्व-गणना आईडी प्राप्त करेंगे, जिसे गणनाकार को देने पर अभिलेख में सम्मिलित कर लिया जाएगा। यह सुविधा समय बचाते हुए नागरिकों को सुविधानुसार जानकारी भरने का अवसर देती है।

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डिजिटल जनगणना भारत की प्रशासनिक और तकनीकी क्षमता को नई दिशा देने वाला कदम है, जो पारदर्शी, त्वरित और नागरिक-केंद्रित शासन व्यवस्था के भविष्य की स्पष्ट रूपरेखा प्रस्तुत करता है। हालांकि डिजिटल जनगणना की सफलता डेटा सुरक्षा एवं गोपनीयता सुनिश्चित करने के साथ-साथ गणनाकर्मियों के प्रशिक्षण, डिजिटल दक्षता और जमीनी स्तर की व्यावहारिक चुनौतियों के प्रभावी समाधान पर भी निर्भर करेगी।

जनगणना दो चरणों में संपन्न होगी। पहले चरण में गृह‑सूचीकरण एवं आवास जनगणनाअप्रैल से सितंबर 2026 के बीच राज्यों की सुविधा के अनुसार 30 दिनों की अवधि में की जायेगी। इस चरण में भवन की पहचान, निर्माण सामग्री, स्वामित्व, निवासियों की संख्या, जल–स्वच्छता–विद्युत–ईंधन की उपलब्धता, घरेलू परिसंपत्तियों तथा परिवार प्रमुख, लिंग और दांपत्य स्थिति जैसे जनसांख्यिकीय विवरणों सहित कुल 33 प्रश्न सम्मिलित होंगे, जिनमें सहजीवन को भी स्थिर संबंध मानकर विवाहित की श्रेणी में रखा जाएगा।

फरवरी 2027 में आयोजित होने वाले दूसरे चरण में प्रत्येक व्यक्ति से आयु, शिक्षा, व्यवसाय,  प्रवास, प्रजनन, धर्म, भाषा, सामाजिक‑आर्थिक स्थिति, तथा सांस्कृतिक विशेषताओं जैसे व्यक्ति-स्तरीय विवरण संकलित किए जाएंगे। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में मकान सूचीकरण जनगणना 1 मई से 30 मई, 2026 तक की जाएगी, जबकि स्व-गणना की अवधि 16 अप्रैल से 30 अप्रैल, 2026 तक रहेगी।

वर्ष 1931 के बाद पहली बार द्वितीय चरण में जाति आधारित गणना की जाएगी, जो इस जनगणना का सबसे चर्चित और विवादास्पद पहलू है, विशेषकर तब, जब सत्तारूढ भाजपा प्रारंभ में इसके विरोध में थी। वर्ष 1951 में ‘सामाजिक विभाजन’ की आशंका के कारण इसे बंद कर दिया गया था और तब से केवल अनुसूचित जाति एवं जनजाति से संबंधित सीमित जानकारी ही एकत्र होती रही है।

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वर्तमान सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों ने इस प्रश्न को पुनः केंद्र में ला दिया है; विस्तृत जाति आँकड़ों के अभाव में नीति निर्माण ‘अंधेरे में तीर चलाने’ जैसा हो गया है, जिससे न संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण सुनिश्चित हो पा रहा है और न ही वंचित समुदायों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो रही है। दूसरी ओर, विरोधियों का तर्क है कि जाति‑गणना से जातीय पहचानें कठोर होंगी, सामाजिक विभाजन गहरे होंगे और जाति को एक स्थायी सरकारी मान्यता मिल जाएगी। यह बहस केवल शैक्षणिक नहीं है; इसका सीधा प्रभाव आरक्षण नीति, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और अन्य पिछड़ा वर्ग उपवर्गीकरण जैसे मुद्दों पर पड़ेगा।

इस जनगणना के सामाजिक प्रभावों के साथ इसके राजनीतिक परिणाम भी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि इसके बाद परिसीमन के तहत जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएँ पुनर्निर्धारित होंगी। दक्षिणी राज्यों को आशंका है कि इससे उत्तर भारत को अत्यधिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिल सकता है। संसद में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण का प्रावधान भी इसी प्रक्रिया के उपरांत लागू होगा।

इसी संदर्भ में नागरिकता से जुड़े प्रश्न भी उभरते हैं। ‘राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर’ (एनपीआर) और ‘राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर’ (एनआरसी) के पूरे देश में लागू होने की घोषणा तथा ‘नागरिकता संशोधन अधिनियम’ के कारण यह आशंका है कि जनगणना के आंकड़ों का उपयोग नागरिकता निर्धारण में किया जा सकता है। यह पहली बार होगा जब जनगणना का प्रत्यक्ष संबंध नागरिकता से स्थापित हो सकता है, जिससे कुछ समुदायों में गंभीर चिंता उत्पन्न हुई है।

सत्तारूढ़ दक्षिणपंथी सरकार पर यह आरोप लगते रहे हैं कि वह मुस्लिम समुदाय के प्रति वैमनस्य को बढ़ावा दे रही है। पिछले वर्ष अनेक अवैध प्रवासियों को मनमाने ढंग से देश से बाहर भेजा गया। कुछ मानवाधिकार संगठनों और संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों ने आरोप लगाया कि रोहिंग्या शरणार्थियों को अंडमान सागर के निकट छोड़ दिया गया, जिससे भारत की प्रवासन नीतियों और नागरिकता बहसों में चिंताएँ तीव्र हुईं। इसके अलावा, कई भाजपा नेता मात्र 14 प्रतिशत आबादी वाले मुसलमानों को देश के लिए खतरा बताकर यह मिथक फैलाते रहे हैं कि वे शीघ्र ही हिंदू जनसंख्या को पीछे छोड़ देंगे, जिससे भेदभाव और सामाजिक असुरक्षा को बढ़ावा मिलता है।

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कोविड-19 के कारण 2021 की जनगणना स्थगित होने से डेटा तंत्र में गंभीर रिक्तताएँ उत्पन्न हुईं हैं, क्योंकि अधिकांश सर्वेक्षण जनगणना को ही अपने ‘सैम्पलिंग फ्रेम’ के रूप में उपयोग करते हैं; इसके पुराने होने से उनकी प्रातिनिधिकता प्रभावित होती है और नीति निर्माण में त्रुटियाँ बढ़ती हैं। पिछले दशक में डेटा पारदर्शिता पर उठे प्रश्नों – डेटा साझा न करने, गुणवत्ता के नाम पर त्याग और बार-बार पद्धति परिवर्तन – को देखते हुए जनगणना को ‘जनगणना अधिनियम, 1948’ के अंतर्गत अधिक पारदर्शी और उत्तरदायी ढंग से संचालित किया जाना आवश्यक है।

‘जनगणना 2027’ केवल एक सांख्यिकीय अभ्यास नहीं, बल्कि वह आधार है जिसके माध्यम से नीतियाँ निर्मित होंगी, संसाधनों का वितरण तय होगा और भारत के भविष्य की दिशा निर्धारित होगी। भारत की यह ऐतिहासिक जनगणना डिजिटल तकनीक, स्वयं‑गणना, जाति‑आधारित डेटा और राजनीतिक‑सामाजिक प्रभावों के साथ निश्चित रूप से आने वाले वर्षों में देश की संरचना और संवाद को गहराई से प्रभावित करेगी। (सप्रेस)

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लेखक का परिचय

अरुण कुमार डनायक

श्री अरूण कुमार डनायक लेखक व सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं।

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