यात्रा-वृत्तांत : अनोखी है बैतूल की भू-संस्कृति
भारत की विविध भू-संस्कृतियों की खोज में बैतूल एक ऐसा पड़ाव है, जहाँ प्रकृति, लोकजीवन, आस्था और सामुदायिक संस्कृति एक-दूसरे में सहज रूप से घुली-मिली दिखाई देती हैं। यह यात्रा-वृत्तांत एक शोधार्थी की आँखों से बैतूल की सांस्कृतिक और प्राकृतिक…
क्या रहने लायक बचे हैं, हमारे शहर ?
चालीस-पेंतालीस डिग्री सेल्सियस की चपेट में आए भारत, खासकर उत्तर भारत में अब आमफहम जीवन भी कठिन-से-कठिनतर होता जा रहा है। खुद के बनाए विकास के तौर-तरीकों से पैदा हो रहे ऐसे हालातों से आखिर कैसे निपटा जाए? इसी पर…
सुप्रीम कोर्ट : धर्म और जाति के बीच फँसा न्याय
आम धारणा है कि अनुसूचित जातियां और जनजातियां कानून, समाज और सरकार की नजर में कमोबेश एक नहीं तो आसपास ही हैं। इसी के चलते बरसों ‘अनुसूचित जाति, जनजाति आयोग’ और उनसे जुड़े कानून एक ही माने, बनाए जाते थे।…
जमशेदपुर में पर्वत संरक्षण पर राष्ट्रीय संवैधानिक विमर्श
पर्वत संरक्षण को संवैधानिक सुरक्षा देने की जरूरत पर राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर विमर्श शुरू हो रहा है। 22 और 23 मई को जमशेदपुर में आयोजित सम्मेलन में पर्वतों को भारत की पहली राष्ट्रीय आधारभूत संरचना मानते हुए उनके संरक्षण,…
दरगाह, पुष्कर और ‘सोनीजी की नसियां’ : एक यात्रा-वृत्तांत
यात्राएं अपने रोजमर्रा के जीवन से बाहर निकलने के अलावा बहुत कुछ सिखाती हैं। अव्वल तो हम प्रवास की उन जगहों, इलाकों के बारे में गहराई से जान पाते हैं और दूसरे वहां के समाज की समझ भी बढ़ती है।…
जनगणना में जरूरी प्रवासी – मजदूर
करीब डेढ़ दशक बाद होने जा रही ‘जनगणना 2027’ में जातियों की बहुप्रचारित मर्दुमशुमारी के अलावा उन असंख्य प्रवासी-मजदूरों का भी महत्व होना चाहिए जो हमारे ‘जीडीपी’ को अनजाने में आसमान तक पहुंचाने में लगे हैं। आखिर किसी भी योजना…
संग-साथ का श्रम : खेती के लिए ‘अड़जी-पड़जी’
नब्बे के दशक की शुरुआत में आए भू-मंडलीकरण के बाद की सभी रंगों-झंडों की सरकारों की सबसे बड़ी चिंता रही है – कृषि में लगी ग्रामीण आबादी के ‘सरप्लस’ को किस तरह उद्योगों यानि शहरों की तरफ हकाला जाए। विडंबना…
महिला आरक्षण : सशक्तिकरण की पहल या राजनीतिक रणनीति?
महिला आरक्षण विधेयक को लेकर केंद्र सरकार का विशेष सत्र बुलाना जहां एक ओर नारी सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम बताया जा रहा है, वहीं इसके पीछे राजनीतिक रणनीति के सवाल भी उठ रहे हैं। परिसीमन, जनगणना और चुनावी…
14अप्रैल, 1972 : जब बागियों ने छोड़ी बंदूकें, तब शुरू हुई चंबल में शांति की नई बयार
चंबल घाटी, जो कभी भय और हिंसा का प्रतीक थी, वहाँ संत विनोबा भावे और बाद में जयप्रकाश नारायण के प्रयासों से अहिंसा और परिवर्तन की ऐतिहासिक धारा प्रवाहित हुई। 1960 से शुरू हुआ बागियों का आत्मसमर्पण आंदोलन 1972 में…
विज्ञान और अध्यात्म : प्रकृति से प्रेम ही सनातन है
विकास, खासकर भौतिक विकास को हिंसक विनाश में तब्दील कर रहे नीति-निर्धारक, राजनेता और पूंजीपति एक बात में समान हैं। वे सब खुद को धार्मिक, सनातनी कहते-मानते हैं, लेकिन क्या उनका धर्म उन्हें प्रकृति के प्रति प्रेम, सरोकार नहीं सिखाता?…









