कितने कारगर हैं लोकतंत्र, मार्क्सवाद और धर्म ?

एल एस हरदेनिया

उम्र के नौ दशक से अधिक वर्ष पार कर चुके पत्रकार, कॉमरेड एलएस हरदेनिया ने अपने इस लेख में विचार, खासकर अनूठे विचारों की जरूरत और मौजूदा समय की कमजोरियों पर उंगली रखी है। वे पूछते हैं कि बीसवीं, इक्कीसवीं सदी में पैदा होकर शिखर तक पहुंचे लोकतंत्र, मार्क्सवाद और धर्म के विचार आज कितने कारगर हैं?

एल एस हरदेनिया

नेपाल में हाल में जो घटनाक्रम हुआ उससे लगता है कि लोकतंत्र भी आम लोगों की समस्याओं को हल करने में सफल नहीं है। यदि हम मानवता का इतिहास देखें तो एक समय ऐसा था जब पूरे समाज में अराजकता थी – मेरी लाठी, मेरी भैंस। उसके बाद धीरे-धीरे यह व्यवस्था खत्म हो गई और सत्ता राजा के हाथ में आ गई। ऐसी राजसत्ता पूरी दुनिया में थी। इंग्लैंड, फ्रांस, इटली जैसे देशों के राजाओं का जाल पूरी दुनिया में फैला था। इंग्लैंड के बारे में कहा जाता था कि उसके साम्राज्य में सूरज नहीं डूबता।

कई स्थानों पर सम्राज्यवादी देशों के विरुद्ध आंदोलन हुए। इंग्लैंड में भी आंदोलन हुआ जहां की साम्राज्यवादी सत्ता को उखाड़ने में भारत का भी योगदान था। भारत में आज़ादी का जबरदस्त आंदोलन हुआ। कुछ लोगों ने हिंसक तरीके अपनाए, परंतु बहुत बड़ा आंदोलन गांधी जी के नेतृत्व में अहिंसक था। जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में एक अंतरिम सरकार बनी। बाद में नेहरू जी के प्रधानमंत्रित्व में हमारे देश ने आजादी की सांस ली।

धीरे-धीरे सारी दुनिया में लोकतंत्र फैल गया, लेकिन एक और विचारधारा भी उत्पन्न हुई जिसे मार्क्सवाद कहा गया। मार्क्सवाद में एक सिद्धांत निरूपित किया गया, जिसमें यह कहा गया कि सारी दुनिया में राज करने का अधिकार जनता को होगा। तब के सोवियत यूनियन में मार्क्सवादी सरकार बनी। यह सरकार 1917 में बनी, परंतु एक शताब्दी भी नहीं टिक पाई और उसकी जड़ें उखड़ गईं। इससे महसूस हुआ कि मार्क्सवाद को भी समाप्त किया जा सकता है।

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अनेक देशों में मार्क्सवादी सरकारें बनीं और धीरे-धीरे उनकी भी जड़ें उखड़ गईं। आज भी कुछ देशों में मार्क्सवादी सरकारें हैं। क्यूबा जैसे देशों में, जहां मार्क्सवादी सरकारें हैं वहां की जनता को दैनिक सुविधाएं भी प्रदान नहीं की जा सकी हैं। अखबारों में छप रहा है कि पूरा क्यूबा अंधकार में डूबा हुआ है। क्यूबा की सरकार जनता को बिजली भी नहीं दे पा रही, बाकी साधन तो छोड़िए।

चीन में कम्युनिस्ट सरकार बनी, पर थोड़े ही दिनों में उसका तख्ता पलट गया और ऐसा लगने लगा कि जैसे पूंजीवादी सरकार हो। वियतनाम में भी कम्युनिस्ट सरकार बनी, पर उसका तख्ता भी पलट गया। उत्तर कोरिया में इस समय कम्युनिस्ट सरकार है, लेकिन वहां के राष्ट्राध्यक्ष की तुलना बुरे-से-बुरे तानाशाह से की जाती है। उसका पिता भी उत्तर कोरिया में तानाशाह रहा था, लेकिन उसने मार्क्सवाद का चेहरा इस तरह पेश किया कि उसकी भी लोकप्रियता खत्म हो गई। दुनिया के अनेक राष्ट्रों में मार्क्सवादी संगठन बने, परंतु वे सत्ता हासिल नहीं कर पाए और उनका भी अधोपतन ऐसा हुआ जिसकी उनको कल्पना भी नहीं थी।

केरल में पहली कम्युनिस्ट सरकार बनी, परंतु थोड़े ही दिनों में कांग्रेस ने उसका तख्ता पलट दिया। एक चुनाव में फिर से कम्युनिस्ट आए। संयोग से इस समय केरल में कम्युनिस्ट सरकार है जो अच्छा काम कर रही है। इसका मतलब है कि केरल में जब भी कम्युनिस्ट सरकार बनती है तो सभी क्षेत्रों में, खासकर स्वास्थ्य के क्षेत्र में बड़ी प्रगति होती है। इस समय पूरे देश में केरल ही एक राज्य है जहां कम्युनिस्ट पार्टी का शासन है।

दुर्भाग्य से भारत की कम्युनिस्ट पार्टियां दो भागों में बंट गई हैं। एक ‘मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी’ (सीपीएम) कहलाती है और दूसरी ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी’ (सीपीआई)। इनका बंटवारा क्यों हुआ? किस सिद्धांत पर हुआ? यह आज तक मेरी समझ में नहीं आया। मैं अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य था, पर जब उसका विभाजन हो गया तो मैंने सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया। आज भी जब ये दोनों पार्टियां एक हो जाएंगी उस दिन मैं अपनी सदस्यता पुनर्जीवित कर लूंगा।

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लगता है कि लोकतंत्र आम जनता की समस्याओं को हल नहीं कर पा रहा है। अमेरिका में 300 साल से लोकतंत्र है, पर सुना जाता है कि आज भी वहां 20 प्रतिशत लोग सड़कों पर सोते हैं। ब्रिटेन में भी यही स्थिति है। हमारे देश में भी लोकतंत्र है, परंतु बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर सोते हैं। मतलब यह कि आज भारत बड़ी संख्या में गरीब लोगों को सहायता नहीं पहुंचा पा रहा है। इसका कारण यही है कि लोकतंत्र के माध्यम से लोगों को लूटा जा रहा है। बड़ी संख्या में धनी लोग उस राशन तक को लूट रहे हैं जो गरीबों के लिए है। भारत में करीब 81 करोड़ लोगों के लिए राशन दिया जा रहा है ताकि वे अपना जीवनयापन कर सकें।

कई देशों में लोकतंत्र संतुलित नहीं है। फ्रांस में तो हर चंद महीनों में प्रधानमंत्री बदलते हैं। जापान में भी प्रधानमंत्री थोड़े समय में बदलते रहते हैं। हमारे देश में भी कांग्रेस कह रही है कि सत्ताधारी दल वोट-चोर है। राहुल गांधी का आरोप है कि महाराष्ट्र, हरियाणा, मध्यप्रदेश और कर्नाटक में ऐसा हुआ है। इसमें कितना दम है, कहा नहीं जा सकता, परंतु यह स्पष्ट है कि लोकतंत्र आम लोगों की समस्याओं को हल नहीं कर पा रहा है।

अनेक देश आज धर्म पर आधारित शासन चला रहे हैं। इस तरह के देशों में इस्लाम मानने वाले देश हैं। सऊदी अरब के पास बहुत धन है, पर उनका शासन इस्लामी है। पाकिस्तान का शासन भी इस्लाम पर आधारित है। हमारे देश में इस बात का प्रयास है कि धर्म आधारित राज्य की स्थापना हो। एक पार्टी ऐसी है जो भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहती है।

नेपाल में भी हिन्दू राजा था जिसने आम लोगों पर बहुत जुल्म किए थे। वहां की कम्युनिस्ट पार्टी ने राजशाही का तख्ता पलट दिया और हिन्दू साम्राज्य खत्म हुआ। लोकतांत्रिक सरकार बनी, परंतु वहां भी वही हुआ। वहां के आम लोगों ने मंत्रियों और सत्ताधारियों पर अय्याशी का आरोप लगाया और यह आरोप धीरे-धीरे इतना बढ़ गया कि यकायक वहां के युवकों ने हिंसा को हाथ में ले लिया।

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बांग्लादेश में भी यही हुआ। वहां की प्रधानमंत्री शेख हसीना थीं। वहां के सबसे बड़े नेता मुजीबुर्रहमान ने पाकिस्तान से अलग होकर लोकतांत्रिक सरकार की स्थापना की। कुछ वर्षों तक तो लोकतंत्र चला, परन्तु उनकी पुत्री शेख हसीना ने लोकतंत्र की जड़ों को खोदना प्रारंभ किया। इससे भी वहां पर हिंसा भड़की, यहां तक कि शेख हसीना को हिन्दुस्तान में शरण लेनी पड़ी।

पाकिस्तान और श्रीलंका में भी लोकतंत्र मजबूत नहीं है। म्यांमार में तो बरसों से फौज का राज है। वहां की सबसे प्रभावशाली नेता और ‘नोबल पुरस्कार’ विजेता आंग सान सू की को, आम चुनाव जीतने के बावजूद हिरासत में रखा गया है। हिन्दुस्तान में भी लोकतंत्र की जड़ें बहुत मजबूत नहीं हैं। जवाहरलाल नेहरू ने जिन आधारों पर यहां लोकतंत्र स्थापित किया था कुछ लोग उसकी बुराई करते हैं, परंतु मेरी राय में जो जड़ें नेहरू ने डाली थीं वे आज भी मजबूत हैं और उन्हीं पर चलना चाहिए। नेहरू जी इस देश को साम्प्रदायिकता से दूर रखना चाहते थे। वे इसके विरूद्ध आवाज उठाते थे।

भारत में मिली-जुली आबादी है। हिन्दू हैं, मुसलमान हैं, सिक्ख हैं, ईसाई हैं, बौद्ध, जैन भी हैं। इन सबकी रक्षा तब ही हो सकेगी जब हमारे देश का शासन सेक्युलर होगा, परंतु यह भी सत्य है कि सेक्युलरिज्म की जड़ें कमजोर हो रही हैं। ऐसे में हमको शायद कोई नई विचारधारा लाना होगी। अकेला लोकतंत्र दुनिया के अरबों गरीबों की समस्याओं को हल नहीं कर सकता। नई विचारधारा कौन-सी हो, यह कहना मुश्किल है, परंतु ऐसी विचारधारा को खोजना, उसे मजबूत बनाना, आज की आवश्यकता है। (सप्रेस)

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