नरगिस मोहम्मदी : हिरासत में जीता, शांति के लिए नोबेल पुरस्कार

हेमलता म्हस्के

अपनी राजनीति, बाजार-हितैषी चरित्र और नस्ली पूर्वाग्रहों के बावजूद नार्वे की नोबेल पुरस्कार समिति कभी-कभार कमाल कर देती है। इस बार उसने यह कारनामा ईरान की जेल में बंद मानवाधिकार कार्यकर्ता नरगिस मोहम्मदी को शांति के नोबेल के लिए चुनकर किया है। कौन हैं, नरगिस मोहम्मदी? क्या हैं उनकी खासियतें? बता रही हैं, हेमलता म्हस्के।

नॉर्वे की नोबेल पुरस्कार समिति ने इस साल उस ईरानी महिला नरगिस मोहम्मदी को शांति के लिए नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा की है जो अपने देश में महिलाओं के हक के लिए निरंतर लड़ाई लड़ रही है। जब नरगिस मोहम्मदी को नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा की गई तब वह खुले आसमान के नीचे नहीं, बल्कि जेल में 12 सालों से बंद हैं। ओस्लो में पुरस्कार की घोषणा करते हुए नोबेल समिति की अध्यक्ष बेरिट रीस-एंडरसन ने कहा है कि यह पुरस्कार ईरान की विवादमुक्त नेता नरगिस मोहम्मदी को मान्यता देने के लिए दिया गया है। उन्होंने ईरान की सरकार से अपील की है कि वह नरगिस को जेल से रिहा कर दे, ताकि वे इस साल 10 दिसंबर को पुरस्कार समारोह में शामिल हो सकें।

नरगिस दुनिया भर की संघर्षशील और अपने हक के लिए आंदोलनरत महिलाओं का आदर्श बन गई हैं। उन्हें नोबेल पुरुस्कार मिलने से विभिन्न मुल्कों की उन महिलाओं को जरूर प्रेरणा मिलेगी जो घर-परिवार में या सत्ता द्वारा प्रताड़ित होती हुई चुपचाप यातनाएं सहती रहती हैं और प्रतिकार नहीं कर पातीं।

 नरगिस शुरू से अखबारों के लिए लिखती थीं। 1990 से ही नरगिस महिलाओं के लिए आवाज उठा रही हैं। वर्ष 2003 में उन्होंने तेहरान के ‘डिफेंडर्स आफ हुमन राइट सेंटर’ से काम शुरू किया। वे तेरह बार गिरफ्तार हुई। उन्हें 31 साल की जेल और 154 कोड़े मारने की सजा भी सुनाई जा चुकी हैं। आठ साल से वे अपने बच्चों तक से नहीं मिल पाई हैं। नरगिस को जेल में बंद मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की मदद करने के आरोप में पहली बार 2011 में जेल हुई थी।

नरगिस कहती हैं कि मुझे जितनी यातना मिलती है, मैं उतनी ही मजबूत होती जाती हूं। अपने जेल जीवन का जिक्र करते हुए नरगिस कहती हैं कि मैं रोज खिड़की के सामने बैठकर हरियाली और आजाद ईरान का सपना देखती हूं। जितना ज्यादा वे मुझे प्रताड़ित करते हैं, मेरी प्रिय चीजों को मुझसे दूर करते हैं, मैं उतनी ही मजबूत होती हूं। यह जंग तब तक जारी रहेगी, जब तक हम लोकतंत्र और आजादी नहीं पा लेते। मुझे उससे कम कुछ भी मंजूर नहीं है। फिलहाल उन्हें ईरान की कुख्यात ‘एबीएन जेल’ में रखा गया है।

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बचपन से ही संघर्षशील रहीं नरगिस के पिता किसान थे। मां राजनीतिक पृष्ठभूमि से थीं। 1979 में इस्लामी क्रांति के बाद राजशाही खत्म हुई तो उनके एक्टिविस्ट चाचा और दो भाई गिरफ्तार किए गए। इनमें से एक भाई को फांसी दे दी गई। तब नरगिस 9 साल की थी। नरगिस के दिल और दिमाग पर उसका गहरा असर पड़ा। इसके बाद उन्होंने विरोध की राह चुनने का फैसला किया। कॉलेज में संगठन खड़ा कर दिया। शादी की तो एक साल अज्ञातवास में बिताना पड़ा। इन सब घटनाओं ने नरगिस को और मजबूत बना दिया।

नरगिस का चार लोगों का परिवार कभी साथ नहीं रह पाया। बच्चों और पति को नरगिस के काम पर गर्व  है। वे कहते हैं – एक पति और पिता के तौर पर बच्चों के साथ रहना बहुत मुश्किल है। मैं चाहता हूं कि नरगिस हमारे साथ रहें। उनके मिशन में हर कदम पर हम उनके साथ हैं। नरगिस को उनकी मां बचपन में कहा करती थीं कि बेटी कुछ भी कर लेना राजनीति से दूर रहना। ईरान जैसे देश में व्यवस्था से लड़ने की बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। लगता है, मां की वह चेतावनी सही साबित हुई है। बच्चों के साथ विदेश में रह रहे नरगिस मोहम्मदी के पति ताबी रहमानी ने कहा है कि यह नोबेल पुरस्कार मानव अधिकारों के लिए नरगिस की लड़ाई को प्रोत्साहित करेगा, लेकिन इससे भी अहम बात यह है कि यह ईरान में चल रहे ‘महिलाएं, ज़िंदगी और आज़ादी आंदोलन’ के लिए पुरस्कार भी है।

साथी कैदियों की तकलीफ को नरगिस ने ‘व्हाइट टॉर्चर: इंटरव्यूज़ विद ईरानी वुमेन प्रिज़नर्स’ नामक किताब में विस्तार से लिखा है। उन्होंने जेल को भी आंदोलन का केंद्र बना दिया है। उनके करीबी दोस्त बताते हैं कि फारसी शास्त्रीय संगीत में दक्ष नरगिस जेल के वार्ड में सभाएं करती हैं। गाने के साथ बर्तनों पर पारंपरिक धुन बजाती हैं और साथी कैदियों के साथ नृत्य भी करती है। उन्होंने जेल की दीवारों को लोकतंत्र और आजादी के नारों से रंग दिया है। नरगिस ने महिलाओं के अधिकारों, खासतौर पर मृत्युदंड उन्मूलन के लिए अभियान चलाया है। ईरान में उन्हें ‘महिलाएं, ज़िंदगी और आज़ादी आंदोलन’ की सबसे बुलंद आवाज माना जाता है। वे  नोबेल शांति पुरस्कार जीतने वाली 19वीं महिला और दूसरी ईरानी महिला हैं। इसके पहले ईरान की ही मानवाधिकार कार्यकर्ता शिरीन एबादी को वर्ष 2003 में शांति का नोबेल पुरस्कार दिया गया था।

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नरगिस मोहम्मदी का जन्म 21 अप्रैल 1972 को ज़ांजन, ईरान में हुआ था और वे कोरवेह, करज और ओशनावियेह में पली-बढ़ीं। उन्होंने ‘काज़्विन इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी’ में दाखिला लिया, भौतिकी में डिग्री प्राप्त की और एक पेशेवर इंजीनियर बन गईं। अपनी पढाई के दौरान उन्होंने छात्र-समाचारपत्र में महिलाओं के अधिकारों का समर्थन करने वाले लेख लिखे और राजनीतिक छात्र समूह ‘ताशक्कोल दानेशजुयी रोशनगरान’ (प्रबुद्ध छात्र समूह) की दो बैठकों में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। वे एक पर्वतारोहण समूह में भी सक्रिय थीं, लेकिन बाद में उनकी राजनीतिक गतिविधियों के कारण उन्हें पर्वतारोहण में शामिल होने से प्रतिबंधित कर दिया गया था।

नरगिस ने कई सुधारवादी समाचार पत्रों के लिए एक पत्रकार के रूप में काम किया और ‘सुधार, रणनीति और राजनीति’ नामक राजनीतिक निबंधों की एक पुस्तक प्रकाशित की। वर्ष 2003 में  वे नोबेल शांति पुरस्कार विजेता शिरीन एबादी की अध्यक्षता वाले ‘डिफेंडर्स ऑफ ह्यूमन राइट्स सेंटर’ (डीएचआरसी) में शामिल हो गईं और बाद में संगठन की उपाध्यक्ष भी बनीं। वर्ष 1999 में उन्होंने साथी सुधार-समर्थक पत्रकार तघी रहमानी से शादी की, जिन्हें जल्द ही गिरफ्तार कर लिया गया। रहमानी 14 साल की जेल काटने के बाद 2012 में फ्रांस चले गए, जबकि मोहम्मदी ने अपना मानवाधिकार कार्य ईरान में ही जारी रखा। नरगिस और रहमानी के जुड़वां बच्चे हैं।

नरगिस मोहम्मदी को पहली बार 1998 में ईरानी सरकार की आलोचना के लिए गिरफ्तार कर साल भर जेल में रखा गया। अप्रैल 2010 में, उन्हें ‘डिफेंडर्स ऑफ ह्यूमन राइट्स सेंटर’ की सदस्यता के अपराध में ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी कोर्ट’ में बुलाया गया। कुछ समय के लिए उन्हें 50,000 अमेरिकी डॉलर की जमानत पर रिहा कर दिया गया, लेकिन कई दिनों बाद उन्हें फिर से गिरफ्तार कर ‘अबियन जेल’ में रख दिया गया। हिरासत में रहने के दौरान नरगिस का स्वास्थ्य गिर गया और उन्हें मिर्गी जैसी बीमारी हो गई, जिससे वह समय-समय पर मांसपेशियों पर नियंत्रण खोती रहीं। एक महीने के बाद, उन्हें रिहा कर दिया गया और चिकित्सा उपचार लेने की अनुमति दी गई।

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जुलाई 2011 में नरगिस पर फिर से मुकदमा चलाया गया और उन्हें “राष्ट्रीय सुरक्षा, ‘डिफेंडर्स ऑफ ह्यूमन राइट्स सेंटर’ की सदस्यता और शासन के खिलाफ प्रचार” करने का दोषी पाया गया। सितंबर में उन्हें 11 साल की कैद की सजा सुनाई गई। नरगिस ने कहा कि उन्हें फैसले के बारे में अपने वकीलों के माध्यम से ही पता चला था और उन्हें “अदालत द्वारा जारी 23 पन्नों का एक अभूतपूर्व फैसला दिया गया था जिसमें उन्होंने बार-बार मेरी मानवाधिकार गतिविधियों की तुलना शासन को गिराने के प्रयासों से की थी।” मार्च 2012 में अपीलीय अदालत ने सजा को बरकरार रखा, हालांकि इसे घटाकर छह साल कर दिया गया। 26 अप्रैल को उन्हें अपनी सजा शुरू करने के लिए गिरफ्तार कर लिया गया। इस सजा का ब्रिटिश सरकार ने यह कहते हुए विरोध किया कि यह “ईरानी अधिकारियों द्वारा बहादुर मानवाधिकार रक्षकों को चुप कराने के प्रयासों का एक और दुखद उदाहरण” है। अब देखना है कि नरगिस मोहम्मदी को ईरान सरकार रिहा करती है या नहीं। पुरुस्कार के लिए उन्हें चुन लिया गया है। सारी दुनिया उन्हें महिलाओं के बीच एक ऐसी विराट हस्ती के रूप में देख रही है, जिसकी मिसाल वे खुद हैं। (सप्रेस)

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