देश धंसेगा सबके यत्नों से . . .
कहा जा रहा है कि संवैधानिक बदलाव के लिए 850 सदस्यों वाली संसद बनाने की जुगत में सत्ताधारी भाजपा देशभर की राजनीतिक जमातों को ललचाकर, धमकाकर, डराकर विखंडित करने में लगी है। मीनाक्षी नटराजन के प्रकरण को देखें तो इस…
लोकतंत्र को अपने वैभव का इंतज़ार
क्रिकेट की थकी और उबाऊ होती दुनिया में जैसे वैभव सूर्यवंशी अचानक आकर खेल की ऊर्जा, सौंदर्य और उम्मीद लौटा देता है, वैसे ही भारतीय समाज और लोकतंत्र भी आज किसी ऐसे ही साहसी, ताज़ा और जीवंत हस्तक्षेप की प्रतीक्षा…
स्मृति शेष / एक और जगदीप !
जगदीप छोकर अब नहीं रहे। एडीआर के संस्थापक और लोकतंत्र में चुनावी सुधार के लिए समर्पित इस जुनूनी व्यक्ति की विदाई केवल एक इंसान की नहीं, बल्कि एक विचार और संघर्ष की भी विदाई है। छोकर ने साबित किया कि…
बिहार चुनाव : इस चुनाव में आप हिस्सा क्यों ले रहे हैं श्रीमान !
बिहार में जारी वोटर लिस्ट के गहन परीक्षण ने तमाम राजनीतिक पार्टियों के सामने गंभीर संवैधानिक सवाल खडा कर दिया है। ऐसे में क्या एक विकल्प चुनावों का बहिष्कार नहीं हो सकता? बिहार के बहाने जो चुनाव आयोग सारे देश…
लोकतंत्र में दो धमाके !
अभी कुछ दिन पहले हुई दो महत्वपूर्ण घटनाओं ने सभी का ध्यान खींचा है। इनमें से एक तो 2006 के मुंबई बम धमाकों में, जो ‘7/11 ब्लॉस्ट’ के नाम से जाना जाता है, 18 साल से जेल भुगत रहे सारे…
विनाश को विस्तार देते युद्ध !
आजकल दुनियाभर में जारी युद्धों की अमानवीय क्रूरता, वीभत्स हिंसा और असंख्य मौतों के नतीजे में आखिर क्या मिलता है? दवाओं जैसी अकूत पूंजी कूटते, हथियारों के सौदागरों की कमाई के अलावा इनसे किसी पक्ष को, किसी तरह की कोई…
भारत-पाकिस्तान तीन दिन का युद्ध : न तीन के, न 13 के !
भारत-पाकिस्तान की तीन-दिनी झड़प से और कुछ हुआ, न हुआ हो,आजकल की सरकारों की पोल जरूर खुल गई है। सर्वशक्तिमान डोनॉल्ड ट्रंप से लगाकर चीन, रूस, तुर्किए और युद्धरत भारत व पाकिस्तान की सरकारें कुल-जमा तीन दिन की झड़प में…
Waqf Amendment Act : वक्फ-संशोधन के बहाने
पहलगाम की आतंकी दुर्घटना के कारण लोगों की नजरों से थोड़ा ओझल हुए वक्फ-विवाद ने दरअसल हमारी संवैधानिक मान्यताओं और राजनीतिक शिष्टाचार पर सवाल खड़े किए हैं। वक्फ कानून में बदलाव ने कुछ जरूरी मुद्दों को उजागर किया है। वक्फ…
18वीं लोकसभा : संसद के सलीके
पिछले महीने गठित देश की ताजा-तरीन 18वीं लोकसभा क्या सचमुच हमारे लोकतंत्र की संरक्षक हो पाएगी? उसके उद्घाटन-सत्र में ही जिस तरह के कारनामे हुए, क्या वे लोकतंत्र में भरोसा करने वाले नागरिकों की अपेक्षाओं पर खरे उतरते दिखते हैं?…
स्वागत : नये साल 2024 की दहलीज पर
नये साल की दहलीज पर खड़ा हमारा देश अपनी निराशा से निकले, सन्निपात की आवाजों को सुने-समझे तो नये साल में कोई नई संभावना पैदा हो सकती है। संभावना सिद्धि नहीं है। उसे सिद्धि तक पहुंचाने के लिए मानवीय पुरुषार्थ…









