Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

चुनावी चंदे से चांदी काटते कॉर्पोरेट

कुमार प्रशांत

इन दिनों ‘चुनावी बॉन्डों’ को लेकर सर्वोच्च अदालत और उसके बाहर बहसा-बहसी जारी है। इस योजना पर कईयों में से कुछ आरोप हैं – सत्तारूढ पार्टी को चंदा देकर कॉर्पोरेट, निजी हित साधना, सभी राजनीतिक पार्टियों को समान रूप से इसकी जानकारी न होना और आम वोटरों को चंदा देने और लेने वालों की कोई पहचान नहीं होना। क्या है, यह समूची प्रक्रिया?

वर्ष 2014 में बनी मौजूदा भारत सरकार, 2018 में ‘चुनावी बॉन्ड’ योजना लेकर आई थी। यह अंधेरे में काला कपड़ा पहनकर लूट करने की संवैधानिक योजना थी जिसे तत्कालीन वित्तमंत्री अरुण जेटली ने प्रधानमंत्री मोदी की स्वीकृति से तैयार किया था। इसके गुण-दोष व वैधानिकता पर विचार करने वाली य़ाचिका वर्षों से सर्वोच्च न्यायालय में पड़ी थी।

कैसा गजब है कि ऐसे संवैधानिक मामले, जिनका देश के वर्तमान व भविष्य से निर्णायक संबंध है, न्यायालय पहुँच तो जाते हैं, लेकिन प्राथमिकता के आधार पर उनकी सुनवाई नहीं होती। न्यायालय ऐसे महत्वपूर्ण मामले को कब तक लटकाए रख सकता है, इसकी जवाबदेही होनी चाहिए। किसी भी राजनीतिक व संवैधानिक संरचना को यह नहीं भूलना चाहिए कि अंतत: सब इसी संविधान की संतान हैं और यह संविधान भारत की जनता की संतान है। सार्वभौम सिर्फ जनता है जिसके प्रति संविधान की रोशनी में हर कोई जवाबदेह है।   

ऐसे में सर्वोच्च अदालत में भारत के एटार्नी जनरल आर. वेंकटरमणी यह लिखित बयान कैसे दे रहे हैं कि भारत की जनता को यह जानने का अधिकार ही नहीं है कि किस आदमी ने, किस पार्टी को कितना पैसा दिया है? जो सरकार जनता के वोट से बनती और जनता के नोट से चलती है, उस सरकार का कानूनी नुमाइंदा जब यह कहता है कि जनता को यह जानने का अधिकार है ही नहीं कि उसके पैसे का कौन, कैसा इस्तेमाल कर रहा है, तब वह असल में यह कह रहा होता है कि जनता की कोई हैसियत नहीं है।

See also  चुनावी राजनीति असंभव संभावनाओं का अनोखा खेल है!

इन वेंकटरमणी महाशय को महीने की तनख्वाह जनता ही देती है और अदालतों की यह सारी व्यवस्था भी जनता के पैसों पर ही टिकी हुई है। ऐसे में यह कहना महान मूढ़ता या फिर महान अहमन्यता का प्रमाण है। यह देश की जनता की सार्वभौमिकता की अनदेखी है। इससे भी हैरानी की बात यह है कि देश की सर्वोच्च अदालत ऐसा सरकारी दंभ सुन लेती है और चुप रहती है।

राजनीतिक दलों को चुनाव लड़ने के लिए धन कहां से मिले, यह यक्ष प्रश्न है। यह आर्थिक व राजनीतिक भ्रष्टाचार की गंगोत्री है। तब सवाल यह उठता है कि ‘चुनावी बॉन्ड’ योजना क्या चुनाव में धनपतियों के हस्तक्षेप पर रोक लगाती है? इस हस्तक्षेप को काबू में करने की कोई कोशिश अब तक प्रभावी नहीं हुई है क्योंकि राजनीतिक दल ईमानदार नहीं हैं। जरूरत ऐसा रास्ता खोजने की थी; और है, जिससे इस गठबंधन को तोडा जा सके, लेकिन सामने आई ‘चुनावी बॉन्ड’ योजना।

यह वह अनैतिक योजना है जो बेईमानी को कानून-सम्मत बनाती है। दाता कौन है, यह पता नहीं है। आप पता करें, यह आपका अधिकार नहीं है। जिन्हें भीतरखाने पता है, वे इस खेल में शरीक हैं। इस तरह की गुमनामी धनबल से जनबल को परास्त करने का असंवैधानिक अधिकार देती है। इससे दाताओं को सत्ता का अभय मिलता है। इसलिए 2014 के बाद से भाजपा को अकूत धन मिलता रहा है। बाकी पार्टियां ‘सुदामा’ से ज्यादा हैसियत नहीं रखतीं। यह भाजपा का नहीं, सत्ता का कमाल है। कल को दूसरी कोई पार्टी सत्ता में होगी तो यह सारा धन उसकी तरफ बहने लगेगा।

ऐसी व्यवस्था न नैतिक है, न लोकतांत्रिक और न ही संविधान-सम्मत। ‘चुनावी बॉन्ड’ ऐसी सरकारी पहल थी जिसे न्यायपालिका को आगे बढ़कर निरस्त कर देना था, लेकिन ऐसा करना तो दूर, अदालत इसकी सुनवाई को ही तैयार नहीं हुई; और अब उसके सामने ही बगैर किसी रोक-टोक के सरकार कह रही है कि जनता को यह जानने का अधिकार ही नहीं है कि सत्ता व धनपति मिलकर कैसा खेल रच रहे हैं। यह कानून जिस तरह अदालत के संवैधानिक अधिकार की तौहीन करता है, ‘चुनाव बॉन्ड’ भी उसका वैसा ही मखौल उड़ाते हैं।       

See also  चिंतन : विचार शून्यता और लोकतंत्र

ऐसे में आखिर सवाल कौन पूछे और किससे पूछे? छापे वाला और फोटोवाला, दोनों मीडिया अब देश में कहीं बचा नहीं है। मीडिया के नाम पर सत्ता की जुगाली करते व्यापारिक संस्थान हैं जो कागज भी गंदा करते हैं और देश का मन भी। आज गजापट्टी में भी हमारे यहां से ज्यादा सार्थक मीडिया सांस लेता है। जब लोकतंत्र में से ‘लोक’ खत्म हो जाता है तब ‘तंत्र’ अपनी ही प्रतिध्वनि से आसमान गुंजाता है, अपनी ही सुनता-सुनाता है। (सप्रेस)

Table of Contents

अनशन से आगे का संघर्ष: सोनम वांगचुक से उठी एक ऐसी अपील, जिसने लोकतंत्र की आत्मा को छू लिया

लोकतांत्रिक आंदोलनों का इतिहास केवल संघर्षों का इतिहास नहीं है, बल्कि उन नैतिक दुविधाओं का भी इतिहास है, जहाँ एक ओर सिद्धांतों के लिए जीवन दांव पर लगा होता है और दूसरी ओर वही जीवन आंदोलन की सबसे बड़ी पूंजी

Read More »

सोनम वांगचुक :  अनशन नहीं, सत्ता का चरित्र बदला है

सोनम वांगचुक का आमरण अनशन अब केवल शिक्षा सुधार या एक मंत्री की जवाबदेही का प्रश्न नहीं रह गया है, बल्कि लोकतांत्रिक प्रतिरोध की प्रभावशीलता की भी परीक्षा बन चुका है। इसी बीच न्यायालय ने उनके जीवन की रक्षा को

Read More »

यात्रा-वृत्तांत : अनोखी है बैतूल की भू-संस्कृति

भारत की विविध भू-संस्कृतियों की खोज में बैतूल एक ऐसा पड़ाव है, जहाँ प्रकृति, लोकजीवन, आस्था और सामुदायिक संस्कृति एक-दूसरे में सहज रूप से घुली-मिली दिखाई देती हैं। यह यात्रा-वृत्तांत एक शोधार्थी की आँखों से बैतूल की सांस्कृतिक और प्राकृतिक

Read More »