अनिद्रा से बिगड़ता स्वास्थ्य

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विश्व निद्रा दिवस हमें याद दिलाता है कि स्वस्थ जीवन के लिए पर्याप्त नींद उतनी ही आवश्यक है जितना संतुलित आहार और नियमित व्यायाम। आज अनिद्रा वैश्विक स्वास्थ्य समस्या बनती जा रही है—लाखों लोग इससे प्रभावित हैं। शोध बताते हैं कि कम नींद न केवल मानसिक अवसाद और तनाव को बढ़ाती है, बल्कि हृदय रोग, दुर्घटनाओं और समय से पहले मृत्यु का जोखिम भी बढ़ा देती है।


13 मार्च : विश्व निद्रा दिवस

अरविंद जयतिलक

आज विश्व निद्रा दिवस है। इसका उद्देश्य स्वास्थ्य के एक महत्वपूर्ण स्तंभ के रुप में नींद के प्रति जागरुकता बढ़ाना है। मानव स्वास्थ्य व सेहत के लिए पर्याप्त निद्रा बेहद आवश्यक है। याद होगा कि गत वर्ष पहले फिलिप्स वार्षिक वैश्विक सर्वेक्षण की रिपोर्ट से उद्घाटित हुआ था कि दुनिया भर में तकरीबन 10 करोड़ लोग अनिद्रा की बीमारी से ग्रसित हैं। दुनिया के 13 देशों (संयुक्त राष्ट्र अमेरिका, जर्मनी, ब्रिटेन, पोलैंड, फ्रांस, भारत, चीन आस्‍ट्रेलिया, कोलंबिया, अर्जेंटीना, मैक्सिको, ब्राजील और जापान) के 15 हजार से अधिक वयस्‍कों पर किए गए इस सर्वेक्षण रिपोर्ट में कहा गया कि 80 प्रतिशत से अधिक लोग अनिद्रा बीमारी से अनभिज्ञ हैं जबकि 30 प्रतिशत लोग नींद लेने और उसे बनाए रखने में दिक्कत महसूस करते हैं। इस रिपोर्ट से यह भी उद्घाटित हुआ था कि देश की राजधनी दिल्ली में 67 प्रतिशत, कोलकाता में 60 प्रतिशत, बेंगलुरु में 59 प्रतिशत तथा चेन्नई 58 प्रतिशत लोग अनिद्रा के शिकार हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक भारत में तकरीबन 19 प्रतिशत वयस्कों ने स्वीकार किया कि सामान्य नींद के समय के साथ काम के घंटों का अतिव्यापित होना अनिद्रा का एक प्रमुख कारण है। इसी तरह 32 प्रतिशत वयस्कों ने स्वीकार किया कि प्रौद्योगिकी भी एक प्रमुख नींद विकर्षण है।

अमेरिका की राष्ट्रीय निद्रा फाउंडेशन के मुताबिक 30-40 प्रतिशत अमेरिकी वयस्कों का कहना है कि उनमें अनिद्रा के लक्षण हैं। चिकित्‍सकों का कहना है कि अनिद्रा के कारण कई तरह की बीमारियां पनपती हैं और जीवन प्रत्याशा कम होने की भी संभावना बढ़ जाती है। 16 अध्ययनों के एक विश्लेषण में 10 लाख से अधिक प्रतिभागियों और 112,566 मौतों के अंतर्गत नींद की अवधि और मृत्युदर के बीच के संबंधों की जांच में पाया गया कि जो लोग रात सात से आठ घंटे सोते थे उनकी तुलना में कम सोने वाले व्यक्तियों में मृत्यु का खतरा 12 प्रतिशत ज्यादा होता है।

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हाल ही में एक अन्य अध्ययन में 38 सालों से सतत निद्रा और मृत्यु दर के प्रभावों की जांच में पाया गया है कि सतत अनिद्रा से ग्रसित लोगों की मौत का जोखिम 97 प्रतिशत अधिक होता है। अनिद्रा का दुष्परिणाम यह होता है कि व्यक्ति में हीनता बढ़ती है और उसका यादाश्त कमजोर पड़ने लगता है। उसमें चिड़चिड़ापन इस हद तक बढ़ जाता है कि वह सामाजिक रुप से मिलना-जुलना बंद कर देता है। साथ ही थके होने और पर्याप्त नींद न लेने के कारण वाहन दुर्घटनाओं की संभावना काफी हद तक बढ़ जाती है।

भारत की बात करें तो यहां 66 प्रतिशत लोगों ने स्वीकार किया है कि अनिद्रा के कारण उनका स्वास्थ्य और तंदरुस्ती प्रभावित होने के साथ-साथ मानसिक अवसाद बढ़ा है। उल्लेखनीय है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन पहले ही खुलासा कर चुका है कि भारत में मानसिक अवसाद के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं जिनके कई कारणों में से एक कारण अनिद्रा भी है।

गत वर्ष पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी शीर्षक ‘डिप्रेशन एवं अन्य सामान्य मानसिक विकार-वैश्विक स्वास्थ्य आकलन’ रिपोर्ट में कहा जा चुका है कि अन्य देशों के मुकाबले भारत और चीन अवसाद से बुरी तरह प्रभावित हैं। रिपोर्ट के मुताबिक दक्षिण पूर्व एशिया और पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में मानसिक अवसाद से ग्रस्त लोगों की संख्या सर्वाधिक है। आंकड़ों के मुताबिक भारत में 5.7 करोड़, चीन में 5.5 करोड़, बांग्लादेश में 63.9 लाख, इंडोनेशिया में 91.6 लाख, म्यांमार में 19.1 लाख, श्रीलंका में 8 लाख, थाइलैंड में 28.8 लाख तथा आस्टेªलिया में 13.1 लाख अवसाद से ग्रसित लोग हैं। रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में अवसाद से प्रभावित लोगों की कुल संख्या 32.2 करोड़ है, जिसमें 50 प्रतिशत सिर्फ भारत और चीन में ही हैं। इस रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ कि अवसाद के अलावा भारत और चीन में चिंता भी बड़ी समस्या है। भारत एवं अन्य मध्य आय वाले देशों में आत्महत्या के सबसे बड़े कारणों में से एक चिंता भी है।

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देश में बढ़ते अवसाद को ध्यान में रखकर ही केंद्र सरकार द्वारा संसद में मानसिक स्वास्थ्य देखरेख विधेयक  पर मुहर लगाया जा चुका है जिसमें मानसिक अवसाद से ग्रस्त व्यक्तियों के लिए मानसिक स्वास्थ्य देखरेख एवं सेवाएं प्रदान करने एवं ऐसे व्यक्तियों के अधिकारों का संरक्षण करने का प्रावधान है। चूंकि भारत अशक्त लोगों के अधिकारों के संबंध में संयुक्त राष्ट्र संधि का हस्ताक्षरकर्ता है लिहाजा उसकी जिम्मेदारी भी थी कि वह इस प्रकार के प्रभावी कानून गढ़ने की दिशा में आगे बढ़े। भारत ने इस दिशा में कदम बढ़ा सामुदायिक स्तर पर अधिकतम स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने की रचनात्मक और स्वागतयोग्य पहल तेज कर दी है। इस पहल से अवसाद से ग्रसित मरीजों के अधिकारों की तो रक्षा होगी ही साथ ही मानसिक रोग को नए सिरे से परिभाषित करने में भी मदद मिलेगी।

मनोवैज्ञानिकों की मानें तो मनोभावों संबंधी दुख है और इस अवस्था में कोई भी व्यक्ति स्वयं का लाचार व निराश महसूस करता है। इस स्थिति से प्रभावित व्यक्ति के लिए सुख, शांति, प्रसन्नता और सफलता को कोई मायने नहीं रह जाता है। वह निराशा, तनाव और अशांति के भंवर में फंस जाता है।

मनोचिकित्सकों का कहना है कि अवसाद के लिए भौतिक कारक भी जिम्मेदार हैं। इनमें कुपोषण, आनुवंशिकता, हार्मोन, मौसम, तनाव, बीमारी, नशा, अप्रिय स्थितियों से लंबे समय तक गुजरना इत्यादि प्रमुख है। इसके अतिरिक्त अवसाद के 90 प्रतिशत रोगियों में नींद की समस्या होती है। अवसाद के लिए व्यक्ति की सोच की बुनावट और व्यक्तित्व भी काफी हद तक जिम्मेदार है। अवसाद अकसर दिमाग के न्यूरोट्रांसमीटर्स की कमी के कारण भी होता है। यह एक प्रकार का रसायन होता है जो दिमाग और शरीर के विभिन्न हिस्सों में तारतम्य स्थापित करता है। इसकी कमी से शरीर की संचार व्यवस्था में कमी आती है और व्यक्ति में अवसाद के लक्षण उभर आते हैं। फिर अवसादग्रस्त व्यक्ति निर्णय लेने में कठिनाई महसूस करता है और उसमें आलस्य, अरुचि, चिड़चिड़ापन इत्यादि बढ़ जाता है और इसकी अधिकता के कारण रोगी आत्महत्या तक कर लेता है।

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मनोचिकित्सकों की मानें तो जब लोगों में तीव्र अवसाद के मौके आते हैं तो उनमें आत्महत्या के विचार भी पनपते हैं। ऐसे हालात में परिवार की भूमिका बढ़ जाती है। परिवार की जिम्मेदारी बनती है कि वह रोगी को अकेला न छोड़े और न ही उसकी आलोचना करे। बल्कि इसके उलट उसकी अभिरुचियों को प्रोत्साहित कर उसमें आत्मविश्वास जगाए। अवसादग्रस्त व्यक्ति के प्रति हमदर्दी दिखाए और उसकी बात को ध्यान से सुने। अवसादग्रस्त व्यक्ति को बोलने के लिए और उसकी भावनाओं को साझा करने के लिए प्रेरित करे। अवसादग्रस्त व्यक्ति को विभिन्न सामाजिक गतिविधियों में शामिल होने के लिए प्रेरित कर उसमें सकारात्मक भाव पैदा करे।

अमेरिकी वैज्ञानिकों ने शोध में पाया है कि यदि कोई व्यक्ति लगातार सकारात्मक सोच का अभ्यास करता है तो वह अवसाद से बाहर निकल सकता है। अकसर देखा जाता है कि ज्यादातर समय अवसाद छिपा हुआ रहता है क्योंकि इससे ग्रस्त व्यक्ति इस बारे में बात करने से हिचकता है। अवसाद से जुड़ी शर्म की भावना ही इसके इलाज में सबसे बड़ी बाधा है। अवसाद के इलाज में कई किस्मों की साइकोथेरेपी भी मददगार सिद्ध हो रही है। लेकिन सबसे अधिक आवश्यकता अवसादग्रस्त लोगों के साथ घुल-मिलकर उनमें आत्मविश्वास पैदा करने की है। अगर अवसाद की गंभीरता पर ध्यान नहीं दिया गया तो 2030 तक अवसाद दुनिया में सबसे बड़ी मानसिक बीमारी का रुप धारण कर सकती है।

अच्छी बात यह है कि दुनिया भर में 77  प्रतिशत लोगों ने अवसाद और बिगड़ते स्वास्थ्य से उबरने के लिए अपनी नींद में सुधार की कोशिश की है। भारत में 45 प्रतिशत वयस्कों ने ध्यान और योग करने की कोशिश की है जबकि 24 प्रतिशत लोगों ने अच्छी नींद लेने और उसे बनाए रखने के लिए विशेष बिस्तर को अपनाया है। उचित होगा कि सरकार और स्वयंसेवी संस्थाएं कुछ इस तरह के कार्यक्रम गढ़ें जिससे कि लोगों में अच्छी नींद के प्रति जागरुकता बढ़े और वे संतुलित दिनचर्या के प्रति आकर्षित हों।(सप्रेस)

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