गांधीवादी चिंतक एकता परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. रन सिंह परमार का निधन

चंबल में ग्राम स्वराज, खादी और भूमिहीनों के अधिकारों के लिए जीवन समर्पित

भोपाल, 13 मार्च। प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता, गांधीवादी चिंतक और एकता परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. रनसिंह परमार (72) का शुक्रवार शाम लगभग 5 बजे तिल्दा-नेवरा (छत्तीसगढ़)  में आकस्मिक निधन हो गया। वे तिल्दा में विख्यात गांधीवादी राजगोपाल पी.व्ही. एवं एकता परिषद के वरिष्ठ साथियों के साथ एक बैठक में भाग ले रहे थे। अचानक तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें नजदीकी अस्पताल ले जाया गया, लेकिन चिकित्सकों के प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। उनके निधन की खबर मिलते ही गांधीवादी कार्यकर्ताओं, सामाजिक संगठनों और ग्रामीण विकास से जुड़े लोगों में गहरा शोक व्याप्त हो गया।

डॉ. रनसिंह परमार नेशनल यूथ प्रोजेक्ट के राष्ट्रीय महासचिव, महात्मा गांधी सेवा आश्रम, जौरा के सचिव तथा भोपाल स्थित गांधी भवन न्‍यास के ट्रस्टी भी थे। पिछले लगभग 50 वर्षों से वे वंचित समुदायों के हित में जल, जंगल और जमीन पर समुदाय के अधिकारों के लिए सक्रिय रूप से संघर्ष और पैरवी करते रहे। वे प्रसिद्ध गांधीवादी कार्यकर्ता पी.वी. राजगोपाल के सहयोगी रहे और उनके साथ मिलकर चंबल क्षेत्र में सामाजिक परिवर्तन, ग्राम स्वराज और भूमि अधिकारों के आंदोलनों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

एकता परिषद के अनीश कुमार ने बताया कि तिल्दा से शुक्रवार रात 12 बजे उनके पार्थिव शरीर को सड़क मार्ग से महात्मा गांधी सेवा आश्रम के ग्वालियर संसाधन केंद्र, पुरानी छावनी थाना के पास लाया जाएगा। वहां सुबह 11 बजे से श्रद्धांजलि सभा के बाद पार्थिव शरीर को उनके पैतृक गांव मृगपुरा, जिला मुरैना ले जाया जाएगा।

विज्ञान से समाज सेवा की ओर

डॉ. परमार मूलतः एक कृषि वैज्ञानिक थे। उन्होंने विज्ञान में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की और प्रारंभिक दौर में कृषि संस्थान में शोध कार्य से जुड़े रहे। लेकिन गांधीवादी चिंतक एस.एन. सुब्बराव के संपर्क में आने के बाद उनके जीवन की दिशा बदल गई। सुब्बरावजी ने उनसे सवाल किया कि प्रयोगशालाओं में बैठकर भूख की समस्या का समाधान कैसे होगा। इस प्रश्न ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया और उन्होंने अपना जीवन समाज सेवा और ग्रामीण पुनर्निर्माण के कार्यों के लिए समर्पित कर दिया।

इसके बाद वे मुरैना के जौरा स्थित महात्मा गांधी सेवा आश्रम से जुड़ गए, जिसकी स्थापना स्वयं गांधीवादी सुब्बराव ने चंबल क्षेत्र में शांति, पुनर्वास और सामाजिक परिवर्तन के उद्देश्य से की थी।

चंबल में सामाजिक परिवर्तन की धारा

चंबल घाटी कभी डाकुओं के आतंक के लिए कुख्यात रही है। मुरैना में पले-बढ़े डॉ. परमार ने बचपन से ही डाकुओं के आत्मसमर्पण और उसके बाद के सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया को करीब से देखा। गांधीवादी मूल्यों से प्रभावित होकर उन्होंने आत्मसमर्पण कर चुके डकैतों के परिवारों, भूमिहीन किसानों और गरीब ग्रामीण समुदायों के पुनर्वास के लिए लंबे समय तक काम किया।

उन्होंने महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज के विचार को आधार बनाकर आजीविका के स्थानीय और टिकाऊ मॉडल विकसित करने का प्रयास किया। उनके प्रयासों से आश्रम में जैविक खादी उत्पादन और ग्रामोद्योग को बढ़ावा मिला, जिससे कई जरूरतमंद परिवारों को रोजगार मिला और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली।

आश्रम को नई दिशा

आश्रम से जुड़ने के शुरुआती वर्षों में डॉ. परमार ने देखा कि संस्थान आर्थिक संकट से गुजर रहा था और इसके बंद होने की स्थिति बन रही थी। उस समय उन्होंने युवा अवस्था में ही आश्रम की जिम्मेदारी संभाली और दिन-रात मेहनत कर इसे फिर से सक्रिय और आत्मनिर्भर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके नेतृत्व में खादी उत्पादन और ग्रामोद्योग की गतिविधियों को नई गति मिली।

आज आश्रम के खादी उत्पादों के बिक्री केंद्र जौरा, मुरैना और ग्वालियर में संचालित हो रहे हैं। हाल के वर्षों में आश्रम द्वारा मधुमक्खी पालन और शहद उत्पादन जैसी गतिविधियों को भी बढ़ावा दिया गया, जिससे क्षेत्र के अनेक युवाओं को रोजगार के अवसर मिले।

एकता परिषद से राष्ट्रीय स्तर तक सक्रियता

डॉ. परमार लंबे समय तक एकता परिषद से जुड़े रहे, जो भूमिहीनों, आदिवासियों और वंचित समुदायों के भूमि अधिकारों के लिए काम करने वाला देश का प्रमुख गांधीवादी आंदोलन है। बाद में वे इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष बने और देशभर में पदयात्राओं तथा जनआंदोलनों के माध्यम से भूमि सुधार, ग्राम स्वराज और सामाजिक न्याय के मुद्दों को उठाते रहे।

उन्होंने पी.वी. राजगोपाल के नेतृत्व में आयोजित कई ऐतिहासिक पदयात्राओं और अभियानों में सक्रिय भागीदारी की। उनके लिए पदयात्राएँ केवल आंदोलन का माध्यम नहीं थीं, बल्कि ग्रामीण समाज की समस्याओं को समझने और उनके समाधान खोजने का एक महत्वपूर्ण तरीका थीं।

सरलता और प्रतिबद्धता का प्रतीक

डॉ. रन सिंह परमार अपने सरल स्वभाव, सहज व्यक्तित्व और निरंतर मुस्कान के लिए जाने जाते थे। युवावस्था में उन्होंने अपने जीवन में कई बदलाव किए और स्वयं को पूरी तरह गांधीवादी जीवन मूल्यों अहिंसा, सत्य और सेवा के लिए समर्पित कर दिया।

गांधीवादी मूल्यों के प्रति समर्पित डॉ. परमार के निधन से देश भर के हजारों सामाजिक कार्यकर्ता, राजनीतिज्ञ, बुद्धिजीवी तथा लाखों जमीनी कार्यकर्ता शोकाकुल हैं। डॉ. रनसिंह परमार के निधन से गांधीवादी आंदोलन, ग्रामीण विकास और सामाजिक परिवर्तन के क्षेत्र को अपूरणीय क्षति हुई है।

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