शहर की अधिकांश जनता को 24×7 सुरक्षित व साफ पानी की उपलब्‍धता नहीं

जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया का इंदौर–भोपाल सर्वे में किये नागरिक सर्वे से खुलासा

इंदौर/भोपाल, 16 जनवरी। इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पेयजल से हुई त्रासदी के बाद जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया द्वारा इंदौर और भोपाल में जल आपूर्ति की वास्तविक स्थिति जानने के लिए किया गया नागरिक सर्वे कई गंभीर सवाल खड़े करता है। अब तक इस घटना में 24 लोगों की मौत हो चुकी है और 400 से अधिक लोग बीमार बताए जा रहे हैं। ऐसे में यह सर्वे बताता है कि शहरों में स्वच्छ और सुरक्षित पानी की उपलब्धता अभी भी दूर का सपना बना है।

जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया ने इंदौर में नगर निगम के 13 ज़ोन और 18 वार्डों के 34 शहरी इलाकों से 208 निवासियों को सर्वे में शामिल किया। वहीं भोपाल में कुल 53 नागरिकों से बातचीत की गई, जिनमें 11 लोगों का व्यक्तिगत सर्वे और 42 लोगों के साथ दो फोकस ग्रुप डिस्कशन किए गए।

अमूल्य निधि, रेहमत मंसूरी, साजिदा खान और सुधा तिवारी द्वारा तैयार इस रिपोर्ट में सामने आया है कि इंदौर में लगभग 89 प्रतिशत लोगों को सप्ताह के सातों दिन 24 घंटे पानी उपलब्ध नहीं होता। भोपाल में भी स्थिति इससे अलग नहीं है, जहाँ एक भी उत्तरदाता ने 24×7 जल आपूर्ति मिलने की पुष्टि नहीं की।

नागरिक सर्वे से यह भी उभर कर आया कि इंदौर में केवल 11 फीसदी लोग ही मानते हैं कि उन्हें नियमित और लगातार पानी मिल रहा है। दूसरी ओर, पानी की गुणवत्ता को लेकर लोगों में भारी असंतोष है। इंदौर में 60 फीसदी से अधिक लोगों ने कहा कि उन्हें मिलने वाला पानी वास्तव में साफ और पीने योग्य है या नहीं, इस पर उन्हें संदेह है। भोपाल में भी लगभग सभी लोगों की यही राय रही कि पानी की शुद्धता को लेकर उन्हें भरोसा नहीं है।

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सर्वे में चौंकाने वाला तथ्य यह है कि इंदौर में लगभग 99 प्रतिशत लोगों को यह तक जानकारी नहीं है कि उनके क्षेत्र में सप्लाई किए जाने वाले पानी का किसी तरह का परीक्षण होता है या नहीं। भोपाल में भी यही स्थिति सामने आई, जहाँ सभी उत्तरदाताओं ने कहा कि उन्हें पानी की जांच प्रक्रिया के बारे में कोई सूचना नहीं मिलती। इसका मायने यह है कि करोड़ों की योजनाओं और बड़े-बड़े दावों के बावजूद नागरिकों को यह नहीं पता कि वे जो पानी पी रहे हैं, वह सुरक्षित है या नहीं।

सर्वे रिपोर्ट के अनुसार इंदौर में लगभग 40 फीसदी लोगों ने स्वीकार किया कि वे या उनके परिवार के सदस्य जल जनित बीमारियों जैसे उल्टी-दस्त, टाइफाइड और पीलिया से पीड़ित हो चुके हैं। यह आँकड़ा बताता है कि दूषित पानी केवल एक असुविधा नहीं, बल्कि सीधे-सीधे एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है।

वर्ष 2004 में इंदौर में 24×7 जल प्रदाय व्यवस्था लागू करने के लिए एशियन डेवलपमेंट बैंक से 1365 करोड़ रुपये का कर्ज लिया गया था। इसके बाद वर्ष 2015 से 2025 के बीच अमृत 1.0 और अमृत 2.0 योजनाओं के तहत लगभग 3000 करोड़ रुपये खर्च किए गए। इसके बावजूद आज भी शहर की अधिकांश जनता को न तो नियमित पानी मिल रहा है और न ही सुरक्षित पानी। करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी नागरिक दूषित पानी पीने को मजबूर हैं और अपनी जान जोखिम में डाल रहे हैं।

जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया की अमूल्य निधि ने जलप्रदाय में निजीकरण, यानी पीपीपी मॉडल, की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि इससे जल आपूर्ति व्यवस्था और मजबूत होने के बजाय और कमजोर हुई है तथा जनस्वास्थ्य के मुद्दे को लगातार नजरअंदाज किया गया है। उनके अनुसार, सुरक्षित पेयजल की आपूर्ति केवल एक सेवा नहीं, बल्कि नागरिकों का बुनियादी अधिकार और एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य का विषय है।

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जन स्वास्थ्य अभियान इंडिया द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि भागीरथपुरा की घटना की स्वतंत्र और निष्पक्ष जाँच कर इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित किया जाए। सभी नागरिकों को तुरंत 24×7 दबाव के साथ सुरक्षित, स्वच्छ और पर्याप्त पानी की आपूर्ति सुनिश्चित की जाए तथा जलप्रदाय व्यवस्था में किसी भी स्तर पर लापरवाही पाए जाने पर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो। दूषित पानी से बीमार हुए सभी लोगों को मुफ्त और गुणवत्तापूर्ण इलाज उपलब्ध कराया जाए। पानी की गुणवत्ता और मात्रा CPHEEO के मानकों के अनुसार सुनिश्चित की जाए और जलप्रदाय व सैनिटेशन सिस्टम का स्वतंत्र थर्ड-पार्टी ऑडिट कराया जाए।

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