बाजार की ताकतों ने कला को उत्पाद बना दिया, कलाकारों को फ़िल्म उद्योग का कच्चा माल नहीं बनना चाहिए

विश्व रंगमंच दिवस पर इंदौर में इप्टा के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रसन्ना ने कहा

इंदौर, 27 मार्च। प्राणी जगत में इंसान ही एकमात्र ऐसा जीव है, जो कई भूमिकाओं में रहता है। समय पर व्यक्ति को अपनी अभिनय की भूमिका से बाहर आने की कला आना चाहिए। वर्तमान समय में बाजार की ताकतों ने कला को उत्पाद (कमोडिटी) बना दिया है। वर्तमान युवा पीढ़ी ने नाटक नहीं देखे है। यह स्थिति ठीक नहीं है।

ये विचार कला गुरु के नाम से विख्यात भारतीय जन नाट्य संघ इप्टा के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रसन्ना ने व्यक्त किये । वे कल विश्व रंगमंच दिवस के अवसर पर अपनी पुस्तक एक्टिंग एंड बियान्ड के विमोचन आयोजन में कला प्रेमियों को संबोधित कर रहे थे। अभिनव कला समाज सभागृह में युवा कलाकारों को अभिनय कला की बारीकियों के बारे में जानकारी देते हुए उन्होंने कहा कि नाटकों में मनोरंजन के साथ यथार्थ भी होना चाहिए।

नाट्यशास्त्र कहता है कि नकल करो, संवाद अदायगी में कलाकार का पूरा शरीर बोलना चाहिए। सबसे अच्छा सामुदायिक रंगमंच को माना गया है जिसमें दर्शक भी अपनी भूमिका निभा सकते हैं।

देश के कोने-कोने से लाखों युवा फिल्मों में काम करने की महत्वाकांक्षा लिए मुंबई पहुंच रहे हैं। अंधेरी, वर्सोवा, मड आईलैंड क्षेत्र में ये नौजवान लड़के-लड़कियां कठिन जीवन बिता रहे हैं। ये कोई बिगड़े हुए बच्चे नहीं है। ये बड़ी नौकरियाँ और अच्छे कैरियर छोड़कर एक्टिंग के लिए मुंबई में संघर्ष कर रहे हैं। वे मुझे भगत सिंह और विवेकानंद से कम गंभीर या समझदार नहीं लगते। फिल्म उद्योग इन युवाओं के शोषण के लिए तैयार बैठा है, उसे एक स्टार और बाक़ी सब एक्स्ट्रा चाहिए। इसलिए जरूरी है कि कलाकार काम के लिए मुंबई जाए लेकिन वहाँ बसे नहीं, अपितु लौट कर अपने शहर कस्बों में पहुँचकर स्थानीय थिएटर से जुड़े। प्रसन्ना ने कहा कि देश की शिक्षा नीति में थिएटर शिक्षा का प्रावधान रखा गया है, लेकिन उसे लागू नहीं किया गया। देश में इस पर कहीं भी सवाल नहीं उठाया जाता।

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इप्टा के राष्ट्रीय समिति सदस्य और कवि-नाटककार विनीत तिवारी ने कार्यक्रम का संचालन करते हुए कहा कि जिस युवा पीढ़ी को आज दिशाहीन तथा अपसंस्कृति के वाहक कहा जा रहा है, हमारा यक़ीन है कि वक़्त आने पर वह अपनी ज़िम्मेदारी वैसे ही निभाएगी जैसे आज़ादी के आंदोलन में निभायी थी। आज के हालात में इप्टा जैसे सांस्कृतिक आंदोलन की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है क्योंकि आज फिर से देश में जाति और संप्रदाय के नाम पर तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कहीं फिलिस्तीन और इज़रायल तो कहीं रूस और यूक्रेन में युद्ध के चलते मानवता संकट में है। नाटक अमन का संदेश जगा सकता है, लोगों को मोहब्बत सिखा सकता है। जन संघर्षों से जुड़कर कला निखरती है।  किसान आंदोलन में लेखकों-कलाकारों ने हज़ारों गीतों, चित्रों, कार्टूनों, रील्स, डॉक्यूमेंट्री फिल्मों आदि का निर्माण कर आंदोलन की  न्यायोचित माँगों को नैतिक बल प्रदान किया। इंदौर में रंगमंच की परंपरा पुरानी रही है। पृथ्वीराज कपूर, बलराज साहनी, जोहरा सहगल आदि अनेक ख्यातनाम कलाकारों ने इस शहर में अपनी नाट्य प्रस्तुतियाँ दी हैं।

कार्यक्रम के प्रारंभ में सेंचुरी मिल के श्रमिकों के अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे नवीन मिश्रा ने “ईश्वर अल्लाह तेरे जहाँ में नफ़रत क्यों है, जंग है क्यों” गीत गाया। श्रोताओं से संवाद कार्यक्रम में प्रसन्ना ने गुलरेज़ ख़ान, अभय नेमा, संजय वर्मा, सारिका श्रीवास्तव सहित अनेक कला प्रेमियों की व्यावहारिक कठिनाइयों के सवालों के जवाब दिए।

कार्यक्रम के अंत में रूपांकन संस्था द्वारा प्रसन्ना को स्मृति चिह्न भेंट किया गया। मालवी के प्रमुख लेखक, कलाकार और प्रगतिशील लेखक संघ, इंदौर के पूर्व अध्यक्ष अनंत श्रोत्रिय एवं विख्यात सामाजिक कार्यकर्ता,  रंगकर्मी और 1950 के दशक में इप्टा के महत्त्वपूर्ण अभिनेता रहे आनंद मोहन माथुर को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। कार्यक्रम में सिंधी लेखक चुन्नीलाल वाधवानी, समाजसेवी राहुल निहोरे सहित इंदौर की इप्टा इकाई के कलाकार प्रमोद बागड़ी, अशोक दुबे, विजय दलाल, रविशंकर, नितिन, विवेक सिकरवार, आदित्य जायसवाल, अथर्व शिंत्रे एवं शहर के अनेक युवा कलाकारों की सक्रिय उपस्थिति थी।

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