विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में प्रेस को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है, लेकिन हाल के वर्षों में प्रेस स्वतंत्रता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2026 में भारत का 157वें स्थान…
पश्चिम बंगाल चुनाव ने सिर्फ सत्ता परिवर्तन की संभावनाओं को नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की मौजूदा हालत को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है। भारी सुरक्षा, प्रशासनिक हस्तक्षेप, भय और अविश्वास के माहौल ने यह सवाल तेज कर दिया…
वर्ष 1960 में मई की पहली तारीख, यानि ‘अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस’ पर शुरु हुआ ‘सर्वोदय प्रेस सर्विस’ अब अपने करीब 66 वर्ष सफलतापूर्वक पूरे कर कर रहा है। इस मौके पर प्रस्तुत है, ‘सप्रेस’ के पुराने साथी, लेखक भारत डोगरा…
मजदूर संगठनों पर एक आरोप यह भी लगता रहा है कि वे अपने वेतन-भत्तों, सुविधाओं और अधिक-से-अधिक काम तथा रहन-सहन की परिस्थितियों यानि कि एक तरह के ‘अर्थवाद’ से बाहर नहीं निकल पाते, लेकिन क्या यह सही है? भारत समेत…
भारतीय दूरसंचार क्रांति के जनक सैम पित्रोदा ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर एक गंभीर बहस छेड़ दी है। मीडिया स्वराज के संपादक राम दत्त त्रिपाठी से एक साक्षात्कार में पित्रोदा ने आगाह किया कि एआई न केवल रोजगार के…
जीवन की अमूल्य जरूरत पानी के प्रति हमारी बेपरवाही ने अब ना तो उसे पर्याप्त मात्रा में छोड़ा है और न ही उसकी शुद्धता बरकरार रखी है। आखिर क्यों हो रही है, पानी के प्रति यह बदसलूकी? कैसे हमारी प्यास…
आज पृथ्वी दिवस हमें याद दिलाता है कि पर्यावरण संरक्षण केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि अस्तित्व का प्रश्न बन चुका है। ‘हमारी शक्ति, हमारा ग्रह’ थीम के साथ यह दिन अक्षय ऊर्जा और सतत विकास की ओर प्रेरित करता है। वनों…
ग्लोबल वार्मिंग की गिरफ्त में पृथ्वी धरती आज केवल गर्म नहीं हो रही, बल्कि मानवीय लालसाओं के कारण भीतर ही भीतर धधक रही है। हर वर्ष मनाया जाने वाला पृथ्वी दिवस हमें इस गंभीर पर्यावरणीय संकट की याद दिलाता है,…
कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार प्रतीत होने वाला अरावली संबंधी सरकारी एफिडेविट भविष्य के लिए गंभीर चिंता पैदा करता है। इसमें न प्रकृति की समझ झलकती है, न सांस्कृतिक दृष्टि। संवैधानिक दायित्वों और अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण प्रतिबद्धताओं की अनदेखी से पहाड़ों का…
रूस-यूक्रेन, इजरायल-गाजा के बाद अब युद्ध पश्चिम एशिया में केन्द्रित होता दिख रहा है। क्या समूचे, भरे-पूरे, जीवन्त देशों को एक-एक करके समाप्त करने का यह कारनामा कच्चे माल, उसे ‘पकाने’ में लगने वाली जरूरी ऊर्जा और बेचने के लिए…