नब्बे के दशक की शुरुआत में आए भू-मंडलीकरण के बाद की सभी रंगों-झंडों की सरकारों की सबसे बड़ी चिंता रही है – कृषि में लगी ग्रामीण आबादी के ‘सरप्लस’ को किस तरह उद्योगों यानि शहरों की तरफ हकाला जाए। विडंबना यह है कि इसे करने को हुलफुलाते वित्तमंत्रियों ने कभी अपने देशी समाज पर कोई गौर ही नहीं किया जहां खेती के संकटों से निपटने के कई कारगर उपाय मौजूद थे। प्रस्तुत है, ऐसे ही एक तरीके–‘अड़जी-पड़जी’ पर निलेश देसाई का यह लेख।–संपादक
निलेश देसाई
विरोधाभासों के बीच फंसी भारतीय कृषि आज एक अजीबोगरीब चौराहे पर खड़ी है। अर्थशास्त्री इसे ‘अधिशेष श्रम’ (सरप्लस लेबर) का क्षेत्र कहते हैं, जहाँ आवश्यकता से अधिक लोग नियोजित हैं, लेकिन धरातल की सच्चाई इसके ठीक उलट है। आज गाँव का किसान बुवाई और कटाई के महत्वपूर्ण समय में ‘हाथ’ तलाश रहा है, जबकि खेत में पसीना बहाने वाला मजदूर सम्मानजनक पारिश्रमिक और सुरक्षा के अभाव में शहरों की ओर पलायन कर रहा है। यह केवल एक आर्थिक संकट नहीं है, बल्कि उस सामाजिक ढ़ांचे का ढ़हना है जिसने सदियों से भारतीय गाँवों को आत्मनिर्भर बनाए रखा था।
इस गहराते संकट के बीच मध्यप्रदेश के झाबुआ की आदिवासी परंपरा ‘अड़जी-पड़जी’ एक ऐसी मशाल बनकर उभरती है, जो न केवल श्रम की समस्या का समाधान देती है, बल्कि आधुनिक खेती के लिए एक नया ‘इकोनॉमिक मॉडल’ भी प्रस्तुत करती है।
आज का भारतीय किसान दोहरी मार झेल रहा है। एक तरफ खेती में ‘प्रच्छन्न बेरोजगारी’ का शोर है, तो दूसरी तरफ बुवाई और कटाई के ‘पीक सीजन’ में किसान को एक मजदूर तक नसीब नहीं होता। जो मजदूर उपलब्ध हैं, उनकी नकद मजदूरी की मांग और किसान की भुगतान करने की घटती क्षमता के बीच एक गहरी खाई पैदा हो गई है।
इस संकट को हल करने के लिए हमने मशीनीकरण और खरपतवारनाशक रसायनों का सहारा लिया, लेकिन इस समाधान ने नई समस्याएं पैदा कर दीं। भारी मशीनों ने मिट्टी के स्वास्थ्य को बिगाड़ा और रसायनों ने जैव-विविधता को नष्ट किया। सबसे बड़ी मार महिलाओं पर पड़ी, जिनके हाथ से निदाई-गुड़ाई जैसे पारंपरिक काम छिन गए। मशीनीकरण ने श्रम की समस्या को हल करने के बजाय उसे ‘विस्थापित’ कर दिया और किसान को कर्ज के नए जाल में धकेल दिया।
‘अड़जी-पड़जी’ : सामूहिक श्रम की परंपरा
जहाँ आधुनिक नीतियां विफल होती हैं, वहां आदिवासी समाज का ‘स्थानीय ज्ञान’ मार्ग दिखाता है। झाबुआ और अलीराजपुर के आदिवासी अंचलों में प्रचलित ‘अड़जी-पड़जी’ कोई साधारण प्रथा नहीं, बल्कि श्रम के लोकतंत्रीकरण का उत्कृष्ट उदाहरण है।
‘अड़जी-पड़जी’ का दर्शन सरल और प्रभावी है। इसमें गाँव के किसान एक-दूसरे के खेतों में सामूहिक रूप से काम करते हैं। यदि आज एक किसान के खेत में बीज रोपना है, तो पूरा गाँव या टोला वहां मौजूद होगा। कल वही समूह दूसरे के खेत में जाएगा। यहाँ श्रम का मूल्य ‘नोटों’ में नहीं, बल्कि ‘सहयोग’ में मापा जाता है। इसमें न कोई मालिक है, न कोई नौकर; हर कोई एक-दूसरे का सहयोगी है।
‘अड़जी-पड़जी’ जैसी परंपराएं आधुनिक कृषि की तीन बड़ी चुनौतियों का समाधान करती हैं :
1. आर्थिक स्वावलंबन :छोटे और सीमांत किसानों के पास नकद राशि का अभाव होता है। ‘अड़जी-पड़जी’ नकद मजदूरी की आवश्यकता को समाप्त कर देती है, जिससे किसान को साहूकारों या बैंकों से कर्ज नहीं लेना पड़ता।
2. समयबद्धता और लचीलापन :कृषि में समय का बहुत महत्व है। बारिश होने के साथ ही बुवाई शुरू करनी होती है। ‘अड़जी-पड़जी’ के माध्यम से जो काम एक परिवार दस दिन में करता है वह सामूहिक श्रम से एक ही दिन में संपन्न हो जाता है।
3. श्रम की गरिमा और सुरक्षा : जब किसान एक-दूसरे के खेतों में काम करते हैं, तो काम में ‘सम्मान’ जुड़ जाता है। यह उन मजदूरों के लिए भी एक सुरक्षित विकल्प है जो शहरों की अमानवीय गलियों में धक्के खाने की बजाय अपने समुदाय के बीच रहकर गरिमापूर्ण जीवन जीना चाहते हैं।
परंपरा को नीति का समर्थन
झाबुआ के इस स्थानीय अनुभव को राष्ट्रव्यापी बनाने के लिए केवल सराहना काफी नहीं है, इसे नीतिगत समर्थन की आवश्यकता भी है। जाहिर है, एक ‘कृषि श्रम कोष’ की स्थापना समय की मांग है।
इस कोष का उद्देश्य उन समुदायों और समूहों को वित्तीय प्रोत्साहन देना होना चाहिए जो मशीनीकरण के बजाय पारंपरिक श्रम-साझा प्रणालियों को चुनते हैं। यह कोष छोटे और मध्यम किसानों को संगठित होने, ‘टूल बैंक’ (साझा कृषि उपकरण) बनाने और ‘पीक सीजन’ के दौरान होने वाले जोखिमों से निपटने में मदद कर सकता है। यदि सरकार ‘मनरेगा’ या इसकी जगह हाल में लाए गए ‘विकसित भारत – रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) के लिए गारंटी विधोयक 2025’ (वीबी – जीरामजी) जैसी योजनाओं को इन स्थानीय श्रम-साझा मॉडलों के साथ जोड़ दें तो ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और उत्पादकता दोनों में क्रांतिकारी बदलाव आ सकता है।
पारिस्थितिकी और सामाजिक न्याय का संगम
‘अड़जी-पड़जी’ केवल श्रम बचाने का तरीका नहीं है, यह ‘प्राकृतिक खेती’ का आधार भी है। जब श्रम सामूहिक होता है, तो रसायनों की जगह हाथों से निदाई-गुड़ाई संभव होती है। इससे मिट्टी की उर्वरता बचती है और पर्यावरण की रक्षा होती है। यह मॉडल सामाजिक न्याय की भी बात करता है, क्योंकि यह महिलाओं के श्रम को अदृश्य होने से बचाता है और उन्हें निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल करता है।
जड़ों की ओर वापसी
भारतीय कृषि आज जिस चौराहे पर खड़ी है, वहां रास्ता केवल ‘स्मार्ट सिटी’ या ‘बड़ी मशीनों’ से होकर नहीं जाता, बल्कि उन ‘साझा हाथों’ से होकर जाता है जो खेतों में एक-दूसरे को थामे हुए हैं। ‘अड़जी-पड़जी’ हमें याद दिलाती है कि खेती केवल एक व्यापार नहीं है, बल्कि एक सामुदायिक उत्सव और जीवन पद्धति है।
यदि हम वास्तव में किसान और मजदूर दोनों को बचाना चाहते हैं, तो हमें अपनी आधुनिक नीतियों में झाबुआ के ‘अड़जी-पड़जी’ मॉडल को जगह देनी होगी। स्थानीय ज्ञान और परंपराओं का सम्मान ही वह एकमात्र पुल है, जो वर्तमान के संकट और भविष्य की खुशहाली को जोड़ सकता है। यह समय मशीनों के शोर को कम करने और सहयोग की उन दबी हुई आवाजों को सुनने का है, जो हमारे गाँवों की मिट्टी में आज भी गूँज रही हैं। (सप्रेस)


