क्या रहने लायक बचे हैं, हमारे शहर ?

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चालीस-पेंतालीस डिग्री सेल्सियस की चपेट में आए भारत, खासकर उत्तर भारत में अब आमफहम जीवन भी कठिन-से-कठिनतर होता जा रहा है। खुद के बनाए विकास के तौर-तरीकों से पैदा हो रहे ऐसे हालातों से आखिर कैसे निपटा जाए? इसी पर प्रकाश डाल रहे हैं, सुदर्शन सोलंकी।–संपादक


वैश्विक तापमान में वृद्धि अब केवल बर्फीले ग्लेशियरों के पिघलने या समुद्र का जलस्तर बढ़ने तक सीमित नहीं रह गई है। इसका सबसे भयावह और सीधा रूप हमारे उन आधुनिक शहरों में देखने को मिल रहा है, जिन्हें हम कभी विकास का प्रतीक मानते थे। मई-जून की शुरुआत होते ही देश के कई महानगरों में पारा 45 डिग्री सेल्सियस से 48 डिग्री सेल्सियस को छूने लगता है। कांक्रीट के इन फैलते जंगलों में अब ‘गर्मी का मौसम’ सिर्फ एक ऋतु नहीं, बल्कि एक वार्षिक आपदा बन चुका है। वैज्ञानिक भाषा में इस संकट को ‘अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट’ (यूएचआई) कहा जाता है, जो हमारे दोषपूर्ण शहरी नियोजन की देन है।

‘अर्बन हीट आइलैंड’ : शहरों का ‘भट्टी’ में बदलना

भौतिक और पर्यावरणीय दृष्टि से देखें तो आधुनिक शहर अपने आसपास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में औसतन 3°C से 7°C तक अधिक गर्म रिकॉर्ड किए जा रहे हैं। इसका मुख्य कारण शहरों का ‘थर्मल मॉस’ है। आधुनिक इमारतों में प्रयुक्त होने वाला कंक्रीट, कंकड़-पत्थर, डामर (तारकोल) की सड़कें और कांच दिनभर सूर्य की ऊष्मा को सोखते हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में रात के समय खुली मिट्टी और पेड़-पौधों के कारण गर्मी तेजी से वायुमंडल में वापस लौट जाती है। इसके विपरीत, शहरों में बहुमंजिला इमारतें और घने कांक्रीट के ढांचे इस गर्मी को रात में भी जकड़े रखते हैं। परिणामस्वरूप, रातें भी उतनी ही दमघोंटू और उमस भरी हो जाती हैं, जिससे मानव शरीर को गर्मी से उबरने का समय नहीं मिल पाता।

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सामाजिक-आर्थिक असमानता और ‘थर्मल जस्टिस’ का संकट

यह थर्मल संकट केवल मौसम का मिजाज नहीं है, बल्कि एक गहरा सामाजिक और आर्थिक विभाजन भी पैदा कर रहा है। वातानुकूलित (एसी) घरों, दफ्तरों और कारों में रहने वाले संभ्रांत वर्ग के लिए गर्मी केवल बिजली के बढ़ते बिल तक सीमित है, लेकिन भारत जैसे देश में, जहाँ एक बहुत बड़ी आबादी ‘आउटडोर इकॉनॉमी’ का हिस्सा है, वहाँ यह जानलेवा साबित हो रही है।

निर्माण कार्यों में लगे श्रमिक, खेतिहर मजदूर, रेहड़ी-पटरी वाले और ‘गिग इकॉनॉमी’ के ‘डिलीवरी बॉय’ इस खौलती धूप में काम करने को मजबूर हैं। अत्यधिक गर्मी के कारण दोपहर के समय काम ठप हो जाता है, जिससे उनकी दिहाड़ी और दैनिक आय में भारी गिरावट आती है। झुग्गी-झोपड़ियों और कच्ची बस्तियों में रहने वाले लोग, जहाँ वेंटिलेशन न के बराबर है और छतें टिन या एस्बेस्टस की हैं, वे सीधे तौर पर ‘हीट स्ट्रोक’ और गंभीर ‘डिहाइड्रेशन’ के शिकार हो रहे हैं। यह स्थिति समाज में ‘थर्मल इनजस्टिस’ यानी ‘तापीय अन्याय’ को दर्शाती है।

भारत सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर ‘हीट एक्शन प्लान’ (एचएपी) की रूपरेखा तो तैयार की है और कागजों पर कई शहरों में इसे लागू करने का दावा भी किया जाता है, लेकिन इसकी व्यावहारिक प्रभावशीलता पर बड़े सवालिया निशान हैं। देश के अधिकांश हिस्सों में यह ‘प्लान’ केवल प्रशासनिक औपचारिकताओं तक सीमित दिखाई देते हैं। संकट आने पर केवल ‘एडवाइजरी’ जारी कर देना या ‘ओआरएस’ (ओआरएस) के पैकेट बांट देना इस ढांचागत समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। जब तक ‘हीट एक्शन प्लान’ को ‘शहरी विकास मास्टर प्लान’ के साथ अनिवार्य रूप से एकीकृत नहीं किया जाएगा, तब तक कोई बड़ा बदलाव संभव नहीं है।

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समाधान का भावी मार्ग : ‘क्लाइमेट-स्मार्ट’ शहरों का निर्माण

अगर हमें अपने शहरों को भविष्य में रहने योग्य बनाए रखना है, तो पारंपरिक निर्माण और शहरी नियोजन के ढर्रे को पूरी तरह से ‘ब्लू-ग्रीन इन्फ्रास्ट्रक्चर’ में बदलना होगा। शहरों में कंक्रीट के विस्तार को रोकने के लिए ‘अर्बन फॉरेस्ट’ (जैसे ‘मियावाकी पद्धति’ से जंगल उगाना) और ‘वेटलैंड्स’ (तालाबों और झीलों) का पुनरुद्धार करना होगा। पेड़ न केवल छाया देते हैं, बल्कि ‘वाष्पोत्सर्जन’ के जरिए स्थानीय तापमान को 2 से 3 डिग्री तक कम कर सकते हैं।

‘पैसिव कूलिंग’ और ‘आर्किटेक्चरल बदलाव’ को बढाना होगा। नए नीतिगत नियमों के तहत प्राकृतिक वेंटिलेशन को बढ़ावा देना चाहिए। इमारतों की छतों पर सफेद ‘उच्च-परावर्तक पेंट’ (शीतल छत) और ‘ग्रीन रूफ्स’ (छतों पर बागवानी) को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, जो ‘सौर विकिरण’ को वापस अंतरिक्ष में परावर्तित कर देते हैंl श्रम नीतियों में सुधार भी जरूरी है। अत्यधिक गर्मी के दिनों में श्रम कानूनों में लचीलापन लाते हुए ‘स्प्लिट शिफ्ट’ (सुबह जल्दी और शाम को देर से काम) की व्यवस्था की जाए और सार्वजनिक स्थानों पर छायादार आश्रय स्थल व शीतल पेयजल की चौबीसों घंटे उपलब्धता सुनिश्चित हो।

नदियों को सुखाकर, पेड़ों को काटकर और तालाबों को पाटकर खड़े किए गए कंक्रीट के आलीशान शहर दरअसल एक ऐसा ‘थर्मल ट्रैप’ (तापीय जाल) बन चुके हैं, जिसमें हम खुद ही फंसते जा रहे हैं। अब समय केवल मौसम की भविष्यवाणियों को पढ़ने का नहीं, बल्कि अपने शहरों के भूगोल को बदलने का है। यदि आज हमने शहरी नियोजन में प्रकृति को वापस जगह नहीं दी, तो आने वाले समय में हमारे शहर आर्थिक महाशक्ति बनने से पहले ही ‘तापमान के मरुस्थल’ बन जाएंगे। (सप्रेस)

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