‘अर्बन हीट आइलैंड’ से निपटने की ‘मियावाकी’ तकनीक

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मौजूदा विकास का तौर-तरीका कुछ ऐसा है कि सीमेंट के घने जंगलों में तब्दील होते हमारे शहर अब ‘अर्बन हीट आइलैंड’ यानि गर्मी के शहरी टापू बनते जा रहे हैं। ऐसे में जापानी वनस्पति-शास्त्री अकीरा मियावाकी की बताई तकनीक एक हद तक इनसे निपट सकती है। क्या है, यह तकनीक? बता रहे हैं, सुदर्शन सोलंकी।


भारत के 80 प्रतिशत से अधिक जिले भीषण गर्मी और चरम मौसम की मार झेल रहे हैं। इसका एक सबसे बड़ा कारण है—शहरों का ‘अर्बन हीट आइलैंड’ में तब्दील होना। आधुनिकता की होड़ में हमने पेड़ों को काटकर कांक्रीट के जंगल खड़े कर दिए हैं। डामर की सड़कें, ऊंची इमारतें और कांच के मुखौटे दिन भर सूरज की गर्मी को सोखते हैं और रात के समय उसे उत्सर्जित करते हैं। परिणाम यह होता है कि शहरों का तापमान ग्रामीण इलाकों की तुलना में 3 से 5 डिग्री सेल्सियस तक अधिक बना रहता है। यह अतिरिक्त गर्मी न केवल हमारी कार्यक्षमता को प्रभावित कर रही है, बल्कि ‘हीट स्ट्रोक’ जैसी जानलेवा बीमारियों का कारण भी बन रही है।

ग्लेशियरों का संकट-

जलवायु परिवर्तन का असर केवल मैदानी इलाकों तक सीमित नहीं है। हिमालयी ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने की दर ने वैज्ञानिकों की नींद उड़ा दी है। जब पहाड़ों की बर्फ पिघलती है और मैदानी इलाकों के पेड़ कम होते हैं, तो पूरा क्षेत्रीय जलवायु चक्र असंतुलित हो जाता है। दूसरी ओर नदियों के सूखने के कारण उस पारिस्थितिकी तंत्र के ढहने की शुरुआत होती है जो अरबों लोगों की प्यास बुझाता है। 

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‘एसी’ का मोह और बाहर बढ़ती तपिश-

विडंबना देखिए, जिस गर्मी से बचने के लिए हम ‘एयर-कंडीशनर’ (एसी) का सहारा लेते हैं, वही ‘एसी’ बाहर के तापमान को और बढ़ा रहे हैं। एक अध्ययन के मुताबिक, ‘एसी’ से निकलने वाली गर्म हवा बाहरी तापमान को 1 डिग्री तक बढ़ा सकती है। हम भीतर तो खुद को ठंडा रख लेते हैं, लेकिन बाहर की दुनिया को और अधिक झुलसने के लिए छोड़ देते हैं। यह एक ऐसा दुष्चक्र है जिसमें हम पर्यावरण की कीमत पर अपनी सुख-सुविधाएं खरीद रहे हैं।

‘मियावाकी तकनीक’-

जब हम ‘ग्रीन-कवर’ बढ़ाने की बात करते हैं, तो अक्सर जगह की कमी का रोना रोया जाता है। यहीं पर जापानी वनस्पति-शास्त्री अकीरा मियावाकी द्वारा विकसित ‘मियावाकी तकनीक’ एक क्रांतिकारी समाधान बनकर उभरती है। इस पद्धति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें पेड़ों को बहुत पास-पास लगाया जाता है, जिससे वे सूरज की रोशनी के लिए ऊपर की ओर तेजी से बढ़ते हैं।

‘मियावाकी तकनीक’ से उगाए गए जंगल सामान्य जंगलों की तुलना में 10 गुना तेजी से बढ़ते हैं और 30 गुना अधिक घने होते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि इन्हें हमारे घर के पीछे की छोटी सी जगह, सरकारी दफ्तरों के अहाते या रोड-डिवाइडर के बीच भी विकसित किया जा सकता है। ये छोटे जंगल न केवल कार्बन सोखने में माहिर होते हैं, बल्कि स्थानीय जैव-विविधता को भी आश्रय देते हैं और कंक्रीट के बीच ‘नेचुरल कूलिंग पैच’ का काम करते हैं। यदि हमारे शहरों के हर वार्ड में एक ‘मियावाकी वन’ हो, तो शहरी तापमान में उल्लेखनीय गिरावट लाई जा सकती है।

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‘ग्रीन-कवर’-

हमें यह समझना होगा कि हरियाली केवल सजावट की वस्तु नहीं है। एक परिपक्व पेड़ न केवल कार्बन सोखता है, बल्कि ‘वाष्पीकरण’ के जरिए प्राकृतिक ‘एयर कंडीशनर’ का काम करता है। यह आसपास के तापमान को 2 से 4 डिग्री तक कम करने की क्षमता रखता है। इंदौर और धार जैसे क्षेत्रों में, जहाँ गर्मी का प्रकोप बढ़ रहा है, ‘मियावाकी’ जैसी सघन वन तकनीकों को अपनाना अब समय की अनिवार्य मांग है। यह तकनीक ‘हीट डोम’ के असर को कम करने में ढाल की तरह काम करती है।

जलस्रोतों का पुनर्जीवन यानि धरती का ‘कूलिंग सिस्टम’-

धरती के तापमान को नियंत्रित करने में जलस्रोतों की भूमिका एक ‘कूलिंग सिस्टम’ की तरह होती है। अतिक्रमण और उपेक्षा के कारण सूखते तालाब और दम तोड़ती नदियाँ हमारी धरती की नमी को सोख रही हैं। जब तक जलस्रोतों का पुनर्जीवन नहीं होगा, तब तक ‘हीट डोम’ जैसे खतरों से पार पाना मुश्किल होगा। हमें वर्षा जल-संचयन (रेनवॉटर हार्वेस्टिंग) को एक अनिवार्य सामाजिक जिम्मेदारी बनाना होगा।

मिशन लाइफ-

भारत सरकार द्वारा शुरू किया गया ‘मिशन लाइफ’ (LiFE) हमें सिखाता है कि हम अपनी छोटी-छोटी आदतों से बड़ा बदलाव ला सकते हैं। ऊर्जा की कम खपत, सौर ऊर्जा का उपयोग और संसाधनों का ‘रीसायकल’ करना अब विकल्प नहीं, बल्कि जरूरत है। हमें विकास की ऐसी परिभाषा गढ़नी होगी जिसमें प्रकृति का विनाश नहीं, बल्कि उसका सह-अस्तित्व शामिल हो।

समय हाथ से निकल रहा है-

‘पृथ्वी दिवस’ (22 अप्रेल) बीत चुका है, लेकिन पृथ्वी के प्रति हमारी जिम्मेदारी हर दिन की है। यदि हम आने वाली पीढ़ी को एक सिसकती और प्यासी धरती नहीं देना चाहते, तो हमें आज ही कदम उठाने होंगे। अब समय केवल भाषणों और संकल्पों का नहीं है, बल्कि ‘मियावाकी’ जैसे ठोस प्रयोगों को हर गली-मोहल्ले तक ले जाने का है। याद रहे, प्रकृति के बिना मनुष्य का कोई अस्तित्व नहीं है। यदि हम आज प्रकृति के लिए ‘हरा कवच’ तैयार करेंगे, तभी कल प्रकृति हमारा बचाव कर पाएगी। (सप्रेस)

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