फरक्का का हिसाब : गंगा किसकी, पानी किसका और दर्द बिहार का?
गंगा के पानी का सवाल बिहार में केवल बाढ़ और सूखे के बीच का विरोधाभास नहीं, बल्कि खेती, मत्स्य जीवन, भूजल और नदी की पारिस्थितिकी से जुड़ा प्रश्न है। 1996 की भारत-बांग्लादेश गंगा जल संधि की समीक्षा के बीच फरक्का…
किशोर जायसवाल : बूंद-बूंद से भविष्य बचाने वाला जल योद्धा
जल संरक्षण की असली सफलता किसी संरचना के निर्माण में नहीं, बल्कि उसके सामुदायिक स्वामित्व में है। मुंगेर के किशोर जायसवाल ने अपने तीन दशक से अधिक के काम में इसी विचार को आधार बनाया। जलग्रहण विकास से लेकर टिकाऊ…
चंदन तिवारी की गायकी में इतिहास, स्मृति और स्वदेशी चेतना का जीवंत संवाद
इतिहास की किताबों में दर्ज गांधी और लोकमानस में बसे गांधी के बीच की दूरी लोकगीत मिटा देते हैं। भागलपुर में महात्मा गांधी के आगमन की शताब्दी पर चंदन तिवारी ने जब गांधी के लोकगीतों को स्वर दिया तो लगा,…
चरखा क्या बोले : इतिहास के करघे पर बुना गया गांधी का स्वप्न
महात्मा गांधी के चरखे को स्वराज, स्वदेशी और श्रम की प्रतिष्ठा के प्रतीक के रूप में केंद्र में रखकर डॉ. मीरा झा का उपन्यास “चरखा क्या बोले” स्वतंत्रता आंदोलन और ग्रामीण भारत की जीवंत गाथा प्रस्तुत करता है। यह कृति…
शंभू बॉर्डर से जंतर-मंतर तक: संवाद, दमन, जवाबदेही और लोकतंत्र की सिकुड़ती होती सीमाओं की पड़ताल
लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनावों से नहीं, बल्कि असहमति के प्रति उसके व्यवहार से होती है। हाल के छात्र आंदोलनों, किसान विरोध प्रदर्शनों और जंतर-मंतर की घटनाओं ने यह प्रश्न फिर खड़ा किया है कि क्या भारत में विरोध को…
अनशन से आगे का संघर्ष: सोनम वांगचुक से उठी एक ऐसी अपील, जिसने लोकतंत्र की आत्मा को छू लिया
लोकतांत्रिक आंदोलनों का इतिहास केवल संघर्षों का इतिहास नहीं है, बल्कि उन नैतिक दुविधाओं का भी इतिहास है, जहाँ एक ओर सिद्धांतों के लिए जीवन दांव पर लगा होता है और दूसरी ओर वही जीवन आंदोलन की सबसे बड़ी पूंजी…
बिहार : डिग्री कॉलेज तो खुल गए, गांधी कहां रह गए?
बिहार सरकार द्वारा 211 प्रखंडों में नए राजकीय डिग्री कॉलेज खोलने का निर्णय उच्च शिक्षा के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन इन महाविद्यालयों में गांधी विचार को स्थान न मिलना गंभीर सवाल खड़े करता है। शिक्षा यदि…
भूमि का सवाल : सामाजिक न्याय की कसौटी
आज के दौर में जमीन सर्वाधिक कीमती जिन्स बन गई है। नतीजे में उसे लेकर देशभर में भारी उथल-पुथल, मारकाट मची है और भूमिहीन समाज हाशिए पर खदेड दिया गया है। ऐसे में, किन तौर-तरीकों से जमीन का न्यायपूर्ण, अहिंसक…
30 जून : अन्याय के संगठित लड़ाई का मार्ग दिखाता है हूल आंदोलन
30 जून 1855 को संथालों ने केवल अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध हथियार नहीं उठाए, बल्कि जल, जंगल और जमीन पर अपने अधिकार की ऐतिहासिक घोषणा भी की। 171 वर्ष बाद भी ‘हूल’ केवल इतिहास का अध्याय नहीं, बल्कि विस्थापन, संसाधनों…
अमरनाथ झा : पत्रकारिता से नदी-पानी के जनसरोकार तक की अविस्मरणीय यात्रा
कुछ लोग अपने जाने के बाद भी स्मृतियों से नहीं, अपने विचारों और कर्मों से जीवित रहते हैं। वरिष्ठ पत्रकार अमरनाथ झा ऐसे ही विरल व्यक्तित्व थे, जिन्होंने पत्रकारिता को केवल पेशा नहीं, बल्कि समाज, नदी, जल, जंगल और मनुष्य…








