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बिहार  : डिग्री कॉलेज तो खुल गए, गांधी कहां रह गए?

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बिहार सरकार द्वारा 211 प्रखंडों में नए राजकीय डिग्री कॉलेज खोलने का निर्णय उच्च शिक्षा के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन इन महाविद्यालयों में गांधी विचार को स्थान न मिलना गंभीर सवाल खड़े करता है। शिक्षा यदि केवल डिग्रियाँ दे और नैतिकता, सत्य व सामाजिक चेतना की उपेक्षा करे, तो उसका उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।


बिहार में एक साथ 211 प्रखंडों में नए राजकीय डिग्री कॉलेजों की स्थापना निश्चित रूप से स्वागत योग्य कदम है। इससे दूर-दराज़ के विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा के अवसर मिलेंगे और शिक्षा का भौगोलिक विस्तार होगा। लेकिन शिक्षा का विस्तार तभी सार्थक होता है जब उसके साथ मूल्य, नैतिकता और सामाजिक चेतना का भी विस्तार हो। दुर्भाग्य यह है कि नए महाविद्यालयों में अनेक विषयों की पढ़ाई शुरू की गई, लेकिन गांधी विचार जैसे जीवनदायी विषय की पूरी तरह उपेक्षा कर दी गई।

यह केवल एक विषय की अनदेखी नहीं है, बल्कि उस विचारधारा की उपेक्षा है जिसने भारत को सत्य, अहिंसा, नैतिकता और जनभागीदारी का मार्ग दिखाया। आज जब समाज हिंसा, भ्रष्टाचार, असहिष्णुता, नैतिक पतन और सामाजिक विघटन जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है, तब गांधी विचार को शिक्षा से बाहर रखना भविष्य के साथ अन्याय है।

विडंबना यह है कि बिहार सरकार ने पूर्व में स्वयं यह स्वीकार किया था कि मूल्य आधारित शिक्षा को मजबूत करने के लिए गांधी विचार के विद्यार्थियों को बुनियादी विद्यालयों में शिक्षक बनने का अवसर दिया जाना चाहिए। इसके लिए सिफारिश भी की गई थी। लेकिन वह सिफारिश सरकारी फाइलों में ही दबकर रह गई। न नियुक्ति नियमावली बनी, न पद सृजित हुए और न गांधी विचार के विद्यार्थियों को कोई अवसर मिला। परिणाम यह हुआ कि वर्षों तक इस विषय का अध्ययन करने वाले सैकड़ों छात्र-छात्राओं का भविष्य अधर में लटक गया।

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आज नए राजकीय महाविद्यालय खुल रहे हैं, लेकिन उनमें भी गांधी विचार विभाग की कोई जगह नहीं है। यह प्रश्न केवल रोजगार का नहीं, बल्कि शिक्षा की आत्मा का है। यदि विश्वविद्यालय केवल रोजगारोन्मुख शिक्षा देंगे और चरित्र निर्माण को भूल जाएंगे, तो समाज में डिग्रीधारी तो बढ़ेंगे, लेकिन जिम्मेदार नागरिक नहीं।

महात्मा गांधी ने शिक्षा को केवल ज्ञान अर्जित करने का माध्यम नहीं माना। उनके लिए शिक्षा का उद्देश्य सत्य, सेवा, श्रम, आत्मानुशासन और चरित्र निर्माण था। उनकी बुनियादी शिक्षा का दर्शन मनुष्य को आत्मनिर्भर, नैतिक और समाजोपयोगी बनाने का दर्शन था। आज जब शिक्षा का बड़ा हिस्सा केवल अंक, प्रतियोगिता और नौकरी तक सीमित होता जा रहा है, तब गांधी विचार पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो उठता है।

देश का वर्तमान सामाजिक परिदृश्य भी यही संकेत देता है। सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार, राजनीतिक कटुता, सामाजिक वैमनस्य, हिंसा, परीक्षा घोटाले, प्रशासनिक अनियमितताएं और नैतिक मूल्यों का निरंतर क्षरण चिंता का विषय है। ऐसे समय में यदि कोई विचार भारतीय समाज को आत्ममंथन और आत्मशुद्धि की दिशा दिखा सकता है, तो वह गांधी का विचार है। गांधी ने सत्ता नहीं, समाज बदलने की बात की थी। उन्होंने कानून से अधिक अंतरात्मा को महत्व दिया था। आज शायद यही सबसे बड़ी आवश्यकता है।

गांधी विचार मंच एवं अंग जन-गण के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. सुधीर मंडल ने इस उपेक्षा को गंभीर बताते हुए कहा है कि गांधी विचार को नए महाविद्यालयों में स्थान नहीं देना बिहार की बौद्धिक परंपरा के साथ अन्याय है। उनका कहना है कि यदि सरकार मूल्य आधारित शिक्षा की पक्षधर है तो उसे अविलंब गांधी विचार की पढ़ाई शुरू करने, शिक्षकों के पद सृजित करने तथा नियुक्ति नियमावली जारी करने की दिशा में कदम उठाना चाहिए।

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वरिष्ठ गांधीवादी प्रसून लतांत का कहना है कि आज देश जिस नैतिक संकट से गुजर रहा है, उसमें गांधी विचार किसी वैकल्पिक विषय का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकता का विषय है। उनका मानना है कि विश्वविद्यालयों से यदि गांधी गायब हो जाएंगे तो समाज से सत्य, संवेदना और सहिष्णुता भी धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगी।

सामाजिक कार्यकर्ता सुबोध मंडल का कहना है कि बिहार की धरती चंपारण सत्याग्रह की भूमि है। यह वही प्रदेश है जहां गांधी ने किसानों, युवाओं और समाज को आत्मसम्मान और अहिंसक संघर्ष का रास्ता दिखाया था। यदि इसी बिहार के नए महाविद्यालयों में गांधी विचार के लिए स्थान नहीं होगा, तो यह केवल शैक्षणिक भूल नहीं, बल्कि ऐतिहासिक विस्मृति भी होगी।

गांधी विचार विभाग से जुड़े छात्र, शोधार्थी और शिक्षक भी वर्षों से इस विषय की उपेक्षा पर चिंता जता रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार ने पहले आश्वासन दिया, फिर सिफारिश की, लेकिन उसे कभी लागू नहीं किया। अब नए महाविद्यालयों में भी गांधी विचार को स्थान न देकर सरकार ने एक बार फिर इस विषय की उपेक्षा की है। यदि स्थिति नहीं बदली तो गांधीवादी परंपरा के अनुरूप पूरे बिहार में सत्याग्रह का रास्ता अपनाया जाएगा।

यह मांग किसी विशेष वर्ग के हित की मांग नहीं है। यह उस शिक्षा व्यवस्था की मांग है जिसमें तकनीकी दक्षता के साथ नैतिकता भी हो, रोजगार के साथ सामाजिक उत्तरदायित्व भी हो और ज्ञान के साथ विवेक भी हो। विश्वविद्यालयों का उद्देश्य केवल डिग्रियां बांटना नहीं, बल्कि ऐसे नागरिक तैयार करना है जो लोकतंत्र, संविधान और मानवीय मूल्यों की रक्षा कर सकें।

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आज आवश्यकता नए भवनों से अधिक नए विचारों की है। प्रयोगशालाओं के साथ चरित्र निर्माण की भी जरूरत है। पुस्तकालयों के साथ सत्य और अहिंसा की शिक्षा भी आवश्यक है। यदि शिक्षा व्यवस्था से गांधी को बाहर कर दिया जाएगा तो समाज में बढ़ती अराजकता, भ्रष्टाचार और नैतिक पतन को रोकना कठिन होगा।

सरकार को चाहिए कि वह अपने पुराने वादों को याद करे, गांधी विचार के विद्यार्थियों को बुनियादी विद्यालयों में शिक्षक नियुक्त करने संबंधी लंबित सिफारिश को लागू करे, नए राजकीय महाविद्यालयों में गांधी विचार विषय शुरू करे तथा नियमित शिक्षकों के पद सृजित कर शीघ्र नियुक्ति प्रक्रिया प्रारंभ करे।

बिहार यदि वास्तव में शिक्षा के क्षेत्र में नई मिसाल कायम करना चाहता है तो उसे केवल डिग्री कॉलेजों की संख्या नहीं बढ़ानी होगी, बल्कि शिक्षा में गांधी के विचारों को भी प्रतिष्ठित करना होगा। क्योंकि अंततः समाज का निर्माण केवल डिग्रियों से नहीं, बल्कि विचारों से होता है। और आज जब देश भ्रष्टाचार, हिंसा और नैतिक अवनति के कठिन दौर से गुजर रहा है, तब गांधी विचार कोई विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुका है।

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