आज के दौर में जमीन सर्वाधिक कीमती जिन्स बन गई है। नतीजे में उसे लेकर देशभर में भारी उथल-पुथल, मारकाट मची है और भूमिहीन समाज हाशिए पर खदेड दिया गया है। ऐसे में, किन तौर-तरीकों से जमीन का न्यायपूर्ण, अहिंसक और समान वितरण किया जाए? जमीन की मौजूदा गैर-बराबरी को लेकर हमारे समय के दो सामाजिक कार्यकर्ता – राजगोपाल पीवी और डी. बंदोपाध्याय – कोशिश कर रहे हैं। क्या हैं, उनके प्रयास?
भूमि का प्रश्न केवल राजस्व, प्रशासन या विकास परियोजनाओं भर का नहीं है। यह सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता और लोकतांत्रिक अधिकारों की सबसे महत्वपूर्ण कसौटी है। राजनीति में दशकों से पिछड़ों, दलितों, महादलितों और वंचित समुदायों के अधिकारों की चर्चा होती रही है, लेकिन भूमि-सुधार का सवाल आज भी अधूरा है। यही कारण है कि जब सरकार धार्मिक, औद्योगिक या पर्यटन परियोजनाओं के लिए सरकारी भूमि एक रुपये की ‘सांकेतिक लीज’ पर उपलब्ध कराती है, तो बहस केवल उस फैसले तक सीमित नहीं रहती। उसके केंद्र में यह प्रश्न भी खड़ा हो जाता है कि जहां लाखों परिवार आज भी भूमिहीन हैं, वहां भूमि नीति की प्राथमिकता क्या होनी चाहिए?
इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए भारत के दो महत्वपूर्ण भूमि चिंतकों — गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता राजगोपाल पीवी और भूमि सुधार विशेषज्ञ डी. बंदोपाध्याय — के विचार पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक दिखाई देते हैं।राजगोपाल का मानना है कि भूमि केवल उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि मनुष्य की गरिमा, आत्मनिर्भरता और नागरिक अधिकार का आधार है। ‘एकता परिषद’ के माध्यम से उन्होंने वर्षों भूमिहीनों, आदिवासियों और वनवासियों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। उनके नेतृत्व में निकली ‘जनादेश’ और ‘जन-सत्याग्रह’ यात्राओं ने यह प्रश्न राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में रख दिया कि जिस नागरिक के पास रहने या खेती करने के लिए अपनी जमीन नहीं है, वह लोकतंत्र में बराबरी का भागीदार कैसे बन सकता है?

राजगोपाल कहते हैं कि गरीबी का सबसे स्थायी समाधान भूमि अधिकार है। उनके अनुसार यदि किसी गरीब परिवार को न्यूनतम आवासीय और कृषि भूमि उपलब्ध करा दी जाए तो वह केवल सरकारी सहायता पर निर्भर नहीं रहेगा, बल्कि अपनी आजीविका और सम्मान दोनों अर्जित कर सकेगा। इसलिए उनके लिए भूमि सुधार केवल आर्थिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की बुनियाद है। इसी विचार को प्रशासनिक और नीतिगत रूप देने का प्रयास डी. बंदोपाध्याय ने किया। पश्चिम बंगाल में ‘ऑपरेशन बर्गा’ के सफल क्रियान्वयन के बाद उन्हें भूमि सुधार का सबसे बड़ा विशेषज्ञ माना गया। वर्ष 2006 में बिहार सरकार ने भी उन्हें ‘भूमि सुधार आयोग’ का अध्यक्ष बनाया। आयोग ने 2008 में जो रिपोर्ट सौंपी, उसमें भूमिहीनों को सरकारी भूमि का वितरण, बटाईदारों को कानूनी अधिकार, भूमि सीमा कानून को प्रभावी बनाने और भूमि अभिलेखों के आधुनिकीकरण जैसी महत्वपूर्ण सिफारिशें की गईं।

बंदोपाध्याय का मत था कि भूमि का अत्यधिक असमान वितरण ग्रामीण गरीबी और सामाजिक विषमता का मूल कारण है। यदि सामाजिक न्याय को वास्तविक अर्थ देना है तो सबसे पहले भूमि पर समान अवसर सुनिश्चित करना होगा। उनके अनुसार भूमि सुधार के बिना ग्रामीण विकास की सारी योजनाएं अधूरी रहेंगी। विडंबना यह है कि बिहार में भूमि सुधार पर अनेक आयोग बने, अनेक घोषणाएं हुईं, लेकिन भूमिहीनता आज भी मौजूद है। लाखों परिवार आज भी तीन से पांच ‘डिसमिल’ आवासीय भूमि के लिए सरकारी योजनाओं की प्रतीक्षा कर रहे हैं। बड़ी संख्या में खेतिहर मजदूरों के पास अपनी खेती योग्य भूमि नहीं है। ऐसे परिवारों के लिए भूमि केवल संपत्ति नहीं, बल्कि जीवन की सुरक्षा, सामाजिक सम्मान और आर्थिक स्वतंत्रता का आधार है।
इसी पृष्ठभूमि में हाल के सरकारी फैसलों को देखा जाना चाहिए। सरकार ने मुंगेर में जग्गी वासुदेव के ‘ईशा फाउंडेशन’ को धार्मिक एवं पर्यटन परियोजना के लिए, भागलपुर के पीरपैंती में औद्योगिक परियोजना के लिए, मोकामा में ‘तिरुमला तिरुपति देवस्थानम’ को मंदिर निर्माण के लिए तथा अन्य निवेश परियोजनाओं हेतु सरकारी भूमि सांकेतिक एक रुपये की ‘लीज’ पर उपलब्ध कराई है। सरकार का तर्क है कि इससे निवेश आएगा, रोजगार बढ़ेगा, पर्यटन विकसित होगा और राज्य की अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी। इन तर्कों का अपना महत्व है। किसी भी राज्य को उद्योग, पर्यटन और सार्वजनिक संस्थानों की आवश्यकता होती है, लेकिन क्या विकास की इन परियोजनाओं के समानांतर भूमिहीनों के लिए भी उतनी ही गंभीरता दिखाई जा रही है? यदि नहीं, तो सामाजिक न्याय का दावा अधूरा रह जाएगा।
यहीं राजगोपाल और बंदोपाध्याय की दृष्टि सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। दोनों अलग-अलग पृष्ठभूमि से आए हैं, लेकिन दोनों इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि भूमि अधिकार लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है। राजगोपाल ने इसे मानवीय गरिमा का प्रश्न कहा, जबकि बंदोपाध्याय ने इसे सामाजिक समानता की पहली शर्त माना। विपक्ष का आरोप है कि सांकेतिक दर पर भूमि देने की नीति भविष्य में सार्वजनिक संसाधनों के निजी नियंत्रण का रास्ता खोल सकती है। इससे इनकार करते हुए सरकार का कहना है कि लीज का अर्थ स्वामित्व हस्तांतरण नहीं है। भूमि राज्य की ही रहेगी और उपयोग भी निर्धारित शर्तों के अनुसार होगा। यह सही है कि ‘लीज’ स्वामित्व नहीं होती, लेकिन सार्वजनिक नीति केवल कानूनी व्याख्या से नहीं, बल्कि जनविश्वास से भी संचालित होती है। इसलिए पारदर्शिता, सार्वजनिक निगरानी और सामाजिक जवाबदेही अनिवार्य है।
हमें ऐसी भूमि नीति की आवश्यकता है जो विकास और सामाजिक न्याय को परस्पर विरोधी न माने। यदि धार्मिक पर्यटन, उद्योग और निवेश के लिए भूमि उपलब्ध कराई जाती है तो उसी प्रतिबद्धता के साथ भूमिहीन परिवारों को भी आवासीय और कृषि भूमि उपलब्ध कराने की समयबद्ध योजना लागू की जानी चाहिए। सरकारी भूमि का सर्वेक्षण, अतिक्रमण हटाना, भूमि अभिलेखों का डिजिटलीकरण, ग्रामसभाओं की भागीदारी और आयोगों की लंबित सिफारिशों पर अमल इस दिशा में आवश्यक कदम हो सकते हैं।
दरअसल, बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि एक रुपये की ‘लीज’ दी जाए या नहीं, बल्कि यह है कि राज्य की भूमि नीति का नैतिक और सामाजिक आधार क्या होगा। यदि भूमि केवल निवेश आकर्षित करने का साधन बन जाएगी तो सामाजिक न्याय का सपना अधूरा रहेगा, लेकिन यदि भूमि को विकास के साथ-साथ समान अवसर और मानवीय गरिमा के आधार के रूप में देखा जाएगा, तभी लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होंगी। राजगोपाल पीवी और डी. बंदोपाध्याय की विरासत हमें यही याद दिलाती है कि भूमि का प्रश्न केवल खेतों की मेड़ का नहीं, बल्कि समाज की बुनियादी संरचना का प्रश्न है। राजनीति ने सामाजिक न्याय का नारा अवश्य दिया है, अब उसे भूमि अधिकार के माध्यम से उस नारे को वास्तविक अर्थ देने की चुनौती स्वीकार करनी होगी। यही विकास और न्याय के बीच सबसे संतुलित और टिकाऊ रास्ता भी है। (सप्रेस)

