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शंभू बॉर्डर से जंतर-मंतर तक: संवाद, दमन, जवाबदेही और लोकतंत्र की सिकुड़ती होती सीमाओं की पड़ताल

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लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनावों से नहीं, बल्कि असहमति के प्रति उसके व्यवहार से होती है। हाल के छात्र आंदोलनों, किसान विरोध प्रदर्शनों और जंतर-मंतर की घटनाओं ने यह प्रश्न फिर खड़ा किया है कि क्या भारत में विरोध को लोकतांत्रिक अधिकार के बजाय कानून-व्यवस्था की चुनौती माना जाने लगा है।


लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सत्ता नहीं, बल्कि अपनी आलोचना को सुनने की क्षमता होती है। चुनाव लोकतंत्र की शुरुआत हैं, उसका अंतिम सत्य नहीं। लोकतंत्र तब परखा जाता है, जब नागरिक सड़कों पर उतरते हैं, छात्र प्रश्न पूछते हैं, किसान अपनी आशंकाएं व्यक्त करते हैं और विपक्ष सरकार से जवाब मांगता है। ऐसे समय में राज्य की प्रतिक्रिया ही यह तय करती है कि लोकतंत्र कितना आत्मविश्वासी है और कितना आशंकित।

पिछले कुछ वर्षों में भारतीय लोकतंत्र का एक नया दृश्य बार-बार सामने आया है। कहीं शंभू बॉर्डर पर कंक्रीट के बैरिकेड हैं, कहीं दिल्ली की सीमाओं पर कीलों से जड़ी सड़कें, कहीं इंटरनेट बंद है, कहीं धारा 144 लागू है और कहीं विरोध प्रदर्शन शुरू होने से पहले ही हिरासत की कार्रवाई। अब जंतर-मंतर और प्रधानमंत्री आवास के आसपास हुए हालिया घटनाक्रम ने इस बहस को और तीखा कर दिया है कि क्या भारत में असहमति को लोकतांत्रिक अधिकार की बजाय कानून-व्यवस्था की समस्या के रूप में देखा जाने लगा है?

21 जुलाई की घटनाओं ने केवल एक राजनीतिक विवाद नहीं खड़ा किया। उन्होंने भारतीय लोकतंत्र के सामने कई असहज प्रश्न रख दिए। छात्र आंदोलन, विपक्ष का प्रदर्शन, नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की हिरासत, बल प्रयोग के आरोप, और सबसे बढ़कर—आंदोलन स्थल पर सिविल ड्रेस (सादे कपड़ों) में मौजूद उन लोगों की भूमिका, जिनकी पहचान स्पष्ट नहीं थी। ये सभी प्रश्न किसी एक दल के नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही के प्रश्न हैं।

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लोकतंत्र में पुलिस की वर्दी केवल वस्त्र नहीं होती; वह राज्य की वैधानिक शक्ति और उसकी जवाबदेही का प्रतीक होती है। वर्दी पर लगी नेम प्लेट (नाम-पट्टिका), बैज (पहचान-चिह्न) और पहचान संख्या यह भरोसा देती है कि यदि कोई अधिकारी अपनी शक्ति का दुरुपयोग करेगा, तो उसकी पहचान संभव होगी और वह कानून के प्रति जवाबदेह होगा।

लेकिन यदि किसी प्रदर्शन स्थल पर बल प्रयोग करने वाले लोग सिविल ड्रेस (सादे कपड़ों) में हों, उनके पास कोई स्पष्ट पहचान न हो और वे भीड़ को नियंत्रित करते या प्रदर्शनकारियों को पकड़ते दिखाई दें, तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है। क्या वे दिल्ली पुलिस के अधिकारी थे? क्या वे किसी विशेष शाखा (स्पेशल ब्रांच) के कर्मी थे? क्या वे खुफिया एजेंसियों से जुड़े थे? या किसी अन्य सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा थे? यदि वे अधिकृत थे, तो उनकी पहचान सार्वजनिक क्यों नहीं थी? यदि अधिकृत नहीं थे, तो उन्हें यह अधिकार किसने दिया?

इन प्रश्नों का उत्तर किसी राजनीतिक दल को नहीं, बल्कि संबंधित प्रशासनिक एजेंसियों को देना चाहिए। लोकतंत्र में राज्य अदृश्य शक्ति नहीं हो सकता। उसके हर अधिकार के साथ जवाबदेही भी जुड़ी होती है।

सोशल मीडिया (सामाजिक माध्यम) पर अनेक वीडियो प्रसारित हुए, जिनमें कुछ लोग बिना वर्दी के आंदोलनकारियों के बीच दिखाई देते हैं। कई वीडियो में उनके खिलाफ बल प्रयोग के आरोप लगाए गए। इन वीडियो की स्वतंत्र पुष्टि होना आवश्यक है, लेकिन यदि इतने व्यापक स्तर पर संदेह पैदा हुआ है, तो उसे केवल अफवाह कहकर खारिज कर देना पर्याप्त नहीं होगा। लोकतंत्र में पारदर्शिता (खुलापन) संदेह का सबसे प्रभावी उत्तर होती है।

इसी प्रकार किसान आंदोलन का प्रश्न भी केवल कृषि नीति तक सीमित नहीं है। पंजाब और हरियाणा के किसान भारत-अमेरिका प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर अपनी आशंकाएं व्यक्त कर रहे हैं। उनकी चिंता है कि यदि कृषि और डेयरी क्षेत्र को पर्याप्त सुरक्षा दिए बिना मुक्त व्यापार लागू किया गया, तो छोटे किसानों की प्रतिस्पर्धा बहुराष्ट्रीय कंपनियों और अत्यधिक सब्सिडी प्राप्त विदेशी कृषि से कैसे होगी? सरकार का कहना है कि राष्ट्रीय हितों की रक्षा की जाएगी। लेकिन लोकतंत्र में केवल आश्वासन पर्याप्त नहीं होता; विश्वास संवाद से बनता है।

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यही कारण है कि शंभू बॉर्डर पर खड़े बैरिकेड केवल सड़क नहीं रोकते, वे संवाद के अवरुद्ध होने का भी प्रतीक बन जाते हैं। जब बातचीत से पहले कंक्रीट की दीवारें खड़ी कर दी जाती हैं, तब लोकतंत्र की आत्मा पर भी प्रश्न उठते हैं।

भारतीय इतिहास बताता है कि बड़े जन आंदोलनों का समाधान कभी केवल प्रशासनिक शक्ति से नहीं निकला। चंपारण सत्याग्रह, जेपी आंदोलन, मंडल आंदोलन, अन्ना आंदोलन या हाल का किसान आंदोलन—हर बार अंततः संवाद ही रास्ता बना। बैरिकेड समय खरीद सकते हैं, समाधान नहीं।

लोकतंत्र का अर्थ यह नहीं कि हर विरोध सही है या सरकार का हर निर्णय गलत। लोकतंत्र का अर्थ यह है कि मतभेदों का समाधान बल की जगह संवाद से खोजा जाए। सरकार को शासन का अधिकार जनता देती है, लेकिन उसी जनता को प्रश्न पूछने का अधिकार भी संविधान देता है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार स्पष्ट रूप से बताए कि आंदोलन स्थलों पर सिविल ड्रेस (सादे कपड़ों) में मौजूद कर्मियों की भूमिका क्या थी। कितने लोग ऐसे थे? वे किस एजेंसी से जुड़े थे? क्या उनके पास पहचान-पत्र थे? क्या उन्हें भीड़ नियंत्रण का अधिकार प्राप्त था? इन प्रश्नों के उत्तर देने से सरकार कमजोर नहीं होगी; बल्कि लोकतांत्रिक विश्वास और मजबूत होगा।

दूसरी ओर, आंदोलनकारी संगठनों की भी जिम्मेदारी है कि वे अपने आरोपों को तथ्य और प्रमाण के साथ रखें। सोशल मीडिया पर प्रसारित प्रत्येक वीडियो अंतिम सत्य नहीं होता। किसी भी गंभीर आरोप की निष्पक्ष जांच आवश्यक है। यदि बल प्रयोग हुआ है, तो जिम्मेदारी तय हो। यदि आरोप निराधार हैं, तो वह भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट हो। यही कानून के शासन का मूल सिद्धांत है।

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आज भारत विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्था बनने की आकांक्षा रखता है। लेकिन आर्थिक शक्ति का वास्तविक आधार केवल निवेश नहीं, बल्कि संस्थाओं पर जनता का भरोसा भी होता है। यदि नागरिकों को यह महसूस होने लगे कि उनकी आवाज़ सुनने से पहले उन्हें बैरिकेड, हिरासत और पुलिस बल का सामना करना पड़ेगा, तो लोकतंत्र की नैतिक शक्ति कमजोर होने लगती है।

अंततः सवाल केवल शंभू बॉर्डर, जंतर-मंतर या किसी एक प्रदर्शन का नहीं है। सवाल यह है कि भारत किस प्रकार का लोकतंत्र बनाना चाहता है—ऐसा लोकतंत्र, जहाँ असहमति को सुरक्षा चुनौती माना जाए, या ऐसा लोकतंत्र, जहाँ विरोध को नीति सुधार का अवसर समझा जाए।

इतिहास सत्ता के आकार से नहीं, उसके आचरण से निर्णय करता है। सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन लोकतांत्रिक परंपराएं पीढ़ियों तक जीवित रहती हैं। इसलिए आज जो भी निर्णय लिए जाएंगे, वे केवल वर्तमान राजनीति का हिस्सा नहीं होंगे; वे भविष्य के लोकतांत्रिक मानदंड भी बनेंगे।

लोकतंत्र की सबसे मजबूत दीवार कंक्रीट के बैरिकेड नहीं, बल्कि नागरिकों का विश्वास होता है। जब विश्वास टूटता है, तो सबसे ऊंची दीवारें भी व्यवस्था को सुरक्षित नहीं रख पातीं। और जब विश्वास बना रहता है, तब सबसे तीखे मतभेद भी संवाद की मेज पर सुलझ जाते हैं।

यही भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती है, और यही उसकी सबसे बड़ी आशा भी।

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