विचार समसामयिक

‘झोलावालों’ से ‘दिमागी नक्सल’ तक

‘झोलावालों’ से ‘दिमागी नक्सल’ तक
विवेक पिंटो

स्वतंत्रता आंदोलन से अभी हाल तक हमारे यहां गैर-दलीय राजनीति की खासी हवा चली थी। इस दौर में तमाम बातों के अलावा अपने आसपास की दुनिया पर सवाल उठाना सिखाया जाता था। धीरे-धीरे सवाल उठाना न सिर्फ अपराध होता गया, बल्कि सवाल उठाने वालों को ‘दिमागी नक्सल’ तक कहा जाने लगा। क्या मौजूदा निजाम की यह हरकत हमारे युवा दिमागों को भोंथरा नहीं बना रही है? क्या प्रश्नहीन दिमाग ‘भक्त’ बनाने, बनाए रखने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त नहीं होते?


1970 का दशक भारत के लिए राजनीतिक उथल-पुथल और अस्थिरता का दौर था। इसके बावजूद, वह एक ऐसा समय था जब व्यवस्था के टकरावों को लोकतंत्र की जीवन-रेखा माना जाता था, न कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए कोई संकट। मैं यह बात पूरी प्रामाणिकता के साथ कह सकता हूँ क्योंकि मैं इस इतिहास का महज़ गवाह नहीं रहा, बल्कि मैंने इसमें सक्रिय भूमिका निभाई है।

जब भारत के ‘दूधवाले’ यानी ‘आणंद मिल्क यूनियन लिमिटेड’ (अमूल) के महाप्रबंधक डॉ. वर्गीज कुरियन कायरा जिले के दुग्ध-उत्पादक किसानों की सामाजिक-आर्थिक हकीकत का नक्शा तैयार कर रहे थे, ताकि फिल्मकार श्याम बेनेगल उस पर फिल्म बना सकें, तब मैं उनके साथ काम कर रहा था।

बाद में, मैं मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में ‘विज्ञान शिक्षण’ से जुड़ी स्वयंसेवी संस्था ‘किशोर भारती’ से जुड़ा। यहाँ हम बेहद आदर्शवादी और जुनूनी लोगों की एक टीम थे, जिसका नेतृत्व ‘टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च’ (टीआईएफआर) जैसी प्रतिष्ठित संस्था को छोड़कर आए मॉलिक्यूलर बायोलॉजिस्ट डॉ. अनिल सद्गोपाल कर रहे थे।

हम एक ऐसे देश के नागरिक थे जो अपने ही दिमाग से, अपनी सोच से डरा हुआ नहीं था। हमने निस्वार्थ भाव से ग्रामीण युवाओं को खोज-आधारित विज्ञान के चमत्कारों से रूबरू कराया और उन्हें प्रयोगों को आकार देने के लिए सवाल (सवाल ही राम) पूछना सिखाया।

आज, जो लोग सवाल पूछते हैं, उन्हें डराया-धमकाया जाता है; उन्हें अलग-थलग करने और खत्म करने की धमकियाँ दी जाती हैं। इसके बावजूद, इस चुनौती को ‘जेन-ज़ी’ और ‘ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन’ (आईसा) जैसे छात्र संगठनों ने बड़ी बहादुरी से स्वीकार किया है। जंतर-मंतर पर प्रतिरोध के जिस ‘अवज्ञा उत्सव’ ने पूरे देश का ध्यान खींचा था, उसका समापन केंद्रीय शिक्षामंत्री के इस्तीफे के साथ हुआ। इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो चुके इस घटनाक्रम को वरिष्ठ पत्रकार हरीश खरे ने 21 जुलाई के ‘द वायर’ में रेखांकित किया है – ‘20 जुलाई को लक्ष्मण रेखा पार कर ली गई।’ 

See also  शिक्षा : बाधाओं के बीच भी बेहतर प्रबंधन के रास्‍ते खोजने की जरूरत

इसके बाद से राजनीतिक रंगमंच ने अगस्त के महीने में बयानबाजी का एक और खौफनाक दौर देखा और देश के शब्दकोश में एक नया, डरावना मुहावरा शामिल हो गया : ‘दिमागी नक्सल।’ राज्य ने अब अपना युद्धक्षेत्र मध्य भारत के भौतिक जंगलों से हटाकर मानव चेतना और मस्तिष्क के आंतरिक ढांचे के भीतर स्थानांतरित कर दिया है।

1970 के दशक में ‘होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम’ (एचएसटीपी) द्वारा बनाए गए पोस्टकार्ड वाले मासूम शैक्षिक ‘शुभंकरों’ से लेकर आज राज्य-प्रायोजित ‘विचार-शिकार’ (माइंड-हंट्स) तक की यह यात्रा, दरअसल स्वतंत्र सोच और वैज्ञानिक पूछताछ के व्यवस्थित अपराधीकरण की कहानी है। कल तक जिस ‘झोलावाले’ के आदर्शवाद को एक सहज रूप में देखा जाता था, आज उसी झोले को राष्ट्रीय संप्रभुता के लिए एक खतरे के रूप में पेश कर कानूनी शिकंजे में कसा जा रहा है।

भारतीय लोकतंत्र का आधारभूत ढांचा इस मामले में किस हद तक सड़ चुका है, इसे समझने के लिए मैं सवाल पूछने की उसी जन्मभूमि यानी ‘एचएसटीपी’ की ओर लौटता हूँ। ‘किशोर भारती’ की टीम का मिशन एक संज्ञानात्मक संस्कृति (कॉग्निटिव कल्चर) को विकसित करना था, न कि किसी तख्तापलट या विद्रोह को। हमने रटने और समर्पण करने वाली गुलामी की जगह एक ‘वैज्ञानिक मिजाज’ को स्थापित किया था।

इस शैक्षणिक बगावत के केंद्र में ‘सवालीराम’ नाम का एक काल्पनिक चरित्र था, जिसे बच्चे ‘बाल वैज्ञानिक’ (1972-2002) के तहत अपनी इच्छा से कोई भी सवाल पूछते हुए पोस्टकार्ड लिखते थे। यह ‘वर्कबुक’ (कार्यपुस्तिका) कक्षाओं से मिले अनुभवों के आलोक में टीम द्वारा लगातार संपादित की जाती थी। शुरुआती दौर में इसमें प्रायोगिक भौतिकी, रसायन विज्ञान और जीव विज्ञान शामिल थे, बाद में हाईस्कूल के लिए भौतिकी, रसायन, व्यावहारिक गणित और ज्यामिति को भी जोड़ा गया।

यह बात स्वतः स्पष्ट थी कि विज्ञान पढ़ाने के इस ‘खोज-आधारित दृष्टिकोण’ में सवाल पूछना अनिवार्य था, क्योंकि ‘सब कुछ पहले से तय नहीं था।’ ‘एचएसटीपी’ ने ‘सवालीराम’ की कल्पना ‘राम’ के रूप में की थी – जो बौद्धिक झोलावाले का एक बेहद आत्मीय और मित्रवत अवतार था।

See also  विचार : क्या गवई के ‘धैर्य’ से सत्ता के सिंहासनों की चूलें हिल गईं ?

सुशील जोशी अपनी किताब ‘जश्न-ए-तालीम’ (एकलव्य, 2008) में लिखते हैं, ‘सवालीराम के पास आने वाले सवालों की समीक्षा करें, तो वे वर्कबुक की सीमाओं से लेकर बच्चों के रोज़मर्रा के अनुभवों तक फैले हुए थे।’ 

इसलिए, एक ग्रामीण छात्र टीम को पत्र लिखकर यह पूछ सकता था कि गाँव के कुएं पर स्थानीय सवर्ण जमींदार का ही नियंत्रण क्यों है, या पारंपरिक पूजा-पाठ के बावजूद फसल क्यों बर्बाद हो गई? और उसे जवाब में किसी पाठ्यपुस्तकीय रूढ़िवादिता या घुड़की का सामना नहीं करना पड़ता था।

इस तरह, स्कूली बच्चों को सत्ता और प्रकृति का खुद विश्लेषण करने के लिए वैज्ञानिक अवलोकन के औजार मिले। हमारी टीम के सदस्यों के झोले टेस्ट ट्यूब, चुंबक, लेंस और पोस्टकार्डों से भरे होते थे – वे एक वैकल्पिक राष्ट्र-निर्माण के प्रतीक थे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि उस समय का राज्य पूछताछ और प्रयोग को ‘राजद्रोह’ नहीं मानता था; बल्कि वह इसके लिए धन देता था।

‘अमूल’ में इसी कड़े और सुधारात्मक टकराव के मिजाज ने आर्थिक और सांस्कृतिक परिदृश्य को बदल दिया था। कुरियन और उनके समूह ने श्याम बेनेगल के साथ बैठकर इस जमीनी और कच्चे सामाजिक टकराव को पर्दे पर उतारने की चर्चा की। नतीजतन, 1976 में फिल्म ‘मंथन’ का जन्म हुआ। गिरीश कर्नाड ने पशु चिकित्सक डॉ. मनोहर राव के रूप में पर्दे पर कदम रखा और वास्तविक दुनिया के सामने एक शक्तिशाली सिनेमाई आईना पेश किया कि कैसे ‘डेयरी उद्योग सामाजिक-आर्थिक बदलाव का एक साधन है।’ 

डॉ. राव एक मुकम्मल झोलावाले थे। वह कायरा जिले के एक गांव में ढलती शाम के वक्त पहुंचे थे, उनके पास कंधे पर लटके एक कपड़े के बैग (झोले), दूध-विश्लेषक (मिल्क एनालाइजर), बही-खाते और एक पशु चिकित्सा किट के अलावा कुछ नहीं था। खतरा, यदि कोई था, तो वह पूरी तरह से व्यवस्था और यथास्थिति के लिए था। बाधाओं को तोड़कर हाशिए पर पड़े, निचली जाति के दुग्ध उत्पादक किसानों को सामंती अभिजात वर्ग के साथ ही दिन में दो बार एक ही कतार में खड़ा होना पड़ता था।

See also  गणित को अनुभूति बनाने वाला अमर साधक श्रीनिवास रामानुजन 

उस दौर से लेकर 2026 के समकालीन परिदृश्य तक का संक्रमण राज्य और नागरिक के बीच के संबंधों का पूरी तरह उलट जाना है। आज राज्य अपनी विफलताओं को छिपाने और जमीनी स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं को ‘मानसिक और वैचारिक स्पेस’ के लिए सीधे खतरे के रूप में ब्रांड करके उनका दमन कर रहा है। राज्य की नीतियों की एक स्वतंत्र, व्यवस्थागत आलोचना करना अब एक स्वस्थ, वैज्ञानिक दृष्टिकोण का संकेत नहीं माना जाता। इसके विपरीत, ‘दिमागी नक्सल’ के बैनर तले खुद बुद्धि और विवेक को ही एक बीमारी करार दे दिया गया है।

परम पाखंड यह है कि जहाँ 1976 के ‘मंथन’ ने हाशिए के लोगों को मुक्त करने के लिए दूध का मंथन किया था, वहीं इस शासन ने एक अलग तरह का मंथन शुरू किया है – एक ऐसा मनोवैज्ञानिक अनुकूलन (कंडीशनिंग) जिसका उद्देश्य शुद्ध, बिना किसी सवाल वाली ‘भक्ति’ पैदा करना है।

इस वैचारिक और शाब्दिक बदलाव का एकमात्र उद्देश्य देश को दो धड़ों में बांटना है: एक तरफ वे ‘दिमागी नक्सल’ जिन्हें विश्लेषण करने की जुर्रत के कारण अपराधी बना दिया गया है, और दूसरी तरफ वे ‘भक्त’ जो बिना सोचे-समझे कॉर्पोरेट और राजनीतिक ‘ज़ोंबी’ में तब्दील हो चुके हैं, जिन्हें सिर्फ तालियाँ बजाने की ट्रेनिंग दी गई है।

कुरियन, उनके समूह और ‘किशोर भारती’ की टीम के साथ काम करते हुए मैंने करीब से देखा है कि वास्तविक राष्ट्र-निर्माण कैसा होता है। यह हर तरह के खतरनाक सवाल पूछने वाले पोस्टकार्डों से भरा हुआ एक कमरा होता है; यह जातिगत दीवारों और पितृसत्ता से मुक्त दूध की एक कतार होती है। आज, छात्रों से कहा जा रहा है कि वे अपनी जिज्ञासा का सौदा कायरता और चाटुकारिता से कर लें।इसके बावजूद, अपने कंधों पर झोला लटकाए लाखों जिंदादिल ‘सवालीराम’ देश भर की सड़कों पर उतर चुके हैं। वे छात्रों के साथ मिलकर अपने जर्जर स्कूलों और नदारद शिक्षकों के लिए जवाबदेही मांग रहे हैं – और ऐसा करते हुए वे लाठियों, पानी की बौछारों, आंसू गैस के गोलों और पैलेटगन का बहादुरी से सामना कर रहे हैं! (सप्रेस)

लेखक का परिचय

विवेक पिंटो

श्री विवेक पिंटो सोफिया विश्वविद्यालय, टोकियो (जापान) के फैलो रहे हैं। उन्होंने ‘किशोर भारती’ आणंद मिल्क यूनियन लिमिटेड (अमूल) जैसे कई सामाजिक संगठनों के साथ काम किया है।

जुड़ें - हमारे व्हाट्सएप चैनल से

सप्रेस मीडिया - नवीनतम आलेख, रिपोर्ट, समाचार अपडेट सीधे अपने व्हाट्सएप पर प्राप्त करें।

व्हाट्सएप ग्रुप से जुड़ें →

निष्पक्ष पत्रकारिता का समर्थन करें

आज के दौर में निष्पक्ष, स्वतंत्र और जन-सरोकार की पत्रकारिता को जीवित रखना बड़ी चुनौती है। विज्ञापनदाताओं और कॉर्पोरेट के दबाव से मुक्त होकर आप तक सही और सटीक खबरें पहुंचाना हमारा मुख्य उद्देश्य है। हमारी स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए आपके आर्थिक सहयोग की आवश्यकता है। आपकी दी हुई छोटी-सी सहयोग राशि हमें सच्ची पत्रकारिता करते रहने का संबल देगी।

सहयोग राशि →

संबंधित आलेख

सर्वाधिक पढ़े गए