शंकरगढ़ (प्रयागराज)। जल, जंगल और जमीन के संरक्षण को लेकर जनजागरण के उद्देश्य से मंगल भूमि फाउंडेशन के स्वयंसेवकों ने लोनी नदी की अध्ययन यात्रा शुरू की है। यात्रा के दौरान स्वयंसेवक नदी की वर्तमान स्थिति, जल प्रवाह, प्रदूषण, अतिक्रमण, पारंपरिक जल स्रोतों तथा नदी से जुड़े सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय पहलुओं का अध्ययन कर रहे हैं।
अध्ययन दल ने लोनी नदी के तटवर्ती गांवों का भ्रमण कर स्थानीय लोगों से संवाद स्थापित किया और नदी के ऐतिहासिक महत्व के साथ-साथ वर्तमान चुनौतियों की जानकारी जुटाई। स्वयंसेवकों ने पाया कि नदी क्षेत्र में जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन और नदी पुनर्जीवन के लिए सामुदायिक सहभागिता को और मजबूत करने की आवश्यकता है।
मंगल भूमि फाउंडेशन के डॉ. श्रवण ने बताया कि अध्ययन यात्रा का उद्देश्य केवल जानकारी एकत्र करना नहीं, बल्कि स्थानीय समुदाय, युवाओं और प्रशासन के सहयोग से नदी संरक्षण की एक प्रभावी कार्ययोजना तैयार करना है। उन्होंने कहा कि संस्था भविष्य में लोनी नदी के संरक्षण और पुनर्जीवन के लिए जनजागरण अभियान, श्रमदान तथा विभिन्न पर्यावरणीय गतिविधियों का आयोजन करेगी।
पर्यावरण संरक्षक, जल प्रहरी रामबाबू तिवारी ने कहा कि अध्ययन यात्रा के माध्यम से नदी किनारे बसे गांवों के लोगों को नदी से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। उनका कहना था कि समाज धीरे-धीरे नदियों से कटता जा रहा है और संवाद के माध्यम से ही नदी पुनर्जीवन के लिए जनभागीदारी सुनिश्चित की जा सकती है। इसी क्रम में अध्ययन दल ने जोरवट गांव के ग्रामीणों से बातचीत कर नदी संरक्षण के लिए उनके सुझाव भी लिए।
गांव निवासी अरुण सिंह ने बताया कि लोनी नदी कभी क्षेत्र की जीवनरेखा हुआ करती थी, लेकिन वर्तमान में इसका जल प्रवाह कम हो रहा है और नदी का रकबा भी सिकुड़ता जा रहा है। उन्होंने कहा कि क्षेत्र के जल और पर्यावरण संतुलन के लिए नदी का पुनर्जीवन बेहद जरूरी है।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग के सहायक आचार्य डॉ. पंकज श्रीवास्तव ने कहा कि नदी की अविरलता और निर्मलता बनाए रखने के लिए नदी किनारे बड़े पैमाने पर पौधरोपण जरूरी है। साथ ही गांवों के वर्षाजल को तालाबों और अन्य जल संरचनाओं के माध्यम से संरक्षित करना होगा। इससे न केवल गांवों में जल उपलब्धता बढ़ेगी, बल्कि नदी का प्राकृतिक प्रवाह भी मजबूत होगा।
उल्लेखनीय है कि लोनी नदी, टोंस नदी की एक महत्वपूर्ण सहायक नदी है। लगभग 32 किलोमीटर लंबी यह नदी शंकरगढ़ क्षेत्र की 15 ग्राम पंचायतों से होकर गुजरती है और स्थानीय लोगों की आजीविका, कृषि तथा जल आवश्यकताओं का प्रमुख आधार मानी जाती है।


