फिलिस्तीन : सांप्रदायिकता से बड़ा साम्राज्यवाद
पश्चिमी मीडिया ने लगातार उछाला है कि ईरान-इजरायल-अमेरिका के संघर्ष में मुस्लिम देशों का शिया-सुन्नी विभाजन भी अहम भूमिका अदा करता है, जबकि गहराई से देखें तो पूंजी और प्रभाव के सामने साम्प्रदायिकता का यह नजरिया बेकाम साबित होता है।…
इजरायल की उत्पत्ति : एक जटिल संघर्ष की शुरुआत
पश्चिम एशिया में जारी भीषण मारकाट का खलनायक और अमेरिका समेत तमाम खाड़ी के देशों को हांकने वाला इजरायल आखिर दूर-दराज के उस इलाके में पैदा कैसे हुआ? क्या जहां वह है, वह उसकी पारंपरिक ‘पितृ-भूमि’ है? क्या है, इजरायल…
युद्ध, टेक्नोलॉजी और लोकतंत्र
इंसान का आपस में साथ रह पाना कितना कठिन होता जा रहा है? क्या एक-दूसरे के बीच का फासला इतना गहरा हो गया है कि युद्ध के बिना इसे पाटा नहीं जा सकता? इसी मानवीय कमजोरी की पड़ताल करता विवेकानंद…
समाज : अमीर होते देश में आत्महत्या करते लोग
विचित्र विडंबना है कि जिस देश में दुनिया की तीसरी बडी अर्थव्यवस्था बनाने के जतन जारी हों, वहां आत्महत्याओं में लगातार बढ़ौतरी होती जाए। क्या खुद अपनी जान लेने के कठिन निजी फैसले में देश की सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक, राजनीतिक…
युद्ध : विनाश का वैश्विक व्यापार
दुश्मन देश को धूल चटा देने, नेस्तनाबूद कर देने के मंसूबे आखिर हमें कहां ले जाते हैं? कहीं ऐसा तो नहीं है कि पडौसी देशों के प्रति खुन्नस निकालने की यह ललक अमीर हथियार निर्माताओं की तिजोरियां भरने में लगी…
कर्ज से विकास : बदहाली की अर्थव्यवस्था
मौजूदा संसद के संभवत: आखिरी सत्र में पेश किए गए अंतरिम बजट ने और कुछ किया हो या नहीं, मौजूदा सरकार की संभावित वापसी पर उसकी भावी योजनाओं को उजागर जरूर कर दिया है। मसलन किसानों की आय दोगुनी करने…
Indian Railways : यात्रियों से रूठती रेल
आम लोगों के परिवहन का सर्वाधिक सुलभ और सस्ता साधन रेलगाडी अब धीरे-धीरे मंहगा, बेहद मंहगा होता जा रहा है। कहा जा रहा है कि अब आम जनता के लिए ‘जनरल कोच’ और खास लोगों के लिए मंहगी ‘एसी कोच’…
फसल बीमा : कंपनियों ने लूटे हजारों करोड़
प्राकृतिक और मानवीय त्रासदियों के कारण खेती में होने वाले नुकसान से निपटने के लिए सरकार ने बीमा-योजना बनाई है। कहा जा रहा है कि मामूली प्रीमियम देकर किसान आपदाओं से खुद को सुरक्षित कर सकता है, लेकिन देशी-विदेशी कंपनियों…
गांधी के सामने फिर से सावरकर
‘गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति’ की मासिक पत्रिका ‘अंतिम जन’ के ‘वीर सावरकर अंक’ ने एक बार फिर गांधी और सावरकर के विरोधाभासों को उजागर कर दिया है। गांधी जिन मूल्यों, विचारों को लेकर जीवनभर चले थे, सावरकर उसके ठीक…
लोकतंत्र की डूबती लुटिया
दुनिया के अधिकांश देशों में राज-काज चलाने के लिए सर्वाधिक लोकप्रिय और सफल प्रणाली लोकतंत्र मानी जाती है, लेकिन क्या वह अपने घोषित उद्देश्यों के मुताबिक अमल में लाई जा रही है? क्या हमारे देश में लोकतांत्रिक प्रणाली कारगर साबित…









