गांधी के तरीके से कसी जा सकती है, राज्य और पूंजी पर नकेल

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विवेकानंद माथने

पूंजी और राज्य की आधुनिक अवधारणा एक अर्थ में हिंसक अवधारणा साबित हुई है। उसने एक तरफ, अमीरी-गरीबी के बीच गहरी, अश्लील खाई पैदा की है और दूसरी तरफ, राज्य को जरूरत से ज्यादा शक्ति-सम्पन्न बनाया है। आज यदि महात्मा गांधी होते तो वे इस पर क्या कहते? प्रस्तुत है, इस विषय पर संपूर्ण गांधी वाङ्मय से संकलित महात्मा गांधी के विचार।

‘’ईश्वर सर्वशक्तिमान है। उसे कोई चीज जमा करके रखने की जरुरत नहीं। वह हर दिन सृष्टि करता है। इसलिये मनुष्य को भी सिद्धांतत: आज की ही फिक्र करनी चाहिये और कल की चिंता में चीजें जमा करके नहीं रखनी चाहिये। अगर लोग आमतौर पर इस सच्चाई को अपने जीवन में उतारें तो वह कानून बन जायेगी और ट्रस्टीशिप एक कानूनी संस्था हो जायेगी। मैं चाहता हूं कि यह चीज दुनिया को हिंदुस्थान की एक देन बन जाये। फिर कोई शोषण नहीं होगा।

बरसों पहले मेरा जो विश्वास था वही आज भी है कि हर चीज ईश्वर की है और ईश्वर के द्वारा मिलती है। इसलिये वह उसकी पूरी प्रजा के लिये है, किसी एक खास इंसान के लिये नहीं। जब इंसान के पास उसके मुनासिब हिस्से से ज्यादा होता है तो वह उस हिस्से का प्रजा के लिये ट्रस्टी बन जाता है।

मैं अर्थशास्त्र और नीतिशास्त्र के बीच कोई सुस्पष्ट या अन्य प्रकार का भेद नहीं करता। वह अर्थशास्त्र अनैतिक और इसलिये पाप-युक्त है जो किसी व्यक्ति अथवा राष्ट्र के नैतिक कल्याण को क्षति पहुंचाता हो। तद्नुसार वह अर्थशास्त्र पाप-युक्त है जो यह अनुमति देता है कि एक देश दूसरे देश को लूट ले। शोषित श्रम द्वारा तैयार की गई वस्तुओं को खरीदना और उनका इस्तेमाल करना पाप-युक्त है।

जो अर्थशास्त्र नैतिक मूल्यों की अनदेखी अथवा उपेक्षा करता है, वह झूठा है। अर्थशास्त्र के क्षेत्र में अहिंसा के नियम की प्रयुक्ति का अर्थ कम-से-कम इतना तो है ही कि अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्य में नैतिक मूल्यों को एक विचारणीय तत्व माना जाये।

किसी ने यह कभी भी नहीं कहा है कि मनुष्य को पीसने वाली गरीबी से नैतिक अधःपतन के सिवा दूसरा कुछ घटित हो सकता है। हर मनुष्य को जिंदा रहने का हक है, इसलिए खुद का पोषण करने, जरुरत-भर वस्त्र तथा मकान प्राप्त करने का भी हक है। इस सादी सी बात के लिये अर्थशास्त्रियों की या कानूनों की मदद की कोई जरुरत नहीं है।

आर्थिक समानता अहिंसक स्वाधीनता की असली कुंजी है। आर्थिक समानता के लिये कार्य करने का मतलब है, पूंजी और श्रम के सनातन संघर्ष को मिटा देना। इसका अर्थ है, एक ओर तो उन मुठ्ठी भर धनवानों के स्तर को नीचा करना जिनके हाथ में राष्ट्र की अधिकांश संपदा केंद्रित है और दूसरी ओर आधा-पेट भोजन पर जीवन निर्वाह करने वाले लाखों करोडों लोगों के स्तर को ऊपर उठाना।

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जब तक अमीरों और भूखे पेट रहने को मजबूर करोडों गरीब लोगों के बीच का भयंकर अंतर कायम है तब तक अहिंसक सरकार बनाना असंभव है। नई दिल्ली के प्रासादों और उनके निकट ही खडी गरीब मजदूरों की टूटी-फूटी झोपडियों के बीच जो भारी अंतर है वह स्वतंत्र भारत में एक दिन भी कायम नहीं रह सकेगा, क्योंकि उस भारत में तो जितनी सत्ता देश के अमीर-से-अमीर लोगों के पास होगी उतनी ही गरीबों के पास भी होगी। यदि स्वेच्छा से संपत्ति का त्याग नहीं किया जाता और जो सत्ता संपत्ति से प्राप्त होती है उसे खुशी-खुशी नहीं छोडा जाता तथा संपत्ति का उपयोग मिलजुलकर, सबकी भलाई के लिये नहीं किया जाता तो निश्चय ही इस देश में खूनी क्रांति आयेगी।

मेरे विचार में भारत और भारत ही क्यों, सारी दुनिया का आर्थिक गठन ऐसा होना चाहिये कि उसमें किसी को रोटी-कपडे की तंगी न रहे। दूसरे शब्दों में, प्रत्येक व्यक्ति को जीवन-निर्वाह के लिये पर्याप्त काम उपलब्ध होना चाहिये। प्रत्येक व्यक्ति को संतुलित भोजन, रहने को ठीक-ठाक मकान, अपने बच्चों की शिक्षा के लिये सुविधाऐं और पर्याप्त चिकित्सा-व्यवस्था उपलब्ध होनी चाहिये।

मै अहिंसक तरीके और घृणा के विरुद्ध प्रेम की शक्ति के प्रयोग द्वारा लोगों को अपने दृष्टिकोण से सहमत करके आर्थिक समानता स्थापित करुंगा। मैं इस बात की प्रतीक्षा नहीं करुंगा कि पहले सब लोग मेरे दृष्टिकोण के समर्थक बन जायें, बल्कि मैं तो सीधे अपने साथ ही इसकी शुरुआत कर दूंगा।

मै चाहता हूं कि वे लोग अपने लालच और स्वामित्व की भावना से उपर उठें और अपनी दौलत के बावजूद उस स्तर पर उतर आएं जिस पर पसीने की कमाई से पेट भरने वाला श्रमिक जीवन निर्वाह करता है। श्रमिक को यह समझना होगा कि धनवान व्यक्ति अपनी संपत्ति का स्वामी उससे भी कम है जितना कि वह अपनी संपत्ति अर्थात काम करने की शक्ति (श्रम-शक्ति) का स्वामी है।

मैं उन व्यक्तियों को जो आज अपने आपको मालिक समझ रहे हैं, न्यासी के रुप में काम करने के लिये आमंत्रित कर रहा हूं अर्थात यह आग्रह कर रहा हूं कि वे स्वयं को अपने अधिकार की बदौलत मालिक न समझें, बल्कि उनके अधिकार की बदौलत मालिक समझें जिनका उन्होंने शोषण किया है।

अगर मुझे सत्ता प्राप्त होगी तो मैं पूंजीवाद को तो अवश्य खत्म कर दूंगा, लेकिन पूंजी को नहीं। जाहिर है, मैं पूंजीपतियों को भी खत्म नहीं करुंगा। मेरा निश्चित मत है कि पूंजी और श्रम में सामंजस्य स्थापित करना बिल्कुल संभव है।

अहिंसक पद्धति में हम पूंजीपति को नष्ट करने का प्रयास नहीं करते, बल्कि पूंजीवाद को समाप्त करने का प्रयास करते हैं। हम पूंजीपति से आग्रह करते हैं कि वह स्वयं को उन लोगों का न्यासी समझे जिनके ऊपर वह अपनी पूंजी के निर्माण, उसकी रक्षा और उसके संवर्धन के लिये निर्भर है।

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श्रमिक को भी उसके हृदय परिवर्तन के लिये प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। यदि पूंजी में शक्ति है, तो श्रम में भी है। शक्ति का प्रयोग विनाश के लिये भी किया जा सकता है और सृजन के लिये भी। दोनों एक-दूसरे पर निर्भर हैं। अपनी शक्ति का अहसास होते ही श्रमिक पूंजीपति का गुलाम होने के स्थान पर उसका सहभागीदार होने की स्थिति में आ जाता है।

मैं वर्गसंघर्ष को बल नहीं देना चाहता। मालिकों को ट्रस्टी बन जाना चाहिये। हो सकता है फिर भी वे मालिक ही बने रहना पसंद करें। उन हालातों में उनका विरोध करना और उनसे लडना पडेगा। तब हमारा हथियार सत्याग्रह होगा। हम वर्गहीन समाज चाहते हों, तब भी हमें गृहयुद्ध में नहीं फंसना चाहिये। यह भरोसा रखना चाहिये कि अहिंसा वर्गहीन समाज ले आयेगी।

वर्ग संघर्ष भारत की मूल प्रकृति के लिये विजातीय तत्व है और वह सबके लिये मूल अधिकार और सबके लिये समान न्याय के व्यापक आधार पर, एक प्रकार का साम्यवाद विकसित कर सकता है। मेरी कल्पना का रामराज्य राजा और रंक को एक से अधिकार देता है। आप यह यकीन कर सकते हैं कि मैं अपनी पूरी शक्ति और सारा प्रभाव वर्ग संघर्ष को रोकने में लगाऊंगा।

आप कह सकते हैं कि न्यासी पद एक कल्पना है। लेकिन यदि लोग उस पर बराबर विचार करें और उसके अनुरुप आचरण करने की कोशिश करें तो धरती पर जीवन का नियमन आज प्रेम के द्वारा जितना कुछ होता है, उससे कहीं ज्यादा अंश में होगा। पूर्ण न्यासीवाद ‘यूक्लिड’ की एक बिंदु की परिभाषा की भांति एक काल्पनिक वस्तु है और उतनी ही अप्राप्य है। लेकिन अगर हम कोशिश करें तो उसके जरिये पृथ्वी पर किसी अन्य तरीके की अपेक्षा इस तरीके से समानता स्थापित करने की दिशा में ज्यादा दूर जा सकेंगे।

व्यक्तिगत रुप से मैं जो पसंद करुंगा, वह राज्य के हाथ में सत्ता का केंद्रीकरण नहीं, बल्कि न्यासीवाद का व्यापकीकरण होगा। कारण यह कि मेरी राय में, राज्य की हिंसा के मुकाबले निजी स्वामित्व की हिंसा कम हानिप्रद होती है। तथापि, यदि टाली न जा सकती हो तो मैं न्यूनतम राज्य स्वामित्व का समर्थन करुंगा।

मैं राज्य की बढती हुई शक्ति को भय के साथ देखता हूं। क्योंकि वह प्रत्यक्षत: शोषण को कम करते हुये भी व्यक्तिगत प्रयत्नों को नष्ट करके मानवजाति को ज्यादा-से-ज्यादा नुकसान पहुंचाती है। यह व्यक्तिगत प्रयत्न ही मानव जाति के प्रयत्नों की प्रगति की जड़ या बुनियाद है। हम ऐसे कई मामलों से परिचित हैं जब मनुष्य ने न्यासीवाद को स्वीकार किया है, लेकिन एक भी ऐसा उदाहरण हमारे सामने नहीं है जिसमें राज्य वस्तुत: गरीबों के लिये जिया हो।

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राष्ट्र संपत्ति को व्यक्तियों को सुपुर्द किये बिना अपना स्वामित्व रख ही नहीं सकता। वह केवल उसके न्यायोचित और पक्षपात रहित उपयोग की गारंटी करता है और उन सभी दुरुपयोगों को रोकता है जो संभाव्य हैं। अपनी संपत्ति को रैयत की भलाई के लिये अपने पास रखने में आपको कोई आपत्ति हो सकती है, मैं ऐसा नहीं सोचता। रैयत केवल शांति और स्वतंत्रता से रहना चाहती है और इससे बडी उसकी कोई महत्वाकांक्षा नहीं है। यदि संपत्ति का उसके लिये उपयोग करते हैं तो उस पर आपके अधिकार से उसे कोई ईर्ष्या नहीं होगी।

राज्य का अधिकार निजी स्वामित्व से बेहतर है, लेकिन वह भी हिंसा के आधार पर आपत्तिजनक है। यह मेरा दृढ विश्वास है कि राज्य पूंजीवाद को हिंसात्मक तरीके से दबाता है तो वह स्वयं हिंसा के चंगुल में फंस जायेगा और अहिंसा का विकास करने में सर्वथा विफल रहेगा। राज्य हिंसा का सघन और संगठित रुप में प्रतिनिधित्व करता है। व्यक्ति के पास आत्मा होती है, लेकिन राज्य एक आत्माहीन यंत्र है, इसलिये उस हिंसा से उसे कभी मुक्त नहीं किया जा सकता जिस पर कि उसका अस्तित्व ही निर्भर करता है। इसीलिये मैं न्यासीवाद के सिद्धांत को ज्यादा पसंद करता हूं।

राज्य वस्तुत: उन चीजों को अपने हाथ में ले लेगा और मैं समझता हूं कि यदि वह न्यूनतम हिंसा का इस्तेमाल करता है तो उसे ठीक समझा जायेगा। लेकिन यह भय तो बराबर है ही कि राज्य अपने से भिन्न मत रखने वालों के विरुद्ध बहुत अधिक हिंसा का प्रयोग करे। यदि संबधित व्यक्ति न्यासियों की भांति व्यवहार करें तो मैं वस्तुत: बहुत प्रसन्न होऊंगा; लेकिन यदि वे इसमें विफल हों तो वैसी दशा में मेरा विश्वास है कि हमें राज्य की सहाय्यता से न्यूनतम हिंसा के जरिये उन्हें उनकी संपत्ति से वंचित करना होगा। प्रत्येक निहित स्वार्थ की जांच होनी चाहिये और आवश्यकतानुसार मुआवजे या बिना मुआवजे के संपत्ति को जब्त करने का आदेश दिया जाना चाहिये।

यदि भारत के पूंजीपति अपना सारा कौशल धन संपत्ति खडी करने में न लगाकर उसे परमार्थ की भावना से जनता की सेवा में ही लगाकर, जनकल्याण के संरक्षक बनकर उस विपत्ति को टालने की कोशिश नहीं करेंगे तो इसका अंत यही होगा कि या तो वे जनता को नष्ट कर डालेंगे या जनता उनको नष्ट कर देगी।’’ (सप्रेस) 

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