युद्ध, टेक्नोलॉजी और लोकतंत्र

विवेकानंद माथने

इंसान का आपस में साथ रह पाना कितना कठिन होता जा रहा है? क्या एक-दूसरे के बीच का फासला इतना गहरा हो गया है कि युद्ध के बिना इसे पाटा नहीं जा सकता? इसी मानवीय कमजोरी की पड़ताल करता विवेकानंद माथने का लेख।

मानव इतिहास में शोषण की शुरुआत उस सोच से हुई जब किसी ने यह दावा किया कि ‘ईश्वर ने मुझे विशेष गुणों के साथ भेजा है और तुम्हें मेरी सेवा के लिए पैदा किया है।’ स्वयं को श्रेष्ठ मानने की इसी मानसिकता ने गुलामी की नींव रखी है। जो लोग खुद को दैवीय शक्ति का अवतार मानने लगे, उन्होंने दूसरों को अपनी सेवा के लिए गुलाम बना लिया। इसी श्रेष्ठता-बोध ने धर्म, जाति, वर्ण, रंग और देश के आधार पर समाज में ऊंच-नीच की गहरी खाइयां बनाईं। राजतंत्र में यह सोच ‘दैवीय अधिकार’ के रूप में सत्ता का औजार बनी।

शासन और विलासिता भरा जीवन जीने के लिए गुलामों और प्राकृतिक संसाधनों की जरूरत थी। पुराने दौर में गुलामों को जंजीरों में बांधकर काम करवाया जाता था, कुछ को हंटरदार बनाकर दूसरों को दंडित करने की जिम्मेदारी दी जाती थी। शासकों के मनोरंजन के लिए बंद पिंजरे में गुलामों को लड़वाया जाता था, जब तक की एक की मौत ना हो जाए। इस अमानवीय व्यवस्था को बनाए रखने के लिए सैन्य शक्ति और विस्तारवाद आवश्यक हो गया। इसी ने युद्धों को जन्म दिया।

राजतंत्र के स्थान पर लोकतंत्र आया, औद्योगिक क्रांति हुई, टेक्नोलॉजी विकसित हुई, लेकिन गुलामी की व्यवस्था नहीं बदली, बल्कि और जटिल बन गई। आज वही व्यवस्था बदले रूप में मौजूद है। लोकतंत्र के नाम पर अंतरराष्ट्रीय समझौतों और व्यापारिक नीतियों के ज़रिये शोषण की नई व्यवस्था बनाई गई। कर्ज, बेरोजगारी और गरीबी की बेड़ियों में जकड़े लोग ‘आज़ाद’ दिखते हैं, लेकिन वे भी एक अमानवीय व्यवस्था का हिस्सा हैं। भौतिकवाद में उलझे दुनिया के बुद्धिजीवी, कॉर्पोरेट और प्रशासन का हिस्सा बनकर अब शोषणकारी व्यवस्था के नये हंटरदार बने हैं।

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टेक्नोलॉजी ने सुविधाएं दीं, साथ में विनाश के उपकरण भी दिए। उसने परमाणु बम, ड्रोन और साइबर हथियार दिए जो कुछ ही पलों में सभ्यता को समाप्त कर सकते हैं। उसने विलासिता की लालसा बढ़ाकर संसाधनों पर नियंत्रण के लिए युद्ध और हिंसा को प्रेरित किया है। लूट, गुलामी, शोषण को नया रूप दिया है। इस तकनीकी हिंसा ने मानवता को विनाश के कगार पर ला खड़ा किया है।

अब डिजिटल निगरानी, डेटा शोषण और मीडिया प्रोपेगेंडा के ज़रिये लोगों के विचारों और जीवनशैली पर नियंत्रण कायम किया जा रहा है। आपकी हर गतिविधि, संपत्ति, व्यवहार, पसंद, भावना निगरानी के दायरे में है। यह एक ऐसी जेल है जिसमें दिखती तो आज़ादी है, लेकिन असल में चारों ओर अदृश्य बेड़ियां हैं। यह एक सूक्ष्म, लेकिन व्यापक गुलामी है, जिसे हम ‘डिजिटल गुलामी’ कह सकते हैं। जब तक आप सत्ता के लिए निष्क्रिय और उपयोगी बने रहते हैं, आपको जीने दिया जाता है, लेकिन जैसे ही आप अन्याय के विरुद्ध खड़े होते हैं, आपका जीवन संकट में पड़ सकता है।

तंत्र बदला, शासक बदले, शोषण के तरीके भी बदले, लेकिन गुलामी की संरचना अब भी जस-की-तस बनी हुई है। शक्तिशाली देशों ने संगठित होकर दुनिया को अपने हितों के अनुसार ढालने की रणनीति बना ली। वे भी अपने व्यापारिक हितों, संसाधनों के लिए युद्धों को थोप रहे हैं। राजतंत्र में जैसे सनकी राजा, वैसे ही लोकतंत्र में सत्ताधीश राष्ट्रवाद के नाम पर जनता में युद्धोन्माद भर देते हैं।

आक्रांताओं से देश की सुरक्षा के लिए कमजोर देशों को भी सैन्य शक्ति बढ़ानी पड़ती है। मजबूरी में उन्हें अपनी बुनियादी जरुरतों को छोड़कर सैन्य बजट बढ़ाना पड़ता है जो जनता के तबाही का कारण बन जाता है। इसका लाभ भी उन शक्तिशाली राष्ट्रों को मिलता है जो नव-उपनिवेशवाद के ज़रिये आधुनिक गुलामी कायम रखना चाहते हैं।

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‘हिंसा से शांति’ का दावा झूठा है। वह हिंसा को प्रतिष्ठित करता है। इतिहास साबित करता है कि दमन केवल विनाश लाता है। यह विचारधारा मानव इतिहास में युद्धों, साम्राज्यवाद और सत्ता के दमन को वैधता देती रही है। पश्चिमी लोकतंत्रों ने भले ही खुद को शांति और मानवाधिकारों का पैरोकार बताया है, लेकिन उनके युद्ध सैन्य शक्ति, रणनीतिक हितों और आर्थिक लाभों से प्रेरित थे। इस तरह उनका ‘महाशक्ति’ बनना, दरअसल अधिक हिंसक और शोषणकारी बन जाना था। महाशक्ति होने का अर्थ दुनिया के शोषण की होड़ में शामिल होना है और जब हम स्वयं इस होड़ में हैं, तो शांति का दावा खोखला हो जाता है।

आज जब दुनिया हिंसा और लालच के घेरे में है, तब भारत को चाहिए कि वह ‘सक्रिय तटस्थता’ के जरिए अन्याय के खिलाफ आवाज़ बने। ‘सक्रिय तटस्थता’ का अर्थ न्याय के प्रति उदासीनता नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध न्याय के पक्ष में खड़ा होना है। दुर्भाग्य से, भारत सरकार हिंसा पर विश्वास करती है और ‘पड़ोसी को घुसकर मारो’ जैसी भाषा अपनाती है। उसकी विदेश नीति व्यापारिक हितों पर टिकी है। जिससे वह न अहिंसा का नैतिक साहस जुटा पाती है, न ही न्याय का साथ दे पाती है।

हमने संवेदना खो दी है। सत्य, प्रेम, करुणा के लिए कोई जगह नहीं है। आज विजेता देशों के लोग अपने विरोधियों का खून बहते देखकर खुशियां मनाते हैं। युद्ध उनके लिए मनोरंजन बन गया है। मीडिया चैनलों पर ऐसे गंभीर विषयों पर भी हंसी-ठहाकों के साथ चर्चाएं होती हैं। मनुष्य स्वभावतः हिंसक नहीं होता। वह न्याय चाहता है, हिंसा नहीं, लेकिन जब उसे सिखाया जाता है कि ‘न्याय केवल हिंसा से मिलेगा,’ तब वह हिंसा को स्वीकार करता है। यही सोच एक शोषणकारी व्यवस्था को गिराकर, दूसरी शोषणकारी व्यवस्था खड़ी कर देती है, जबकि सच्चा न्याय केवल अहिंसा से संभव है। अहिंसा का विचार अहिंसक समाज रचना की ओर ले जाता है।

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भारत को चाहिए था कि वह बुद्ध, महावीर और गांधी की अहिंसक विरासत पर चलते हुए न्यायप्रिय, तटस्थ और नैतिक शक्ति बनता। जिस साम्राज्यवाद के खिलाफ अहिंसक संघर्ष से भारत ने आज़ादी पाई, उस विचार को आगे बढ़ाता। इससे उसे युद्ध रोकने और न्याय के पक्ष में खड़े होने का नैतिक अधिकार मिलता, लेकिन उसने इस ऐतिहासिक भूमिका को व्यापारिक हितों की राजनीति में खो दिया।

सच्चा लोकतंत्र वही है जो कमजोरों की आवाज़ बने। जो सिद्धांतों पर अडिग रहकर निर्णय करे। दुनिया को हथियारों की होड़ से मुक्त करने, सैन्य बजट कम करने और शिक्षा, स्वास्थ्य व गरीबी-उन्मूलन में निवेश करने के लिए प्रेरित करे। शोषण का चक्र तोड़ने का मार्ग सिर्फ अहिंसा है। अहिंसा का अर्थ कायरता नहीं है, बल्कि अन्याय के खिलाफ डटकर सामना करना है। यह सक्रिय प्रतिरोध है, जो सबसे प्रभावी रूप से शोषण की व्यवस्था को चुनौती देता है। जब तक मनुष्य हिंसा को समाधान मानता रहेगा, तब तक गुलामी जारी रहेगी। शांति और अहिंसा की राह पर चलना ही असली क्रांति है। (सप्रेस)

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