सुप्रीम कोर्ट : धर्म और जाति के बीच फँसा न्याय

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आम धारणा है कि अनुसूचित जातियां और जनजातियां कानून, समाज और सरकार की नजर में कमोबेश एक नहीं तो आसपास ही हैं। इसी के चलते बरसों ‘अनुसूचित जाति, जनजाति आयोग’ और उनसे जुड़े कानून एक ही माने, बनाए जाते थे। सुप्रीमकोर्ट ने हाल में एक ऐसा फैसला सुनाया है जिससे यह मान्यता टूटती दिखती है। क्या है, यह फैसला?


सुप्रीम कोर्ट ने एक आपराधिक अपील पर निर्णय देते हुए धर्मान्तरण और अनुसूचित जातियों की संवैधानिक स्थिति से जुड़ा एक ऐसा फैसला दिया है जिसके दूरगामी सामाजिक और कानूनी प्रभाव होंगे। ‘चिन्तदा आनन्द बनाम आन्ध्रप्रदेश राज्य’ मामले में अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई व्यक्ति अनुसूचित जाति में जन्म लेने के बाद सार्वजनिक रूप से हिन्दू, सिख या बौद्ध धर्म के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म का पालन करता है तो वह अनुसूचित जाति के संवैधानिक संरक्षणों का दावा नहीं कर सकेगा।

यह फैसला केवल एक आपराधिक मामले का निपटारा नहीं है। यह भारतीय समाज में जाति, धर्म और संवैधानिक अधिकारों के बीच मौजूद जटिल और अकसर असहज रिश्ते को फिर से बहस के केन्द्र में ले आता है। मामले के तथ्य अपेक्षाकृत सरल हैं। याचिकाकर्ता चिन्तदा आनन्द का जन्म माडिगा समुदाय में हुआ था, जो ‘संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश 1950’ के तहत अनुसूचित जाति की सूची में शामिल है। पिछले लगभग एक दशक से वह आन्ध्रप्रदेश के गुंटूर जिले के अपने गाँव में ईसाई पास्टर के रूप में धार्मिक प्रार्थनाएँ कर रहा था।

जनवरी 2021 में दो घटनाओं के बाद पुलिस ने शिकायत दर्ज की, जिनमें मारपीट, गाली-गलौज और धमकी देने के आरोप थे। इन घटनाओं के आधार पर अभियुक्तों के विरुद्ध ‘अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) कानून 1989’ तथा ‘भारतीय दण्ड संहिता’ की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया। जब यह मामला आन्ध्रप्रदेश हाईकोर्ट पहुँचा, तो प्रतिवादियों ने एक अलग ही कानूनी प्रश्न खड़ा कर दिया। उनका तर्क था कि याचिकाकर्ता ने ईसाई धर्म अपना लिया है और वह सार्वजनिक रूप से ‘पास्टर’ के रूप में कार्य कर रहा है। इसलिए वह अब अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता और परिणामस्वरूप ‘एससी/एसटी एक्ट’ का संरक्षण भी उस पर लागू नहीं होगा।

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हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार किया और सुप्रीमकोर्ट ने भी उस निर्णय को बरकरार रखा। इस निर्णय की संवैधानिक पृष्ठभूमि संविधान के अनुच्छेद 341 से जुड़ी है, जिसके तहत राष्ट्रपति विभिन्न राज्यों के लिए अनुसूचित जातियों की सूची निर्धारित करते हैं। 1950 के राष्ट्रपति आदेश की धारा – 3 के अनुसार अनुसूचित जाति की मान्यता उन लोगों तक सीमित है जो हिन्दू, सिख या बौद्ध धर्म का पालन करते हैं। यदि कोई व्यक्ति ईसाई, मुस्लिम या किसी अन्य धर्म को सार्वजनिक रूप से अपनाता है तो वह इस सूची से बाहर माना जाएगा।

याचिकाकर्ता की ओर से यह तर्क दिया गया कि जाति जन्म से निर्धारित सामाजिक पहचान है, जिसे धर्म परिवर्तन मिटा नहीं सकता। आन्ध्रप्रदेश सरकार के 1977 के एक आदेश का हवाला भी दिया गया, जिसमें कहा गया था कि धर्म परिवर्तन के कारण सामाजिक लाभ समाप्त नहीं होने चाहिए, लेकिन सुप्रीमकोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि कोई भी राज्य सरकार राष्ट्रपति के संवैधानिक आदेश को बदल नहीं सकती। इस प्रकार यदि कोई व्यक्ति सार्वजनिक रूप से धर्म परिवर्तन करता है, तो अनुसूचित जाति के लिए उपलब्ध विशेष कानूनी संरक्षण उस पर लागू नहीं होंगे।

हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जनजातियों के मामले में अलग दृष्टिकोण अपनाया। अदालत के अनुसार अनुसूचित जनजातियों की पहचान धर्म से नहीं, बल्कि समुदाय, संस्कृति, भाषा, रीति-रिवाज़ और सामाजिक संगठन जैसे तत्वों से निर्धारित होती है। इसलिए धर्म परिवर्तन अपने आप किसी व्यक्ति के जनजातीय दर्जे को समाप्त नहीं करता। इस सन्दर्भ में न्यायालय ने ‘पंजाबराव बनाम डी.पी. मेश्राम (1964)’ का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि ‘धर्म का पालन’ केवल निजी आस्था नहीं, बल्कि सार्वजनिक रूप से उस धर्म की अभिव्यक्ति और आचरण है। इसी तरह ‘केरल राज्य बनाम चन्द्रमोहन (2004)’ में न्यायालय ने जनजातीय पहचान के निर्धारण में भाषा, रीति-रिवाज़, सामाजिक संरचना और सामुदायिक स्वीकृति को निर्णायक माना था।

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कानूनी तर्क यहाँ समाप्त हो जाते हैं, लेकिन सामाजिक प्रश्न यहीं से शुरू होते हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यह है – क्या धर्म बदलने से जाति समाप्त हो जाती है? भीमराव आम्बेडकर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘एनहिलिएशन ऑफ कास्ट’ में स्पष्ट लिखा है कि जाति केवल धार्मिक पहचान नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक संरचना है। उनके अनुसार ‘जाति एक ऐसी सामाजिक संस्था है जो व्यक्ति के धर्म बदल लेने मात्र से समाप्त नहीं होती।’ यही कारण था कि 1956 में बौद्ध धर्म अपनाते समय भी आम्बेडकर ने यह चेतावनी दी थी कि केवल धार्मिक परिवर्तन सामाजिक मुक्ति की गारंटी नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के व्यावहारिक प्रभाव भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। यदि कोई व्यक्ति अनुसूचित जाति में जन्म लेने के बाद सार्वजनिक रूप से ईसाई, मुस्लिम या किसी अन्य धर्म को अपनाता है, तो उसे ‘एससी/एसटी अत्याचार निवारण कानून’ के तहत मिलने वाली विशेष सुरक्षा नहीं मिलेगी। शिक्षा और सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जाति के लिए निर्धारित आरक्षण का दावा भी समाप्त हो जाएगा। कई सरकारी योजनाओं और सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों का लाभ भी उनसे छिन सकता है। दूसरी ओर, अनुसूचित जनजातियों के मामले में धर्म परिवर्तन अपने आप दर्जा समाप्त नहीं करेगा। वहाँ यह देखा जाएगा कि व्यक्ति की जनजातीय सामाजिक पहचान और सामुदायिक स्वीकृति बनी हुई है या नहीं।

इस निर्णय के बाद प्रशासनिक और सामाजिक स्तर पर कई नई परिस्थितियाँ पैदा हो सकती हैं। शिक्षा और नौकरियों में जाति-प्रमाणपत्रों की जाँच अधिक कठोर होगी। धर्म परिवर्तन के बाद प्राप्त आरक्षण लाभों को चुनौती दी जा सकती है। साथ ही, प्रशासनिक तथा न्यायिक प्रक्रियाएँ पहले से अधिक जटिल और लम्बी हो सकती हैं, लेकिन इससे भी बड़ा प्रश्न सामाजिक है। क्या अब लोग धर्म परिवर्तन का निर्णय लेते समय सामाजिक-आर्थिक लाभ और हानि का गणित अधिक सावधानी से करेंगे? सम्भवतः हाँ। विशेषकर वे लोग जो आरक्षण और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर निर्भर हैं, उनके लिए यह निर्णय एक कठिन दुविधा पैदा कर सकता है।

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भारतीय संविधान के निर्माताओं ने लोकतंत्र की बुनियाद समानता, स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय पर रखी थी। संविधान के अनुच्छेद 14 और 25 का उद्देश्य यही था कि व्यक्ति को समान अवसर और धार्मिक स्वतंत्रता दोनों मिल सकें, लेकिन आज जो प्रश्न हमारे सामने खड़ा है, वह इससे कहीं अधिक जटिल है – क्या सामाजिक उत्पीड़न का अनुभव धर्म से निर्धारित होता है, या समाज में व्यक्ति की वास्तविक स्थिति से? यह प्रश्न केवल कानून का नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की नैतिक दिशा का है। सुप्रीमकोर्ट का यह निर्णय हमें उसी मूल सवाल की ओर लौटने को मजबूर करता है जिसे भीमराव आम्बेडकर ने दशकों पहले उठाया था – क्या भारत सचमुच जाति से मुक्त समाज बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है या हम अब भी धर्म और जाति की उलझनों में फँसे हुए हैं? (सप्रेस)

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