एक तरह से देखें तो गांधी का समूचा जीवन मतभेदों से निपटते ही बीता, भले ही वे मतभेद संगी-साथियों, परिवार और धुर विरोधी विचारों के हों या फिर अपने हित साधने में लगी देशी-विदेशी सत्ताओं के। इन मतभेदों से निपटने…
पत्रकार अरविन्द मोहन के मुताबिक अभी कुछ महीनों पहले तक जिन महिलाओं को अज्ञात कुल-शील की ‘नॉन-एन्टिटी’ माना जाता था, ‘शाहीन बाग’ ने उन्हें हमारे लोकतंत्र की सर्वाधिक समझदार, संघर्षशील, मुखर संवैधानिक इकाई में तब्दील कर दिया है। किसी भी…
भाषा की समाप्ति को डायनासोर की तरह विलुप्त हो जाने जैसी सहज, प्राकृतिक घटना मानने वाले वरिष्ठ हिन्दी-भाषियों के इस जमाने में भाषा की मौजूदा बदहाली कैसे बताई, समझाई जा सकती है? आसपास की सैकड़ों सक्रिय बोलियों और इतर भाषाओं…
पर्यावरण के संकट, जल-जंगल-जमीन के बाद अब मानवीय जीवन को अपनी गिरफ्त में लेने की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। ऐसे में ‘धरती रक्षा दशक’ जैसे आपातकालीन उपायों के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है। जनवरी 2020 की पहली…
जाति, भाषा, लिंग, क्षेत्र आदि की कठोर मानी जाने वाली वर्जनाओं को तोड़कर देशभर को आंदोलन के लिए मजबूर करने वाला ‘नागरिकता संशोधन अधिनियम’ (सीएए) और ‘राष्ट्रीय नागरिकता पंजी’ (एनआरसी) आखिर क्या करने वाले हैं? क्या ‘राष्ट्रीय जनसंख्या पंजी’ (एनपीआर)…
सर्वाधिक खतरे उठाते हुए न्यूनतम संसाधनों में पत्रकारिता करने वाले हमारे कस्बाई, ग्रामीण पत्रकारों की हालत किसी से छिपी नहीं है। कई बार सत्ता और सेठों की खबर देते, लेते हुए अपनी जान तक की बाजी लगाने वाले ऐसे पत्रकारों…
बाजार और उसके लिए विपुल उत्पादन के हल्ले में हमारी खेती धीरे-धीरे अपनी उत्पादकता और गुणवत्ता खोती जा रही है। अब ना तो रासायनिक खाद, दवाओं, कीटनाशकों के दुष्प्रभावों से मुक्त फसलें बची हैं और ना ही उसे पैदा करने…
लेखक जार्ज ऑरवेल ने अपने उपन्यास ‘1984’ में समाज पर नजर रखने की जिस तकनीक का जिक्र किया है, आज उससे कई गुना शक्तिशाली, प्रभावी और व्यापक तकनीक की मार्फत सत्ता और सेठ हमारे आम जीवन पर नियंत्रण करने की…
मध्यप्रदेश में आदिवासी बहुल अलीराजपुर जिले में नर्मदा-तट के गांव ककराना को भी, आसपास के कई गांवों की तरह, सरदार सरोवर परियोजना की डूब का सामना करना पडा था, लेकिन इलाके में सक्रिय ‘खेडूत मजदूर चेतना संगठ’ से जुडे कुछ…
जाडा आते-आते देश की राजधानी और उससे सटे इलाके पराली जलाए जाने से पैदा होते धुंए की तकलीफों से दो-चार होने लगते हैं। जमीन को सांस तक नहीं लेने देती आधुनिक ताबड-तोड़ खेती रबी फसलों की कटाई के तुरंत बाद…