नई राजनीति रचता, ‘शाहीन-बाग’ का संघर्ष

 बेलू जोर्ज

पत्रकार अरविन्‍द मोहन के मुताबिक अभी कुछ महीनों पहले तक जिन महिलाओं को अज्ञात कुल-शील की ‘नॉन-एन्टिटी’ माना जाता था, ‘शाहीन बाग’ ने उन्‍हें हमारे लोकतंत्र की सर्वाधिक समझदार, संघर्षशील, मुखर संवैधानिक इकाई में तब्‍दील कर दिया है। किसी भी लोकतांत्रिक ढांचे में जिस तरह के नागरिक की हम कल्‍पना करते हैं, ‘शाहीन बाग’ में बैठी महिलाओं ने उसे वास्‍तविक बना दिया है।

 यह आम धारणा है कि नारीवादी सोच के केंद्र में सिर्फ औरतें रहती हैं, परन्तु नारीवादी विचारधारा यानि फेमिनिज्म़ यह मानता है कि मुस्लिम-महिला, दलित-महिला, अश्वेत-महिला की पहचानों में सिर्फ महिलाएं नहीं हैं बल्कि वह व्यक्ति भी है जो अपनी विशेष पहचानों और परिस्थितियों के दायरों में सामाजिक और राजनीतिक चुनौतियों से लगातार जूझ रहे हैं। इस संघर्ष और उसके राजनीतिक अभ्यास से बनती, बिगड़ती पहचानों से ही ‘महिला,’ ‘दलित,’ ‘ट्रांसजेंडर’ और अल्पसंख्यक समूहों की पहचान उभरती है। नारीवादी सोच की प्रासंगिकता इन पहचानों की पेचीदगियों को समझने और उनके दायरों में राजनीतिक हस्तक्षेप करने के विषय में है।

‘शाहीन बाग’ ऐसी ही उभरती हुई एक खास पहचान है जो विभेदकारी नागरिकता कानून (सीएए) और नागरिकता पंजी (एनआरसी) से मुस्लिम महिलाओं के जूझने से बन रही है। दरअसल, ‘शाहीन बाग,’ देश की उस सामाजिक व्यवस्था का आइना है, जिसमें संरचनागत रूप से परत-दर-परत सामाजिक असमानताएं हैं। ये असमानताएं केवल ‘जेंडर’ के बारे में नहीं हैं, बल्कि वर्ग, जाति और यौन आधारित पहचानों के साथ जुड़ी ‘जेंडर’ की असमानताएं हैं। इस मायने में ‘शाहीन बाग’ की महिलाओं की प्रमुख पहचान एक जिद्दी और अडियल महिला समूह से कहीं ज्यादा एक मजदूर-नुमा,  मध्यम-वर्गीय, लगभग अशिक्षित, घरेलू, पर्दानशीं और कभी-कभी उम्रदराज महिलाओं के रूप में है। ये देश की वे महिलाएं हैं जो संविधान की आत्मा को संसद और न्यायालय के गलियारों से बाहर, अपने-अपने गली-मोहल्लों में खींच लायी हैं। ‘आइन’ (कानून) की इस मैदानी लड़ाई से देश में पुनः ‘समय के रथ का, एक बार फिर घर्घर नाद’ सुनाई दिया है और देश के हर गली-मोहल्ले से कवि रामाधारी सिंह ‘दिनकर’ की आवाज गूंज उठी कि ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।’

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आठ मार्च के ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ के अवसर पर ‘शाहीन बाग’ की महिलाओं की बात करने का महत्व इसलिए भी है क्योंकि ‘शाहीन बाग’ एक राष्ट्रीय महत्व का पन्ना बन गया है। ऐसे समय में जब देश की संसद, न्यायपालिका, पुलिस और कार्यपालिका ने अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ रखा है, ये महिलाएं अपनी तमाम वंचनाओं के बावजूद, केवल साहस और दृढ़ निश्चय की दम पर लोकतंत्र को बरकरार रखने के लिए एक परिपक्व राजनीतिक हस्तक्षेप करने का दमखम दिखा रही हैं।

बावजूद इसके की पितृसत्ता आधारित समाजों ने दुनिया भर की औरतों को दोयम दर्जे के नागरिक की तरह देखा, इतिहास में ढेर सारे ऐसे ‘शाहीन बाग’ बिखरे पड़े हैं, जिन्होंने निरंकुश होती सरकारों पर नकेल कसने और पंथ-निरपेक्ष विरासत की हिफाजत करने का काम किया है। घर-बार संभालने वाली, कम पढ़ी-लिखी, मजदूर-कृषक महिलाओं ने बिना किसी राजनैतिक प्रशिक्षण के, किसी प्रभावशाली नेतृत्व के आभाव में एन मौकों पर मोर्चे संभाले, जहाँ इंसानियत गर्त में थी और जनता निराशा से घिरी हुई थी।

लोरेल थेचेर उलरिच ने बखूब कहा है कि ‘सुसंस्कृत और सुशील महिलाएं कभी इतिहास नहीं बनातीं।‘ यह सच भी है, क्योंकि इतिहास बनाने के लिए कायदों पर सवाल उठाना ही पड़ता है। परदे के पीछे रहने वाली महिलाएं, जिनका अभिमत कभी नहीं लिया जाता, आज सड़कों पर देश के कायदे बना रही हैं। चैंकाने वाली बात यह है कि इतने संकट की घड़ी में भी, अपनी जांबाज हठधर्मिता के बावजूद ‘शाहीन बाग’ की महिलाएं पूरी शालीनता और शिद्दत से आंदोलन को नियंत्रित करती हैं। दिल्ली की कड़कडाती, रिकॉर्ड तोड़ ठण्ड में दिनभर की थकावट के बावजूद, कामकाजी और घरेलू महिलाएं, गोद में बच्चों को सँभालते हुए, खुली सर्द सड़कों पर डटी रहीं। नारों, गीतों और भाषणों में शिरकत करतीं और तुरंत वहीं, अपने मंच की गरिमा को बनाये रखने के लिए धुरंधर राजनीतिज्ञों से बहस करतीं इन ‘शाहीन महिलाओं’ ने परिपक्व राजनीतिक चातुर्य का प्रमाण दिया है। अपनी प्रयोग-धर्मिता और लोकतांत्रिक व्यवहार से ‘शाहीन बाग’ ने पूरे देश का दिल जीत लिया है। देश भर के गली-मोहल्लों में ‘शाहीन बाग’ आबाद हो गए हैं।

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संविधान की प्रस्तावना को गौर से सुनती हुई 65 साल की शबनम बी बताती हैं कि ‘मैं कभी किसी रैली-धरने में नहीं गयी और न ही कभी, किसी ने मेरे विचार जानने की परवाह की।‘ शबनम बी ने जीवन की साधारण समझ से यह जाना है कि आजाद देशों में प्रतिनिधि सरकारें, जनता से बातचीत कर मसलों के हल निकाल सकती हैं। गाँधी के सविनय अवज्ञा की तर्ज पर ये औरतें विनम्रता से अपनी बात रख रही हैं और आमंत्रित कर रही हैं कि जन-प्रतिनिधि इनसे आकर मिलें।

ऐसा पहली दफा नहीं है कि साधारण-सी दिखने वाली महिलाओं ने एक असाधारण और ऐतिहासिक राजनीति का परिचय दिया हो। जब असम राइफल्स के जवानों ने 11 जुलाई की आधी रात को मनोरमा को उसके घर से उठाया, बलात्कार कर हत्या कर दी तब सभी रूढ़ियों को तोड़ते हुए 12 मणिपुरी माताओं ने भारतीय सुरक्षा बलों को चुनौती दी थी और निर्वस्त्र होकर प्रदर्शन किया था। उन्होंने अपने कपड़े उतार फेंके, छाती पीटना शुरू कर दिया, जमीन पर लेट गईं और रोना शुरू कर दिया। ये सभी घरेलू महिलाएं थीं, अधिकांश गरीब परिवार से थीं और कई अपने परिवार की आजीविका के लिए छोटी-मोटी नौकरियां भी करती थीं। मणिपुर के ‘नुपी समाज’ के मइरा पैबी समूह की इन ‘मशाल- धारी महिलाओं’ ने तो असम रायफल को कंगला फोर्ट से बेदखल ही करवाकर दम लिया था और ‘अफस्पा’ कानून पर एक गहरी चोट की थी।

इसी तरह वर्ष 1956 में अफ्रीकी महिलाओं ने गली-मोहल्लों से एक जबर्दस्त लोकतान्त्रिक संघर्ष शुरू किया था जिसने की प्रीटोरिया के 1956 के ऐतिहासिक मार्च का रूप ले लिया था। यह साउथ अफ्रीका के निरंकुश सत्ताधीश के बनाये ‘पास-लॉ’ का विरोध था जो तय करता था कि अफ्रीकी महिलाएं कहाँ और किसके साथ रहेंगी और काम करेंगी। इस काले कानून को वापस लेने की याचिकों के गट्ठर लेकर 20 हजार महिलाएं कड़ी धूप में, बच्चों को पीठ पर बांधे, सन्नाटे में घंटों नेताओं का इंतजार करती रहीं। फिर अचानक सभी ने एक साथ वह मशहूर धुन छेडी जो निरंकुश सत्ताधारियों को ललकारती है -‘तुम स्त्रीजडॉम, तुमने महिलाओं को छुआ है, तुमने चट्टानों से पंगा लिया है, तुम मर जाओगे।’ इस प्रदर्शन की नेत्री फंकार्ड बार्ड पर तो राजद्रोह का मुकदमा भी चलाया गया था।

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इसी तरह उत्तरी आयरलैंड की दो महिलाओं, मेग्युरे और बेत्ती विलियम्स ने प्रोटेस्टेंट और कैथोलिक ईसाईयों के बीच हो रही मार-काट को रोकने के लिए अपने ही मोहल्लों में शांति याचिका पर दोनों समुदाय के लोगों के हस्ताक्षर लेने प्रारंभ किये। देखते-ही-देखते इन महिलाओं के नेतृत्व में 35000 लोगों का हुजूम मार्च करने लगा और बेलफास्ट की सडकें पट गयीं। रिपब्लिक और लॉयलिस्ट खेमों को इनकी बात मानना पड़ी। मेग्युरे और बेत्ती विलियम्स को उनके इस जांबाज कारनामे के लिए 1976 का नोबल पुरस्कार दिया गया।

‘शाहीन बाग’ की महिलाएं ऐसी सर्वव्यापी सोच को खारिज करती हैं जिसके तहत महिलाओं को उनकी उम्र, धर्म, वर्ग, जाति और ‘जेंडर’ की वजहों से कमतर, अराजनीतिक, निष्क्रिय और भीरु मान लिया जाता है। अपने इस राजनीतिक संवाद के बहाने वे एक किस्म की ऐसी राजनीतिक सत्ता को जनम दे रही हैं जो तमाम महिलाओं, दलितों और फेमिनिस्ट समूहों को आजाद करती है और उनकी एक ताजा-तरीन राजनीतिक पहचान कायम करती है। (सप्रेस)

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