66वीं सालगिरह : बढ़ रही है, ‘सर्वोदय प्रेस सर्विस’ की भूमिका

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वर्ष 1960 में मई की पहली तारीख, यानि ‘अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस’ पर शुरु हुआ ‘सर्वोदय प्रेस सर्विस’ अब अपने करीब 66 वर्ष सफलतापूर्वक पूरे कर कर रहा है। इस मौके पर प्रस्तुत है, ‘सप्रेस’ के पुराने साथी, लेखक भारत डोगरा का लेख।


कोई भी मीडिया संस्थान 66 वर्ष पूर्ण करे तो यह एक बड़ी उपलब्धि है, तिस पर यदि वह अमन, शांति, अहिंसा, न्याय और पर्यावरण रक्षा का सजग प्रहरी और रक्षक रहते हुए यह भूमिका पूरी करे तो ऐसी उपलब्धि के क्या कहने। ‘सर्वोदय प्रेस सर्विस’ ने ऐसा ही सफर तय किया है और आदरणीय महेन्द्र भाई को श्रद्धांजलि देते हुए ‘सर्वोदय प्रेस सर्विस’ के अनेक मित्र उसे और भी महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों की शुभकामनाएं देते हैं।

जी हां, ‘सर्वोदय प्रेस सर्विस’ की पूर्ण उपलब्धियां जितनी भी अमूल्य रही हों, पर आने वाले दिनों में इसे और भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी, और भी अधिक बड़ी उपलब्धियां प्राप्त करनी पड़ेंगी। जिस तरह युद्ध और हिंसा के अति विंध्वसक हथियारों के खतरे दुनिया में मंडरा रहे हैं, उस समय में तो ‘सर्वोदय प्रेस सर्विस’ जैसे मीडिया प्रयासों को अपनी आवाज और भी अधिक सार्थक व असरदार रूप से और भी अधिक लोगों तक पहुंचानी होगी।

इसमें मुझे तो जरा भी संदेह नहीं है कि महात्मा गांधी का अहिंसा का संदेश हालांकि अपने समय में भी बहुत सार्थक और महत्त्वपूर्ण था, पर आज उसकी सार्थकता, उसकी आवश्यकता और बढ़ गई है। सच कहा जाए तो अब यह मानवता (और सभी जीवन रूपों) के अस्तित्व की रक्षा के लिए बहुत जरूरी संदेश है।

आज दुनिया में लगभग 13000 परमाणु हथियार हैं और इनके वास्तविक उपयोग का खतरा बढ़ रहा है। दुनिया के कई जाने-माने विद्वानों ने हाल के अनेक संकटों और तनावों के दौरान कहा है कि इनमें वे तीसरे विश्वयुद्ध और संभावित परमाणु हथियारों के युद्ध की दस्तक सुन सकते हैं।

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दूसरी ओर यह भी स्पष्ट है कि यदि दो या अधिक महाशक्तियों के बीच परमाणु हथियारों का बड़े पैमाने का युद्ध हुआ तो उससे पूरी दुनिया ही तबाह हो जाएगी। इन स्थितियों में मौजूदा संदर्भों में महात्मा गांधी के संदेश का तर्कसंगत, तथ्य आधारित प्रचार-प्रसार बहुत महत्त्वपूर्ण हो गया है। यह जरूरी है कि ‘सर्वोदय प्रेस सर्विस’ अधिक लेखों को रिलीज करे, हिंदी के साथ अन्य भारतीय भाषाओं में करे तथा हो सके तो कुछ हद तक ही सही, अंग्रेजी में भी करे।

महात्मा गांधी के अहिंसा के संदेश को अपना कर दैनिक जीवन अहिंसक बनेगा तो इससे दुख-दर्द कम करने में सहायता मिलेगी तथा बढ़ती संख्या में लोग अमन-शांति के कार्यों व जिम्मेदारियों से जुड़ सकेंगे। इस तरह व्यापक स्तर पर इन उपायों से समाज को अधिक खुशहाल व न्यायसंगत बनाया जा सकता है। इसमें न्याय की बात जरूरी है।

महात्मा गांधी ने अन्याय के विरुद्ध, न्याय के पक्ष में अहिंसक तौर-तरीकों व अहिंसक सोच से संघर्ष करने के प्रयोगों को ही अपना जीवन समर्पित किया था। यही सोच आगे राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जाकर युद्ध को रोकने में बहुत सहायक है। जहां युद्ध व गृह-युद्ध पहले से चल रहे हैं उनको रोकने में व उनका विध्वंस कम करने में भी अहिंसा का यह विचार बहुत मददगार होगा।

यह सब बहुत महत्त्वपूर्ण पक्ष हैं। उन्होंने जहां अन्याय के विरुद्ध अहिंसक संघर्ष को बहुत महत्त्व दिया, वहां संघर्ष के साथ बहुत से रचनात्मक कार्यों को भी मेहनत से आगे बढ़ाया। इसमें शराब व नशे के विरुद्ध माहौल तैयार करना, स्वच्छता प्रयासों को जन-अभियान का रूप देना, घरेलू व कुटीर उद्योगों तथा खादी व प्राकृतिक खेती को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।

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जहां दुनिया शहरीकरण की ओर भाग रही है और इसे विकास का पर्याय मान रही है, वहां महात्मा गांधी ने बुनियादी तौर पर ग्राम-समुदाय आधारित विकास को प्रतिष्ठित किया, इन ग्रामीण समुदायों को अधिक समता मूलक व आत्म-निर्भर बनाने पर जोर दिया। इस संदेश की बहुत रचनात्मक उपलब्धि आज भी संभव है और दुनिया को नई राह दिखाएगी, विशेषकर यदि इसके साथ गांधीजी की इस बात को याद रखा जाए कि सबसे गरीब लोगों के कष्ट दूर करने को उच्चतम प्राथमिकता दी जाए।

इसके लिए गांधीजी ने समता और सादगी दोनों आदर्शों को एक साथ प्रस्तुत किया और इन्हें एक दूसरे का पूरक माना। इस सोच में ही पर्यावरण रक्षा का सबसे महत्त्वपूर्ण आधार है, समता, सादगी व ग्रामीण आत्म-निर्भरता आधारित विकास। इसी से खादी की सोच भी एक व्यापक संदर्भ में जुड़ती है।

गांधीजी ने अपने अनुभवों और अध्ययन पर आधारित यह संदेश दिया कि भारतीय समाज के लिए तीन सुधार बड़े जरूरी हैं। पहला, महिलाएं अधिक व्यापक सामाजिक भूमिका में आगे आएं। दूसरा, सभी तरह के भेदभाव समाप्त कर दलितों को समान अवसर मिलें। तीसरा, धार्मिक भेदभाव व सांप्रदायिक सोच को समाप्त कर सभी धर्मों की एकता व परस्पर सम्मान की स्थापना की जाए।इन सभी संदेशों को आगे ले जाने में मीडिया की महत्त्वपूर्ण भूमिका है और इस भूमिका में ‘सर्वोदय प्रेस सर्विस’  का महत्त्वपूर्ण स्थान है। यहां यह ध्यान में रखना होगा कि महात्मा गांधी के न्याय आधारित संदेश को समुचित मान दिया जाए। केवल शांति स्थापित करना पर्याप्त नहीं है, दुनिया को न्याय आधारित अमन-शांति की व्यवस्था चाहिए। साम्राज्यवाद का स्पष्ट व प्रबल विरोध महात्मा गांधी के समय में बहुत जरूरी था तो आज भी बहुत जरूरी है। इस जिम्मेदारी को निभाना जरूरी है। (सप्रेस)

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