ओडिशा पहाड़-नदी बचाओ यात्रा संपन्न, खनन विस्तार और आदिवासी विस्थापन पर जताई चिंता

नागावी पहाड़/ओडिशा, 3 जून 2026। ओडिशा पहाड़-नदी बचाओ यात्रा आज संपन्न हुई। यात्रा के दौरान यह बात सामने आई कि ओडिशा में दुर्लभ खनिज (रेयर मैटेरियल) के नाम पर जिस तरह पहाड़ों की कटाई की योजनाएं बनाई जा रही हैं, वह चिंताजनक है। राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर खदानों की लीज दी जा रही हैं। वन्यजीव अभयारण्यों को डी-नोटिफाइड कर खनन परियोजनाओं को मंजूरी देने की प्रक्रिया भी जारी है। भवानीपटना के निकट स्थित एक वन्यजीव अभयारण्य क्षेत्र में 11 नई खनन लीज वन भूमि पर दिए जाने की जानकारी यात्रा के दौरान मिली।

यात्रा के दौरान कहा गया कि ओडिशा में तेजी से खनन का विस्तार हो रहा है, जिसका असर आदिवासी समाज और जंगलों पर पड़ रहा है। सदियों से जंगलों, पेड़-पौधों और वन्यजीवों के साथ जीवन बिताने वाले मूल निवासी अब विस्थापन के खतरे का सामना कर रहे हैं।

यात्रा में यह चिंता व्यक्त की गई कि ओडिशा, जो लंबे समय से आदिवासियों का प्रदेश माना जाता रहा है, वह उद्योगपतियों के प्रभाव वाले प्रदेश में बदलता जा रहा है। बड़े वन क्षेत्र और पहाड़ियां विभिन्न औद्योगिक समूहों के कब्जे में बताई गईं।

पर्यावरण विद राजेंद्र सिंह ने भुवनेश्वर से शुरू होकर भवानीपटना, कलाहांडी, झोंझर और बादन पर्वत तक यात्रा की तथा इसके बाद आंध्र प्रदेश में प्रवेश किया। यात्रा के दौरान कहा गया कि देश के चार राज्यों में रेयर मैटेरियल के नाम पर पहाड़ों को कंपनियों के लिए उपलब्ध कराया जा रहा है। कंपनियां अपने मुनाफे के लिए नदियों, पहाड़ों, अन्न, जल, हवा और जलवायु की चिंता नहीं करतीं, जबकि ये सभी जीवन के आधार हैं। यात्रा में आरोप लगाया गया कि उद्योगपति पहाड़ों को काट रहे हैं और सरकार उन्हें इसमें सहयोग दे रही है।

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यात्रा में कहा गया कि यदि इस विनाशकारी प्रक्रिया को नहीं रोका गया तो देश के प्राकृतिक संसाधनों और जीवन के आधार तंत्र पर गंभीर संकट उत्पन्न होगा। पहाड़ों, नदियों और समुद्रों को बचाना आवश्यक बताया गया। पहले पर्यावरण कानून, जंगल कानून और प्रदूषण नियंत्रण कानूनों के माध्यम से संरक्षण की दृष्टि से काम किया जाता था, लेकिन अब विकास की दिशा बदल गई है।

यात्रा में यह मत व्यक्त किया गया कि पहले गरीबी मिटाने की सोच थी, जबकि अब गरीब को ही समाप्त करने की दिशा में नीतियां बन रही हैं। मुफ्त योजनाओं के माध्यम से गरीबों के स्वाभिमान, आत्मनिर्भरता और श्रम आधारित जीवनशैली को कमजोर किया जा रहा है। इससे लोगों में स्व-अभिक्रम, श्रमनिष्ठा और अनुशासन का ह्रास हो रहा है। जब व्यक्ति अपना स्वाभिमान खो देता है तो उसके जीवन से अनुशासन और आत्मविश्वास समाप्त होने लगता है। यात्रा में देश में भय का वातावरण होने और आदिवासी समुदायों के अधिकार कमजोर पड़ने की बात भी कही गई।

यात्रा के वक्ताओं ने कहा कि जंगलों के कानूनों और संवैधानिक व्यवस्थाओं के कारण आदिवासी स्वयं को जंगलों का मालिक मानने लगे थे तथा मेहनत कर जीवनयापन कर रहे थे, लेकिन अब उनकी आय और रोजगार के अवसर कम होते जा रहे हैं। इसके कारण उनका जीवन संकट में पड़ रहा है। किसानों और युवाओं की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा गया कि वे लाचार, बेकार और बीमार जैसे दिखाई देते हैं तथा गांवों से खेती और युवाओं का पलायन बढ़ रहा है।

किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल रहा है। खेती के लिए तैयार की गई जमीन और उपलब्ध कराए गए पानी के बावजूद किसानों को अपनी मेहनत का उचित प्रतिफल नहीं मिलने से नई पीढ़ी खेती से दूर हो रही है। युवाओं के सामने भविष्य को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं और वे कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित जीवन की ओर बढ़ रहे हैं।

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कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने किसानों की प्राकृतिक बुद्धिमत्ता, अनुभव आधारित ज्ञान और श्रम से अर्जित जीवन पद्धति को पीछे धकेल दिया है। इससे पारंपरिक ज्ञान व्यवस्था कमजोर हो रही है।

ओडिशा यात्रा का समापन नागावी पहाड़ स्थित बलदा लेख पर हुआ। यात्रा में ओडिशा से सुदर्शनदास और आंध्र प्रदेश से बोलिसेट्टी सत्यनारायण शामिल रहे। तीन लोगों द्वारा शुरू की गई इस यात्रा में रास्ते भर सैकड़ों और हजारों लोग जुड़ते गए। यात्रा का उद्देश्य पहाड़-नदी बचाओ कानून के लिए वातावरण निर्माण करना था।

यात्रा के दौरान उन क्षेत्रों का दौरा किया गया जहां नदियों को बचाने और पहाड़ों की रक्षा के लिए आंदोलन चल रहे हैं। आदिवासी समुदायों के साथ बैठकों के माध्यम से आगे की रणनीति पर चर्चा की गई। यात्रा में यह अनुभव सामने आया कि आदिवासी समाज समझने लगा है कि पहाड़ उसका घर है और उद्योगपति उसके घर को उजाड़कर उसकी गरीबी बढ़ाना चाहते हैं। इसके कारण पहाड़ी क्षेत्रों में व्यापक असंतोष और गुस्सा दिखाई दे रहा है।

यात्रा के दौरान आदिवासी और महिला समूहों के साथ संवाद कर उनके आक्रोश को शांतिपूर्ण दिशा देने और आगे का रास्ता तैयार करने पर चर्चा की गई। इस यात्रा में आदिवासी महिला नेताओं नारंगी देवी और लक्ष्मी देवी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। लक्ष्मी देवी कोरापुट जिले से हैं, जबकि नारंगी देवी क्षेत्रीय जनआंदोलनों में सक्रिय हैं। दोनों महिलाएं लोगों को संगठित करने, जागरूक करने और पहाड़ों की रक्षा के लिए आंदोलन खड़ा करने का काम कर रही हैं।

यात्रा के समापन पर कहा गया कि 21वीं सदी में भारत का आदि ज्ञान और मूल ज्ञान तंत्र ही देश को बचा सकता है। आधुनिक शिक्षा, तकनीक और इंजीनियरिंग को प्रकृति के दोहन का माध्यम बताते हुए कहा गया कि इससे आदिवासी समाज प्रभावित हो रहा है, लोग बेघर हो रहे हैं और उनका जीवन संकटग्रस्त बनता जा रहा है। ओडिशा के आदिवासी अब इन परिस्थितियों को समझ रहे हैं और शांति तथा अहिंसक सत्याग्रह के माध्यम से अपने पहाड़ों, जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा की तैयारी कर रहे हैं।

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