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जाओ इससे अच्छे-अच्छे काम करते जाना, तालाब बनाते जाना

विश्‍व जल दिवस पर विशेष कूड़न, बुढ़ान, सरमन और कौंराई थे चार भाई। चारों सुबह जल्दी उठकर अपने खेत पर काम करने जाते। दोपहर को कूड़न की बेटी आती, पोटली में खाना लेकर। ⁠एक दिन घर से खेत जाते समय…

‘मोहनदास गाँधी’ के देश में ‘आसिफ’ के साथ बेरहमी !

पैंसठ सालों के बाद आज भी ‘मोहन’ पानी की तलाश में इधर से उधर भटक रहा है । फ़र्क़ बस यह हुआ है कि बदली हुई परिस्थितियों में स्क्रिप्ट की माँग के चलते ‘मोहन’ अब ‘आसिफ’ हो गया है ।…

क्‍या उद्योग बढ़ा रहा है, सड़कों की असुरक्षा?

आज के दौर में परिवहन, यातायात सर्वाधिक जरूरी सेवाएं हो गई हैं, लेकिन उनकी बढौतरी के साथ-साथ खतरे भी बढते जा रहे हैं। आजकल तेजी से भागती आम सडकों पर चलना दुर्घटनाओं को न्‍यौता देना हो गया है। क्या इसके…

पर्यावरण संरक्षण में मार्च का महत्व

मार्च का यह महीना पर्यावण के लिहाज से इसलिए भी अहम है क्योंकि पर्यावरण से गहरे जुडे कई मुद्दों की याद दिलाने वाले ‘दिवस’ इसी महीने में पडते हैं। सवाल है कि पूरे जोश-खरोश के साथ मनाए जाने वाले इन…

देशी ज्ञान से रोका जा सकता है, पर्यावरण-विनाश

आज के समय का एक बडा संकट जलवायु-परिवर्तन और पर्यावरण-विनाश है जिससे निपटने की तजबीज खोजने में दुनियाभर के ज्ञानी अहर्निश लगे हैं। क्या इस संकट से हम अपनी ठेठ देशी पद्धतियों की मार्फत नहीं निपट सकते? आज की प्रचलित…

‘चौरी-चौरा’ के सौ साल बाद किसान आंदोलन

सौ से अधिक दिनों से दिल्ली की सीमाओं पर जारी किसान आंदोलन अब केवल तीन कानूनों की वापसी और ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ की वैधानिक गारंटी तक सीमित नहीं रह गया है। उसमें लंबे और प्रभावी आंदोलन के तौर-तरीके, अहिंसा की…

पानी के दुख दूबरे

जीवन को बरकरार रखने के लिए पानी और भोजन बुनियादी जरूरतें होती हैं, लेकिन दोनों ही आजकल पूंजी बनाने के जिन्स में तब्दील हो गई हैं। जाहिर है, इनका बाजारू मूल्य भी हो गया है और नतीजे में इनकी मार्फत…

वायु प्रदूषण से बर्बाद होती जिन्दगी

वायु-प्रदूषण मानवीय जीवन और स्वास्थ्य के लिए दिनों-दिन खतरनाक होता जा रहा है। तरह-तरह के अध्‍ययन बताते हैं कि प्रदूषित हवा ने दूसरी अनेक बीमारियों के मुकाबले अधिक जिन्दगिया ली हैं। केंद्र सरकार की संस्था ‘इंडियन कॉउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च’ (आईसीएमआर)…

सिर्फ रौंदने के लिए नहीं है – घास

दिन-प्रतिदिन घास पर संकट और गहराता जा रहा है। इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं पशु जगत। मनुष्य जगत भी अब प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होने लगा है। खाद्य सुरक्षा के लिए भी घास का जीवित रहना तथा खाद्य-श्रंखला…

चुनावों की सार्थकता

अहिंसक, शांतिपूर्ण और अब तक राजनीतिक दलों से परहेज करने वाले किसान आंदोलन का विकल्प-हीनता की मजबूरी में पनपा यह राजनीति-प्रेम उसे कहां ले जाएगा? कहने को भले ही किसान आंदोलन ‘किसी पार्टी विशेष की वकालत’ न करते हुए भाजपा…