Latest post

बिजली का बेहतर विकल्प हो सकती है, अक्षय ऊर्जा

नीलेश दुबे  ऊर्जा की खपत से विकास को मापने के इस दौर में ऊर्जा उत्पादन के तरीकों पर गहराई से विचार करने की जरूरत है। क्या हम व्यापक विस्थापन, भारी पर्यावरण विनाश और असीमित आर्थिक बदहाली की कीमत पर पारम्परिक…

सर्वस्व ‘लुटाने’ वाले बांध प्रभावितों से राजनीति करती रहीं, पिछली सरकारें

नर्मदा पर बने ‘सरदार सरोवर’ बांध के विस्थापितों को बरसों बाद अपने हक में कुछ सकारात्मक होता दिखाई दिया है। पिछली केन्द्र और राज्य सरकारों के ‘शून्य’ विस्थापन-पुनर्वास मानने के बरक्स मध्यप्रदेश की नई सरकार ने विस्थापितों की उनके गांवों…

सचमुच वे गुमनाम नींव की ईंटें भी प्रणम्य हैं

किसी व्यक्ति की महानता उसके समय, परिवेश और परिजनों पर भी निर्भर करती है। महात्मा गांधी को भी अपने सबसे बड़े भाई से ऐसा साथ, सहयोग, सहायता मिलती रही। बुलन्द इमारत पर रीझना स्वाभाविक है, लेकिन नींव की वे ईंटें…

कमी पानी की नहीं, उसे वापरने की तरकीब की है

22 मार्च – विश्‍व जल दिवस पर‍ विशेष पानी की कमी ने अब दो बातों पर ऊंगली रखी है-एक, क्या पानी का टोटा सचमुच ऐसा है जिससे निपटने के लिए ‘तीसरा विश्वयुद्ध’ छेड़ना पडे ? और दूसरे, क्या उस ‘अपराधी’…

क्या प्रदूषण को काबू कर सकते हैं, बिजली के वाहन?

दुनियाभर में वायु प्रदूषण के लिए वाहनों की बढ़ती संख्या भी जिम्मेदार है। फैलते बाजार और उसकी मार्फत कमाए जाते राजस्व ने सरकारों को इसे अनदेखा करने को उकसाया भी है, लेकिन बढ़ते तापक्रम और नतीजे में जलवायु परिवर्तन की…

बढ़ते हवाई यातायात से बिगड़ता पर्यावरण

एक जमाने में अमीरों के मंहगे परिवहन का सुविधाजनक साधन माना जाने वाला हवाई यातायात अब अनेक शहरों, व्यक्तियों के लिए आम बात हो गया है। जाहिर है, बडे़ पैमाने पर बढ़ते-फैलते हवाई परिवहन ने उसी दर्जे की पर्यावरणीय समस्याएं…

अमेरिका के बिना कैसे काबू होगा, जलवायु परिवर्तन ?

दुनियाभर के बाजारों और उनकी मार्फत वैश्विक राजनीति को प्रभावित करने वाले ‘ग्रूप-20’ के देश भी अब जलवायु परिवर्तन के प्रलयंकारी प्रभावों की चपेट में आते जा रहे हैं, लेकिन उनका सरगना अमेरीका अपने मौजूदा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की जिद…

पर्यावरणीय आपातकाल-जीवन के लिए खतरे की घंटी!

यह पर्यावरण की बजाए खुद को बचाने का दौर है। इंसानी बिरादरी ने अपने धतकरमों की मार्फत समूचे सचराचर जगत को जिन हालातों में ला पटका है, उससे कोई उम्मीद तो दिखाई नहीं देती, लेकिन फिर भी चंद समझदारों के…

जैव विविधता दिवस : जैव विविधता पर संकट ?

22 मई जैव विविधता दिवस पर विशेष वैश्विक स्तर पर जैव विविधता का संरक्षण एक चुनौती के रूप में सामने है। दुनियाभर में प्राकृतिक आवासों की क्षति, वन विनाश, खनिज कार्य, कृषि विकास, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, औद्योगिक महत्व की फसलों…

प्रकृति का प्रसाद ही नहीं, राजनीति का जरिया भी है, पानी

पानी को सिर्फ प्रकृति का प्रसाद मानने वाले नादान लोगों को यह जानकारी भौंचक कर सकती है कि मध्यप्रदेश की बे-पानी होती आबादी को ठेंगे पर मारते हुए गुजरात को उदारतापूर्वक पानी दिया जा रहा है। वैसे भी ‘नर्मदा पंचाट’…