बांध और विस्‍थापन

प्रकृति का प्रसाद ही नहीं, राजनीति का जरिया भी है, पानी

प्रकृति का प्रसाद ही नहीं, राजनीति का जरिया भी है, पानी

पानी को सिर्फ प्रकृति का प्रसाद मानने वाले नादान लोगों को यह जानकारी भौंचक कर सकती है कि मध्यप्रदेश की बे-पानी होती आबादी को ठेंगे पर मारते हुए गुजरात को उदारतापूर्वक पानी दिया जा रहा है। वैसे भी ‘नर्मदा पंचाट’...

हिमांशु ठक्कर

पानी को सिर्फ प्रकृति का प्रसाद मानने वाले नादान लोगों को यह जानकारी भौंचक कर सकती है कि मध्यप्रदेश की बे-पानी होती आबादी को ठेंगे पर मारते हुए गुजरात को उदारतापूर्वक पानी दिया जा रहा है। वैसे भी ‘नर्मदा पंचाट’ ने तय कर ही दिया था कि एक समूची भरी-पूरी हरसूद तहसील की आबादी और लहलहाते जंगलों को डुबोकर इंदिरा सागर सरीखा विशालकाय बांध बनाया जाएगा और उसके भंडार में संचित पानी को नियमित रूप से सरदार सरोवर में स्थानांतरित किया जाएगा। इस बार स्थानांतरित किए जाने वाले इस पानी की मात्रा इतनी बढ़ गई है कि उससे राजस्थान को आबंटित पानी की मात्रा का मुकाबला किया जा सकता है। (अनुवाद रेहमत मंसूरी)

मध्यप्रदेश के इंदिरा सागर बाँध से गुजरात के लिए अप्रत्याशित रुप से सामान्य से कहीं अधिक पानी छोड़ा जा रहा है। मध्यप्रदेश सरकार की गुजरात के प्रति इस दरियादिली से मध्यप्रदेश के किसानों और नर्मदा किनारे रहने वालों के लिए गर्मी का यह मौसम भारी कठिनाई भरा होने की आशंका है। विडंबना यह है कि मध्यप्रदेश के इस पानी से गुजरात के किसानों, आम लोगों को कोई फायदा नहीं हो रहा है। वहां भी एक तरफ, कपास की फसलें बर्बाद हो रही हैं तो दूसरी तरफ, पर्यटकों के मौज-मजे के लिए जल-क्रीडाओं का इंतजाम किया जा रहा है। चुनाव में फंसे मध्यप्रदेश के राजनेता जब तक इस गंभीर मसले पर संज्ञान लेंगे तब तक नर्मदा में बहुत पानी बह चुका होगा।

‘नर्मदा घाटी विकास परियोजना’ के तहत नर्मदा और उसकी सहायक नदियों पर बने और प्रस्तावित 30 बड़े बाँधों में से गुजरात का सरदार सरोवर बाँध नर्मदा के अंतिम छोर पर है। ‘नर्मदा जलविवाद न्यायाधिकरण’ (नर्मदा पंचाट) द्वारा लंबे बहस-मुबाहिसे के बाद 1979 में संबंधित राज्यों के बीच नर्मदा जल का बँटवारा किया गया था। इसके तहत सामान्य बारिश की स्थिति में गुजरात को 9 मिलियन एकड फुट (एमएएफ), राजस्थान को 0.5 एमएएफ और वाष्पीकरण में उड़ जाने वाले 0.5 एमएएफ यानि 10 एमएएफ पानी का आबंटन किया गया था। सरदार सरोवर के जल-भंडार में पहुंचने वाले इस 10 एमएएफ पानी में से 8.12 एमएएफ पानी मध्यप्रदेश को देना था तथा शेष महेश्वर के नीचे के केचमेंट (आगोर) से मिलना था। सरदार सरोवर बाँध की कुल भंडारण क्षमता 7.7 एमएएफ (‘लाइव स्टोरेज’ 4.73 एमएएफ और ‘डैड स्टोरेज’ 2.97 एमएएफ) है जबकि उसे 10 एमएएफ का आबंटन किया गया है। जाहिर है, मध्यप्रदेश के इंदिरा सागर को इसीलिए विशालकाय बनाया गया है ताकि वह गुजरात के हिस्से के पानी का भंडारण भी कर सके। इंदिरा सागर के इस पानी को नियमित रुप से गुजरात के लिए छोड़ा जाता है, हालांकि नर्मदा घाटी में औसत से कम बारिश होने पर गुजरात समेत सभी राज्यों का अंश आनुपातिक रुप से कम भी हो जाता है।

See also  नर्मदा नदी अगले पचास साल में खत्म हो जाएगी

पिछले साल नर्मदा घाटी में 24 प्रतिशत कम बारिश हुई थी जिसके हिसाब से गुजरात को सिर्फ 5.8 एमएएफ पानी मिलना चाहिए था। आंकडे बताते हैं कि 16 अप्रेल 2019 तक, अपनी सूखा झेलती आबादी को अनदेखा करते हुए मध्यप्रदेश, गुजरात के लिए उदारतापूर्वक इससे अधिक यानि 6.4 एमएएफ पानी छोड़ चुका है। नर्मदा पंचाट द्वारा राजस्थान के लिए आबंटित पानी की मात्रा से भी अधिक यह पानी इतनी दरियादिली से छोड़ा जा रहा है कि 3 मार्च से 8 अप्रैल 2019 के बीच, महज 35-36 दिन में सरदार सरोवर का जलस्तर करीब 4 मीटर (115.55 से 119.37 मीटर) तक बढ़ गया। गर्मी के दिनों में जब नदी-नाले सूख चुके हैं, पीने के पानी का चहुँओर संकट है तब सरदार सरोवर का जलस्तर इतनी तेजी से बढ़ना बहुत ही आश्चर्यजनक है।

मध्यप्रदेश में नर्मदा परियोजनाओं का प्रबंधन ‘नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण’ (एनवीडीए) करता है और सरदार सरोवर समेत सभी बांधों की निगरानी एक केन्द्रीय एजेंसी ‘नर्मदा कंट्रोल अथॉरिटी’ (एनसीए) द्वारा की जाती है। मध्यप्रदेश सरकार द्वारा गुजरात के लिए पानी छोड़ने के पीछे केन्द्र सरकार द्वारा एनसीए के जरिए गुजरात सरकार के पक्ष में दबाव बनाया जाना हो सकता है, लेकिन केवल केन्द्र सरकार के दबाव में मध्यप्रदेश सरकार गुजरात को इतनी बड़ी राहत दे दे यह संभव नहीं दिखता। बहुत संभव है कि इसके पीछे एनसीए,एनवीडीए और गुजरात सरकार के अधिकारियों का कोई गठजोड़ काम कर रहा हो। मध्यप्रदेश को इसका तुरंत पता लगाना चाहिए अन्यथा राज्य में कपास की फसल और नर्मदा किनारे के निवासियों के लिए पेयजल और निस्तार के पानी का हाहाकार मच जाएगा।

See also  मंडला के निरस्त बांध को फिर बनाने में आमादा है मध्यप्रदेश सरकार

सरदार सरोवर में पिछले वर्ष 16 अप्रैल 2018 को जलस्तर 105.81 मीटर था और पानी की कमी से निपटने के लिए गुजरात सरकार ने उस 700 मिलियन क्यूबिक मीटर(एमसीएम) पानी का भी इस्तेमाल कर लिया था जिसका उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। हालांकि मध्यप्रदेश सरकार की मेहरबानी से इस साल स्थिति बहुत बेहतर है इसके बावजूद गुजरात के किसान परेशान है। पिछले वर्ष के मुकाबले इस वर्ष गुजरात में कपास का उत्पादन कम होकर पिछले 10 सालों के सबसे निचले स्तर पर पहुँच गया है। इसका कारण पानी की कमी बताई गई है, जो सही नहीं है।

पिछले साल खण्डवा, होशंगाबाद, डिण्डोरी, जबलपुर और मण्डला जिलों में सितंबर के दूसरे पखवाड़े में हुई बारिश ने इंदिरा सागर जलाशय को पूरा भर दिया था, हालांकि खण्डवा को छोड़कर शेष जिलों में औसत से कम बारिश हुई थी। 27 सितंबर 2018 को इस बाँध में 262.13 मीटर के स्तर पर 9601 एमसीएम (7.78 एमएएफ) पानी संग्रहित था। इंदिरा सागर में जमा यह पानी देश के उन बड़े 91 जलाशयों में सर्वाधिक था जिनकी ‘केन्द्रीय जल आयोग’ (सीडब्ल्यूसी) द्वारा निगरानी की जाती है। भण्डारण के मामले में दूसरे नंबर पर पोंग बाँध (हिमाचल प्रदेश) था जिसमें इसके मुकाबले बहुत कम 6059 एमसीएम (4.91 एमएएफ) पानी जमा हुआ था।

इंदिरा सागर में लाइव स्टोरेज (उपयोगी जल) भण्डार 7.68 एमएएफ है। नर्मदा पंचाट की शर्त के अनुसार सामान्य बारिश की स्थिति में इंदिरा सागर से 10,015 एमसीएम (8.12 एमएएफ) पानी सरदार सरोवर में छोड़ा जाना चाहिए जबकि जुलाई 2018 से 16 अप्रैल 2019 तक मध्यप्रदेश सरकार 7,871 एमसीएम (6.38 एमएएफ) पानी गुजरात के लिए छोड़ चुकी थी। सामान्य वर्षों के हिसाब से अब केवल 2150 एमसीएम (1.74 एमएएफ) पानी छोड़ना शेष है जो जून के आखिर तक आसानी से छोड़ दिया जाएगा।

See also  कपिला बहन : हमसे तब बिछुड़ी जब उनकी जरुरत ज्यादा है

पिछले वर्ष नर्मदा कछार में सामान्य से 24 प्रतिशत कम बारिश हुई है इसलिए इसी अनुपात में गुजरात का हिस्सा भी कम होना चाहिए। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि एनसीए ने किस आधार पर पानी की इतनी अधिक मात्रा गुजरात के लिए छोड़ने का निर्णय लिया है। यह भी रहस्य ही बना हुआ है कि खुद बुरी तरह जल संकट से जूझ रहे मध्यप्रदेश द्वारा अपने पड़ौसी राज्य के प्रति इतनी दरियादिली दिखाने की वजह क्या है? दूसरी ओर, गुजरात से उम्मीद थी कि वह मध्यप्रदेश से मिले इस पानी का उपयोग समझदारी से करते हुए उसे प्यासे गाँवों और खेतों तक पहुँचाएगा। भूमिगत बिजलीघर से बिजली उत्पादन करेगा ताकि मध्यप्रदेश को उसका लाभ मिल सके और बिजली उत्पादन से मुक्त हुए पानी से बाँध के निचवास में रहने वाले समुदायों को राहत मिल सके। लेकिन सरदार सरोवर के भूमिगत बिजलीघर से जुलाई 2017 के बाद एक यूनिट भी बिजली उत्पादित नहीं की गई है।

यदि मध्यप्रदेश अपने राज्य की चिंता किए बिना गुजरात को इतना ज्यादा पानी दे रहा है तो फिर गुजरात में कपास की फसल खराब होने का क्या कारण है? हालांकि गुजरात में इसका कारण पिछले वर्ष की अपेक्षा पानी की कम उपलब्धता बताई गई है, लेकिन यह कारण सही नहीं है क्योंकि सरदार सरोवर परियोजना गुजरात में पानी का प्रमुख स्रोत है और मध्यप्रदेश सरकार ने सरदार सरोवर के लिए भरपूर पानी छोड़ा है। मीडिया में खबरें हैं कि गुजरात की जनता पानी के लिए परेशान हो रही है और सरकार सरदार सरोवर बाँध के नीचे पर्यटकों के मनोरंजन के लिए बोट परिचालन की तैयारी में व्यस्त है। गुजरात हो या मध्यप्रदेश, किसी भी सरकार को अपने नागरिकों की कोई चिंता नहीं है। (सप्रेस)

जुड़ें - हमारे व्हाट्सएप चैनल से

सप्रेस मीडिया - नवीनतम आलेख, रिपोर्ट, समाचार अपडेट सीधे अपने व्हाट्सएप पर प्राप्त करें।

व्हाट्सएप ग्रुप से जुड़ें →

निष्पक्ष पत्रकारिता का समर्थन करें

आज के दौर में निष्पक्ष, स्वतंत्र और जन-सरोकार की पत्रकारिता को जीवित रखना बड़ी चुनौती है। विज्ञापनदाताओं और कॉर्पोरेट के दबाव से मुक्त होकर आप तक सही और सटीक खबरें पहुंचाना हमारा मुख्य उद्देश्य है। हमारी स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए आपके आर्थिक सहयोग की आवश्यकता है। आपकी दी हुई छोटी-सी सहयोग राशि हमें सच्ची पत्रकारिता करते रहने का संबल देगी।

सहयोग राशि →

नवीन आलेख