Sarvodaya Press Service

सर्वोदय प्रेस सर्विस – फीचर्स सेवा के छ: दशक

Latest post

‘विकास’ की बलि चढ़ता हिमालय

उत्तराखंड की ताजा त्रासदी ने एक बार फिर उस सनातन सवाल को उछाल दिया है कि आखिर विकास के नाम पर होने वाली गतिविधियां हमारे विनाश की वजह क्यों बनती जा रहीं हैं? क्या उत्तराखंड में बनी और बन रहीं…

किसान आंदोलन के समर्थन में हिमाचल के सामाजिक संगठनों और किसान समूहों ने जारी किया बयान

केंद्र सरकार द्वारा बनाये गए तीन कृषि क़ानूनों के विरोध में देश के किसान तीन महीनों से आन्दोलनरत हैं। किसानों की मांग है कि तीनों कृषि कानूनों को रद्द कर कृषि उत्पादों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की गारंटी का…

कैसे मापें, गरीब और गरीबी की गहराई

हाल के वर्षों में गरीबी को परिभाषित करने का सवाल फिर से सिर उठा रहा है। गरीब कौन हैं, क्यों हैं और उनकी इस दशा के लिए कौन जिम्मेदार है? अनेक अर्थशास्त्रियों ने इसे लेकर अपनी-अपनी अवधारणाएं प्रस्तुत की हैं,…

नामकरण ही नहीं, उसके पीछे के इरादे भी जानना ज़रूरी है!

नए स्टेडियम के नाम के साथ और भी कई चीजों के बदले जाने की शुरुआत की जा रही है। यानी काफ़ी कुछ बदला जाना अभी बाक़ी है और नागरिकों को उसकी तैयारी रखनी चाहिए। केवल सड़कों, इमारतों, शहरों और स्टेडियम…

अब धर्म-धुरीण बचाएंगे, धरती को

सवाल है कि ‘चमोली त्रासदी’ जैसी आपदाओं को, अपनी विकास की हठ में बार-बार खडी करने वाले राजनेताओं से धर्मगुरु किस मायने में भिन्न और बेहतर साबित होंगे? क्या वे अपने पास-पडौस के समाज, वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों की कोई बात…

हुकूमत को अब गिलहरियों की हलचल से भी ख़तरा!

प्रजातांत्रिक व्यवस्था में अगर नागरिकों के शांतिपूर्ण तरीक़े से विरोध व्यक्त करने के अधिकार छीन लिए जाएँगे तो फिर साम्यवादी/तानाशाही देशों और हमारे बीच फ़र्क़ की सारी सीमाएँ समाप्त हो जाएँगी। एक प्रजातंत्र में नागरिक आंदोलनों से निपटने की सरकारी…

चमोली त्रासदी की इंसानी वजहें

सीखने-सिखाने के मामले में हमारा ‘ट्रैक-रिकॉर्ड’ कोई उत्साहवर्धक नहीं रहा है। मसलन – उत्तराखंड में हाल में आई भीषण आपदा से क्या हम कुछ सीखेंगे? क्या पहले भी कभी कुछ सीखा गया है, ताकि भविष्य में ऐसी आपदाएं नहीं हों…

बजट में पर्यावरण

आधुनिक ‘विकास’ और पर्यावरण एक-दूसरे के जानी दुश्मन माने जाते हैं और इस अखाडे में सरकारें विकास की तरफदार। ऐसे में पर्यावण सुधार के लिए बजट प्रावधान सुखद माने जा सकते हैं। कोराना काल के बाद केंद्र सरकार ने एक…

पाखंड की परम्परा

क्या वे अपने जैसे नर्मदा तट के उन लाखों रहवासियों के बारे में कभी सोच पाते हैं जिन्हें बड़े बांधों के नाम पर अपने-अपने घर-बार से जबरन खदेड़ दिया गया है और जिनके पुनर्वास के बारे में विचार तक करना…

शिक्षा का केन्द्रीय बजट यानि ‘गरीबी में गीला आटा’

हाल के केन्द्रीय बजट में राज्यों के खाते में आवंटित शिक्षा-बजट की राशि बहुत कम करके केन्द्र सरकार आखिर क्या करना चाहती है? कोरोना महामारी के बाद करीब सालभर में पहली बार खुल रहे गांव-खेडे के स्कूलों को अपने रख-रखाब…