शिक्षा

शिक्षा से अपेक्षा

शिक्षा से अपेक्षा

अपने समय में शिक्षा सर्वाधिक विवादास्‍पद जरूरत बनकर रह गई है। कोई अपने बच्‍चों को क्‍यों, कैसी और कितनी शिक्षा दिलाए? इतना सब करने के बाद क्‍या शिक्षा के घोषित उद्देश्‍य पूरे हो सकेंगे? शिक्षा व्यवस्था के दो ध्येय होते...

विभा वत्सल

अपने समय में शिक्षा सर्वाधिक विवादास्‍पद जरूरत बनकर रह गई है। कोई अपने बच्‍चों को क्‍यों, कैसी और कितनी शिक्षा दिलाए? इतना सब करने के बाद क्‍या शिक्षा के घोषित उद्देश्‍य पूरे हो सकेंगे?

शिक्षा व्यवस्था के दो ध्येय होते हैं। एक, बेहतर इंसान और नागरिक बनाना, जिससे वो जीवन का लुत्फ उठा सके और दूसरा, उसे उसकी पसंद के कार्य में दक्ष बनाना ताकि वह अपनी जीविका का बंदोबस्त कर सके। इस व्यवस्था में कुछ आधारभूत गड़बड़ियां शुरू से चली आ रही हैं। मसलन, हमारी पूरी पढ़ाई नम्बर लाने पर अटकी हुई है। विज्ञान, गणित या फिर साहित्य को पढ़ने के पीछे उसको समझना, जानना न होकर नम्बर की दौड़ हो जाता है। दूसरा, किसी छात्र की विषय विशेष में अभिरुचि बढ़ जाए और वह कोर्स से ज़्यादा उसको पढ़ने का प्रयत्न करें तो फिर पाठ्यक्रम आड़े आ जाता है। तीसरा, हमारे देश के शिक्षक एजेंट की भूमिका अदा करते हुए पाठ्यक्रम को बच्चों में घोटाने का जरिया भर बन जाते हैं। बच्चों के ज्ञान को परखने के लिए तीन घन्टे की परीक्षा भी बहुत बड़ा रोड़ा है। इन गड़बड़ियों पर छोटे-छोटे स्तर पर कई काम हो तो रहे हैं, लेकिन कोई बड़ा काम अब तक नहीं हुआ।

हमको तय करना होगा कि आखिर हम चाहते क्या हैं? शिक्षा का लक्ष्य देश और समाज को जानने वाले अच्छे नागरिकों का निर्माण करना है, जो इतिहास, भूगोल और राजनीतिशास्त्र को पढ़कर ये समझ सकें कि हमारा अतीत क्या है? हमारा सिस्टम क्या है? समाज कैसे काम करता है और उसके बने रहने के लिए क्या ज़रूरी है? लेकिन दो-तीन दशकों से हो ये रहा है कि पूरा जोर विज्ञान और गणित की पढ़ाई पर है। ऐसा नहीं है कि साइंस पढ़ने के बाद दृष्टिकोण भी साइन्टिफिक हो गई है। ये पढ़ाई सिर्फ इसलिए कि पढ़-लिखकर आईआईटी या डॉक्टर बनकर एक अच्छी नौकरी हासिल हो सके। अच्छे पैसे वाली नौकरी तो मिल जाती है लेकिन कायदे से हम ना तो अच्छे नागरिक बन पाते हैं, ना ही सोशल एनिमल। ज़िंदगी का लक्ष्य पैसा कमाना भर रह जाता है।

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असल में आप समाज और देश की ज़रूरतों से कटे हुए प्राणी होते हैं। चूंकि आप इससे कट नहीं सकते, इसलिए नकली नारों में उलझ जाते हैं। जैसे मां का गुणगान करने वाला ‘मदर्स डे’ हो या पिता का गुणगान करने वाला ‘फादर्स डे।‘ देश के लिए मर मिटने की कसमें खानी हों या धर्म के लिए कुछ भी कर गुजरने की मानसिकता हो। ऐसे में आप नकली और सतही अवगुणों के शिकार हो जाते हैं। इससे देशभक्त और परिवार भक्त होने की गलतफहमी का भ्रम भी बना रहता है। शिक्षा ही समाज को बेहतर ढंग से समझने का जरिया है। इसलिए पाठ्यक्रम तो तय होना चाहिए, लेकिन पुस्तकें नहीं। मान लीजिए बच्चों को नदियों के बारे में बताना है तो उसे गंगा या नर्मदा नदी तक ही सीमित ना किया जाए, बल्कि उस इलाके की नदियों को शामिल करने की छूट भी हो।

गांधी जी ने अपनी किताब ‘बुनियादी तालीम’ में दो बातों पर जोर दिया था। उनका कहना था कि हर शिक्षा किसी-ना-किसी काम से जुड़ी हो। जो पढ़ाया जाय वो काम वाली शिक्षा हो, सिर्फ किताबी ज्ञान ना हो। दूसरा, नैतिक मूल्य। ये मूल्य भी जीवन के अनुभवों से सीखा जाय। उसमें लड़कियों का सम्मान भी हो सकता है, बराबरी का दर्जा भी, जरूरतमंदों के प्रति संवेदनशीलता भी हो सकता है। लेकिन ये नैतिक मूल्य कैसे दिया जाए यह भी एक चुनौती है। पहली शिक्षा नीति के लिए ‘कोठारी आयोग’ ने अपनी रिपोर्ट 1964 में दी थी। उसमें सुझाव था कि आप स्कूल का चुनाव नहीं कर सकते, ‘पडौसी’ (नेबरिंग) स्कूल की अवधारणा दी गई थी जिसमें चपरासी के बच्चे से लेकर अफसर तक के बच्चे पढ़ सकें। अगर इन सबके लिए अलग-अलग स्कूल होंगे तो विषमता की खाई और गहरी होगी। लेकिन इस सुझाव पर तवज्जो नहीं दिया गया।

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अभी के हालात में 90 फीसदी बच्चों का भविष्य स्कूल से ही तय हो जाता है। सरकारी स्कूल में पढ़ा बच्चा जिंदगी के जद्दोजहद में उलझा रहता है, वह ज़्यादा-से-ज़्यादा क्लर्क या ड्रॉप आउट बनकर रह जाता है वहीं दून का पढ़ा बच्चा राजा बन जाता है। ये अलग बात है कि इस मिथक को बहुत से बच्चे तोड़ भी रहे हैं, लेकिन ये उनका निजी प्रयास होता है, उसके पीछे इंस्टिट्यूशनल सिस्टम नहीं होता है। प्रश्न यही है कि क्‍या आज की शिक्षा व्यवस्था युवाओं की प्रतिभाओं को पहचानने में सक्षम है? किताबी ज्ञान पर टिकी डिग्रियों की लंबी फेहरिस्त क्‍या हमारे युवाओं को उनके मनमुताबिक नौकरियां दिला पा रही हैं? शिक्षा ऐसी हो जो मिथकों के ढेर पर बैठे समाज को बदल सके। शिक्षा का मतलब सिर्फ डिग्री हासिल करना, विज्ञान या गणित से जुड़े विषयों की प्रतिभा के मानक होना और साहित्य व कला को कमतर आंका जाना नहीं है। शिक्षा हर युवा को आगे बढ़ने का हुनर और कौशल तो दे ही उन्हें वो साहस भी दे ताकि वे बेरोज़गारों की लंबी फौज में ना दिखाई दें।

मगर, हमारे देश की प्राथमिकता में शिक्षा और स्वास्थ्य कभी शामिल नहीं रहा। इसकी मुख्य वजह हैं दो व्यवस्थाओं का होना। हमारे यहां गरीब और आम लोगों के लिए सरकारी शिक्षा व्यवस्था है, अमीर और सत्ताधारी लोगों के लिए प्राइवेट शिक्षा व्यवस्था है। वो अपने बच्चों को महंगे और निजी स्कूलों में पढ़ाते हैं फिर विदेश भेज देते हैं। इसलिए गरीबों के लिए शिक्षा क्रांति ‘मिड डे मील’ पर सिमट जाती है। (सप्रेस) 

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